शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

संगृहणी(बार बार दस्त आना) के आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक उपचार



   यदि अतिसार के बाद व्यक्ति गरिष्ठ चीजें खा लेता है, तो वह ‘संग्रहणी’ रोग का शिकार हो जाता है। इसमें व्यक्ति के पेट की अग्नि मंद हो जाती है तथा पाचन शक्ति इतनी बिगड़ जाती है कि खाया गया अन्न, बिना पचे ही साबुत शौच में निकल जाता है। 

यह तीन प्रकार की होती है –
*वातज संग्रहणी
जो लोग बादी चीजें अधिक खाते हैं अथवा मैथुन अधिक करते हैं, उनकी वायु कुपित होकर पेट की आग को बिगाड़ देती है।
*पित्त की संग्रहणी
जो लोग मिर्च, गर्म वस्तुएं, तीखी, खट्टी तथा खारी चीजों का प्रयोग अधिक करते हैं, उनको नीले, पीले, पतले, कच्चे दस्त आने लगते हैं।
*कफ की संग्रहणी
भारी, चिकनी, तली हुई, शीतल वस्तुएं अधिक खाने तथा खाने के बाद तुरंत सो जाने के कारण अन्न पूरी तरह नहीं पचता है और आंव सहित मल आने लगता है।
संग्रहणी रोग के  लक्षण 
* कफज संग्रहणी में भोजन पूरी तरह नहीं पचता है। इसमें गला सूख जाता है, भूख व प्यास अधिक लगती है, कानों, पसली, जंघा, पेड़ू आदि में दर्द रहता है, जीभ का जायका बिगड़ जाता है। मिठाई खाने की इच्छा अधिक होती है तथा बार-बार टट्टी आती है।
संग्रहणी के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार
*शोधी हुई गंधक 2 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम, पीपल 5 ग्राम, पांचों नमक 5 ग्राम, भुना हुआ अजमोद 5 ग्राम, भुना हुआ जीरा 5 ग्राम, भुना सुहागा 5 भाग, 2 ग्राम भुनी हुई भांग। इन सबको बारीक पीस लें। फिर इसमें से दो चुटकी दवा ठंडे पानी के साथ सेवन करें।
*यदि सन्निपात (तीनों दोषों-वात, पित्त, कफ़) की संग्रहणी हो, तो बेल की गिरी, गोचरस, नेत्रबाला, नागरमोथा, इन्द्र यव, कूट की छाल। सबको बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर महीन कर लें। फिर इसमें से चुटकी भर दवा बकरी के दूध के साथ लें।
*सोंठ, गुरच, नागरमोथा, अतीस। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर मोटा-मोटा कूट लें। इसमें से 2 चम्मच दवा का काढ़ा बनाकर 15 दिन तक रोगी को निरंतर सुबह व शाम को पिलाएं। यह वात की संग्रहणी के लिए बहुत लाभदायक है।
*सोंठ, पिपलामूल, पीपल, चित्रक, चव्य। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर मोटा-मोटा पीस लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन मट्ठे के साथ पिलाएं। प्रतिदिन मट्टे का प्रयोग अधिक करें। यह दवा 20 दिन तक नित्य सेवन कराएं।
*अनारदाना 10 ग्राम, सोंठ 2 ग्राम, काली मिर्च 2 ग्राम, मिसरी 5 ग्राम। सबको कूट-पीसकर कपड़छान कर लें। यह सन्निपात संग्रहणी, आमातिसार, पसली चलना, शूल, अरुचि, गले के दर्द आदि के लिए बहुत उपयोगी दवा है।
*पित्त संग्रहणी होने पर रसौत, अवीस, इन्द्र यव, धाय के फूल। सबको समान मात्रा में लेकर महीन पीस लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण गाय के मट्ठे के साथ सेवन करें। 15 दिन तक यह दवा खाए।
*जायफल, चित्रक, सफेद चन्दन, बायबिडंग, इलायची, भीमसेनी कपूर, वंशलोचन, सफेद जीरा, सोंठ, काली *मिर्च, पीपल, तगर, लवंग। इन सबको बराबर मात्रा में लेकर महीन पीस लें। फिर इसमें 500 ग्राम मिसरी मिला लें या दवा की मात्रा से दोगुनी कच्ची खाण्ड मिलाएं। इस दवा में से चुटकी भर दवा गाय के मट्ठे के साथ 15 दिन तक सेवन करें।
*हरड़ की छाल, पीपल, सोंठ, काला नमक, काली मिर्च। इन सबको 10-10 ग्राम लेकर महीन पीस कर चूर्ण बना लें। फिर इसमें से एक चुटकी चूर्ण प्रतिदिन मट्ठे के साथ पंद्रह दिन तक सेवन करें। यह दवा कफ की संग्रहणी के लिए बहुत उपयोगी है।
*कैथ 8 भाग, मिसरी 8 भाग, पीपल 3 भाग, अजमोद 3 भाग, बेल की गिरी 3 भाग, धाय के फूल 3 भाग, अनारदाना 8 भाग, काला नमक 1 भाग, नागकेसर 1 भाग, पीपलामूल 1 भाग, नेत्रवाला 1 भाग, इलायची 1 भाग। इन सबको पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण मट्ठे के साथ नित्य सुबह-शाम सेवन करें।बेल की जड़, कैथ की जड़, सोनापाढ़ा की जड़, कटाई अरनी की जड़, छोटी कटाई, सहजन की जड़, सोंठ, पीपल, चक, भिलावां, अजवाइन, पीपलामूल, जवाखार, पांचों नमक। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण नित्य सुबह-शाम गाय के मट्ठे के साथ 15 दिन तक सेवन करें।
*सज्जीखार, जवाखार, खारा नमक, काला नमक, सेंधा नमक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, अजमोद, चित्रक, पीपलामूल, भुनी हुई हींग, झरबेरी के क्वाथ या मट्ठे के साथ सबको पीसकर आधा चम्मच चूर्ण प्रतिदिन सेवन करें। सभी दवाइयों की मात्रा बराबर की होगी।
*नागरमोथा, बेलगिरी, इन्द्र यव, सुगंध वाला तथा मोचरस। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को बकरी के दूध में डालकर पकाएं। इसके बाद इसमें से एक चम्मच चटनी का प्रतिदिन सेवन करें।
जातिफलादि चूर्ण या गंगाधर चूर्ण में से एक 3-6 ग्राम सुबह दोपहर शाम मट्ठे के साथ प्रयोग करें।
*वातानुलोमन के लिए तक्र (मट्ठे) के साथ हिंग्वाष्टक चूर्ण वात की संग्रहणी में, यवानी षाडव चूर्ण पित्त संग्रहणी में और लवण भास्कर चूर्ण कफ की संग्रहणी में उत्तम हैं। मात्रा आधा चम्मच दिन में तीन बार।
काली मिर्च, चीते की जड़ की छाल तथा सेंधा नमक। तीनों को बराबर की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा-आधा चम्मच चूर्ण सुबह-शाम मट्ठे के साथ सेवन करें।
*कच्चे बेल का गूदा तथा सोंठ, दोनों को बराबर की मात्रा में लेकर अच्छी तरह घोट लें। इसमें दवा से दोगुनी मात्रा में पुराना गुड़ मिलाकर चने से तीन गुनी बड़ी गोली बना लें। इसमें से एक-एक गोली सुबह-शाम मट्ठे के साथ सेवन करें।
*इस रोग की उत्तम
 दवा पंचामृत पर्पटी  है  । इसे चिकित्सक की देख-रेख में लें।
संग्रहणी का होम्योपैथिक उपचार
*पेट में गड़बड़ी, खाना का बिना पचे ही निकलना, बदहजमी, पेट फूलना, अम्ल, मितली, वमन आदि लक्षणों में पापुलस ट्रिमुलायड्स दें।खाया हुआ भोजन न पचना, पेट में दर्द, ऐंठन, मरोड़, कब्ज, थोड़ी-थोड़ी देर बाद शौच लगना, पेट में मरोड़, पेट में वायु का इकट्ठी होना, मुंह में पानी आना आदि लक्षणों में नक्स वोमिका 2x, 6 दें।
थोड़ा-सा खाते ही शौच की इच्छा, खाई हुई वस्तु का न पचना, पाकस्थली में अग्नि मंद आदि लक्षणों में फेरम आयोड 3x दें।
*भोजन न पचता हो, मिचली आती हो, प्यास अधिक लगती हो, खाया अन्न बिना पचे ही निकल जाता हो। इन सब लक्षणों में सीपिया 30 का सेवन करें।
*तेल-घी, चर्बी आदि से पके पदार्थों को खाने से भोजन न पचता हो, खट्टी डकारें आती हों, वायु नीचे की ओर न जाती हो, तो पोडियम 12 का प्रयोग करें।
*बिना पचे खाद्य शौच में निकलना, वमन, अधिक प्यास लगती हो। इन लक्षणों में सोरियम आक्जैलिकम 1x वि. का प्रयोग करें।
*पाचन शक्ति की दुर्बलता के कारण भोजन बिना पचे ही दस्त से निकले, किसी भी भोज्य-पदार्थ का हजम न होना, सावधानी से खाने-पीने के बाद भी पेट का खराब होना, मुंह का स्वाद हर समय खट्टा रहे, पेट में दर्द, कब्ज की शिकायत। इन सब लक्षणो में हिपर सल्फर 3x, 30 दें

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

आयुर्वेदिक चूर्ण विवरण

हिंग्वाष्टक चूर्ण : पेट की वायु को साफ करता है तथा अग्निवर्द्धक व पाचक है। अजीर्ण, मरोड़, ऐंठन, पेट में गुड़गुड़ाहट, पेट का फूलना, पेट का दर्द, भूख न लगना, वायु रुकना, दस्त साफ न होना  अपच के दस्त आदि में पेट के रोग नष्ट होते हैं तथा पाचन शक्ति ठीक काम करती है। मात्रा 3 से 5 ग्राम घी में मिलाकर भोजन के पहले अथवा सुबह-शाम गर्म जल से भोजन के बाद।
व्योषादि चूर्ण : श्वास, खांसी, जुकाम, नजला, पीनस में लाभदायक तथा आवाज साफ करता है। मात्रा 3 से 5 ग्राम सायंकाल गुनगुने पानी से।
शतावरी चूर्ण : धातु क्षीणता, स्वप्न दोष व वीर्यविकार में, रस रक्त आदि सात धातुओं की वृद्धि होती है। शक्ति वर्द्धक, पौष्टिक, बाजीकर तथा वीर्य वर्द्धक है। मात्रा 5 ग्राम प्रातः व सायं दूध के साथ।
स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण (सुख विरेचन चूर्ण) : हल्का दस्तावर है। बिना कतलीफ के पेट साफ करता है। खून साफ करता है तथा नियमित व्यवहार से बवासीर में लाभकारी। मात्रा 3 से 6 ग्राम रात्रि सोते समय गर्म जल अथवा दूध से।



सारस्वत चूर्ण :
दिमाग के दोषों को दूर करता है। बुद्धि व स्मृति बढ़ाता है। अनिद्रा या कम निद्रा में लाभदायक। विद्यार्थियों एवं दिमागी काम करने वालों के लिए उत्तम। मात्रा 1 से 3 ग्राम प्रातः -सायं मधु या या दूध से।
सितोपलादि चूर्ण : पुराना बुखार, भूख न लगना, श्वास, खांसी, शारीरिक क्षीणता, अरुचि जीभ की शून्यता, हाथ-पैर की जलन, नाक व मुंह से खून आना, क्षय आदि रोगों की प्रसिद्ध दवा। मात्रा 1 से 3 गोली सुबह-शाम शहद से  |
अग्निमुख चूर्ण (निर्लवण) : उदावर्त, अजीर्ण, उदर रोग, शूल, गुल्म व श्वास में लाभप्रद। अग्निदीपक तथा पाचक। मात्रा 3 ग्राम प्रातः-सायं उष्ण जल से।
अजमोदादि चूर्ण : जोड़ों का दुःखना, सूजन, अतिसार, आमवात, कमर, पीठ का दर्द व वात व्याधि नाशक व अग्निदीपक। मात्रा 3 से 5 ग्राम प्रातः-सायं गर्म जल से अथवा रास्नादि काढ़े से।
त्रिकटु चूर्ण : खांसी, कफ, वायु, शूल नाशक, व अग्निदीपक। मात्रा 1/2 से 1 ग्राम प्रातः-सायंकाल शहद से।




सैंधवादि चूर्ण : अग्निवर्द्धक, दीपन व पाचन। मात्रा 2 से 3 ग्राम प्रातः व सायंकाल पानी अथवा छाछ से।
सुदर्शन (महा) चूर्ण : सब तरह का बुखार, इकतरा, दुजारी, तिजारी, मलेरिया, जीर्ण ज्वर, यकृत व प्लीहा के दोष से उत्पन्न होने वाले जीर्ण ज्वर, धातुगत ज्वर आदि में विशेष लाभकारी। कलेजे की जलन, प्यास, खांसी तथा पीठ, कमर, जांघ व पसवाडे के दर्द को दूर करता है। मात्रा 3 से 5 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ।
सुलेमानी नमक चूर्ण : भूख बढ़ाता है और खाना हजम होता है। पेट का दर्द, जी मिचलाना, खट्टी डकार का आना, दस्त साफ न आना आदि अनेक प्रकार के रोग नष्ट करता है।  पेट की वायु शुद्ध करता है। मात्रा 3 से 5 ग्राम घी में मिलाकर भोजन के पहले अथवा सुबह-शाम गर्म जल से भोजन के बाद।
त्रिफला चूर्ण : कब्ज, पांडू, कामला, सूजन, रक्त विकार, नेत्रविकार आदि रोगों को दूर करता है तथा रसायन है। पुरानी कब्जियत दूर करता है। इसके पानी से आंखें धोने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। मात्रा 1 से 3 ग्राम घी व शहद से तथा कब्जियत के लिए 5 से 10 ग्राम रात्रि को जल के साथ।
श्रृंग्यादि चूर्ण : बालकों के श्वास, खांसी, अतिसार, ज्वर में। मात्रा 2 से 4 रत्ती प्रातः-सायंकाल शहद से।
माजून मुलैयन : हाजमा करके दस्त साफ लाने के लिए प्रसिद्ध माजून है। बवासीर के मरीजों के लिए श्रेष्ठ दस्तावर दवा। मात्रा रात को सोते समय 10 ग्राम माजून दूध के साथ।

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

महिलाओं की कमजोरी दूर करने वाली घरेलू आयुर्वेदिक दवा

 
महिलाएं अपने फिगर को परफेक्ट बनाने के लिए वर्क आऊट या योगासन करती हैं। लेकिन श्वेत रक्त प्रदर, रक्त प्रदर , मासिक धर्म की अनियमितता, कमजोरी दुबलापन, सिरदर्द, कमरदर्द आदि। ये सभी बीमारियां ऐसी हैं जिनके कारण महिलाएं शरीर को स्वस्थ और सुडौल नहीं रहने देती हैं। इसलिए हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसा आयुर्वेदिक नुस्खा जो महिलाओं की हर तरह की कमजोरी को दूर करता है।नुस्खा- 
स्वर्ण भस्म या वर्क 10 ग्राम, मोती पिष्टी 20 ग्राम, शुद्ध हिंगुल 30 ग्राम, सफेद मिर्च 40 ग्राम, शुद्ध खर्पर 80 ग्राम। गाय के दूध का मक्खन 25 ग्राम थोड़ा सा नींबू का रस पहले स्वर्ण भस्म या वर्क और हिंगुल को मिला कर एक जान कर लें। फिर शेष द्रव्य मिलाकर मक्खन के साथ घुटाई करें। फिर नींबु का रस कपड़े की चार तह करके छान लें और इसमें मिश्रण मिलाकर चिकनापन दूर होने तक घुटाई करनी चाहिए।आठ-दस दिन तक घुटाई करनी होगी। फिर उसकी एक-एक रत्ती की गोलियां बना लें।



सेवन की विधि- 
 1 या 2 गोली सुबह शाम एक चम्मच च्यवनप्राश के साथ सेवन करें। इस दवाई का सेवन करने से महिलाओं को प्रदर रोग, शारीरिक क्षीणता, और कमजोरी आदिसे मुक्ति मिलती है और शरीर स्वस्थ और सुडौल बनता है। यह दवाई ''स्वर्ण मालिनी'' वसंत के नाम से बाजार में भी मिलती है। इसके सेवन से शरीर बलशाली होता है। शरीर के सभी अंगों को ताकत मिलती है।

बुधवार, 15 मार्च 2017

कब्ज(Constipation) की प्राकृतिक चिकित्सा

   

 आकस्मिक दुर्घटनाओं को छोड़कर सभी रोगों की माता पेट की खराबी कब्ज है। इसमें मलनिष्कासक अंग कमजोर हो जाने के कारण शरीर से मल पूरी तरह नहीं निकलता और आँतों में चिपककर एकत्र होता रहता है। अधिक दिनों तक पड़े रहने से वह सड़ता रहता है और तरह-तरह की शिकायतें पैदा करता है तथा बड़ी बीमारियों की भूमिका बनाता है। इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में सबसे पहले कब्ज की ही चिकित्सा की जाती है। एक बार कब्ज कट जाने पर रोगी का स्वस्थ होना मामूली बात रह जाती है।
कब्ज के कारण
* अहितकर भोजनः- 

आधुनिक जीवन शौली की अंधी दौड़ में चीनी, चाय, काॅफी,नशे की चीजें, मसाले, तले-भुने खाद्य, मैदा से बनी चीजें, गरिष्ठ भोजन, फास्टफूड,ब्रेड, बिस्किट, बरगर, चाउमीन, पेस्टी, पेटीज आदि का प्रचलन इस रोग का कारण है। आजकल चोकर निकाले आटे की रोटी, कण निकाले हुए चावल का माॅड रहित भात,बिना छिलके की दाल एवं सब्जियाॅं सभ्यता की पहचान बन जाने के कारण कब्ज हो जाना स्वाभाविक ही है।
* अनियमित भोजन क्रमः- 

प्रकृति का नियम है कि जब भूख लगे तब भोजन करें,जब प्यास लग तब पानी पीएॅं। भोजन करते समय पानी पीते रहने की आदत गलत है,इससे पाचक रसे अपना कार्य सही ढंग से नहीं कर पाते, आमाश्य का आवश्यक तापक्रम भी गड़बड़ा जाने से पाचन क्रिया बाधित होती है। भोजन के डेढ़-दो घंटे बाद पानी पीना चाहिए। भोजन करते समय चित्त प्रसन्न रखें। मन तनाव, चिंता, भय, क्रोध,आवेश अदि तिव्रमनोेवेग से ग्रस्त हो, तब भोजन न करें तों ही अच्छा है। ऐसे समय में किया गया भोजन ठीक तरह नहीं पचता है। भोजन करतें समय खूग चबा-चबाकर भोजन को पानी की तरह पतला बनाकर ही निगलें, इस नियम पालन से आॅतों की सर्पिल गति (पंरिस्टाल्टिक मूवमेंट) सुचारू रूप से चलती हैए जिससे कब्ज नहीं होता है तथा मुॅंह में स्थित लार ग्रंथियों से पाचक-रस निकलकर भोजन से मिलकर पाचन में सहायक होता है।



*शौच रोकनाः- 

शौच नियमित समय पर ही जाना चाहिए। शौच की इच्छा होने पर रोकना नहीं चाहिए। मल एवं मूत्र के वेग को रोकने से कई व्याधियाॅं जन्म लेती हैं। पखाने की शंका हो तब भी तुरंत जाना चाहिए। यह स्मरणीय तथ्य है कि शौच की इच्छा होने पर बार-बार उपेक्षा करने से नाड़ी मस्तिष्क को आदत पड़ जाती है कि वह मलाश्य को मल निष्कासन की आज्ञा संबंधित नाड़ियों द्वारा न भेजे, फलतः कब्ज की स्थिति बन जाती है।
* अन्य कारणः- 
*व्यायाम एवं श्रम का अभाव भी इस रोग को जन्म देता है। 
*नशीली वस्तुएॅं- तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, चाय, काॅफी, अफीम, चरस तथा शराब आदि उत्तेजक पदार्थ होने के कारण शरीर की नस-नाड़ियों को कमजारे कर देते हैं। इसलिए इनसे कब्ज होता है। देर रात तक जागने से *अपर्याप्त निद्रा का प्रभाव बड़ी आॅंत पर पड़ता है, जिससे कब्ज होता है।
*भोजन में सलाद, छिलकायुक्त अनाज, चोकरयुक्त आटे की रोटी न होने के कारण कब्ज होता है। मानसिक असंतुलन, अवसाद आदि मानसिक रोगी को भी कब्ज होती है।कम चलना या काम करना
*कुछ खास दवाओं का सेवन करना
*बड़ी आंत में घाव या चोट के कारण यानि बड़ी आंत में कैंसर
*थायरॉयड हार्मोन का कम बनना
*अप्राकृतिक जीवन शैली
*कम रेशायुक्त भोजन का सेवन करना
*शरीर में पानी का कम होना
*कैल्सियम और पोटैशियम की कम मात्रा
*मधुमेह के रोगियों में पाचन संबंधी समस्या
*कंपवाद (पार्किंसन बीमारी)
लक्षण :
   कब्ज, पाचन तंत्र की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कोई व्यक्ति (या जानवर) का मल 
बहुत कडा हो जाता है तथा मलत्याग में कठिनाई होती है। कब्ज अमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था है, जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती है, मल कड़ा हो जाता है, उसकी आवृति घट जाती है या मल निष्कासन के समय अत्यधिक बल का प्रयोग करना पड़ता है। कब्ज के रोगी को सिर में भारीपन या दर्द बना रहता है | 
    गैस,एसिडिटी,अजीर्ण आदि लक्षण भी प्रगट होने लगते हैं |अनियमित दिनचर्या और खान-पान के कारण कब्‍ज और पेट गैस की समस्‍या आम बीमारी की तरह हो गई है। कब्‍ज रोगियों में पेट फूलने की शिकायत भी देखने को मिलती है। लोग कहीं भी और कुछ भी खा लेते हैं। खाने के बाद बैठे रहना, डिनर के बाद तुरंत सो जाना ऐसी आदतें हैं जिनके कारण कब्‍ज की शिकायत शुरू होती है। पेट में गैस बनने की बीमारी ज्‍यादातर बुजुर्गों में देखी जाती है लेकिन यह किसी को भी और किसी भी उम्र में हो सकती है।
कब्ज पाचन शक्ति को बहुत कमजोर कर देता है और सब कुछ खाते रहने पर भी व्यक्ति कमजोर ही रहता है। ऐसी स्थिति में पाचन शक्ति को मजबूत करने के लिए हर तीन दिन बाद पेड़ू पर पहले गर्म पानी से तीन मिनट पोंछा लगाना चाहिए, फिर ठंडे पानी से 1-2 मिनट पोंछा लगाना चाहिए।



कब्ज की प्राकृतिक चिकित्सा-

कब्ज न हो, इसके लिए खान-पान में सुधार करना आवश्यक है। उन वस्तुओं से बचना चाहिए जिनके कारण कब्ज हुआ था। मौसम के अनुसार अमरूद, सेब, सन्तरा आदि फल और गाजर, मूली, ककड़ी, खीरा आदि सब्जियां कच्ची खानी चाहिए। प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में पानी भी पीना चाहिए। यदि सप्ताह में एक बार उपवास या रसाहार भी कर लिया जाय, तो कभी कब्ज होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
प्रातः खाली पेट : पेट पर 10 मिनट गर्म सेंक देने के बाद 45 मिनट के लिए पेट पर मिटटी की पट्टी लगायें उसके बाद गुनगुने पानी का एनिमा दें |
यह क्रम लगातार एक सप्ताह तक दोहराएँ |
आहार चिकित्सा :
प्रातः – उषापान
नाश्ते में – गेहूं का दलिया या कोई मौसमी फल |
दोपहर भोजन – हरी सब्जी (बिना मिर्च-मसाले की) + सलाद + चोकर समेत बनी आंटे की रोटी |
4:00 बजे- सब्जियों का सूप 250 मिली.|
रात्रि भोजन – मिक्स वेजिटेबल दलिया या कोई हरी सब्जी + चोकर सहित आंटे की रोटी |
रेशायुक्त भोजन का अत्यधित सेवन करना, जैसे साबूत अनाज
ताजा फल और सब्जियों का अत्यधिक सेवन करना
पर्याप्त मात्रा में पानी पीना
वसा युक्त भोजन का सेवेन कम करे
*नमक ,छोटी हरड और काला नमक समान मात्रा में मि‍लाकर पीस लें। नि‍त्‍य रात को इसकी दो चाय की चम्‍मच गर्म पानी से लेने से दस्‍त साफ आता हैं।
ईसबगोल – दो चाय चम्‍मच ईसबगोल 6 घण्‍टे पानी में भि‍गोकर इतनी ही मि‍श्री मि‍लाकर जल से लेने से दस्‍त साफ आता हैं। केवल मि‍श्री और ईसबगोल मि‍ला कर बि‍ना भि‍गोये भी ले सकते हैं।
*चना – कब्‍ज वालों के लि‍ए चना उपकारी है। इसे भि‍गो कर खाना श्रेष्‍ठ है। यदि‍ भीगा हुआ चना न पचे तो चने उबालकर नमक अदरक मि‍लाकर खाना चाहि‍ए। चेने के आटे की रोटी खाने से कब्‍ज दूर होती है। यह पौष्‍ि‍टक भी है। केवल चने के आटे की रोटी अच्‍छी नहीं लगे तो गेहूं और चने मि‍लाकर रोटी बनाकर खाना भी लाभदायक हैं। एक या दो मुटठी चने रात को भि‍गो दें। प्रात: जीरा और सौंठ पीसकर चनों पर डालकर खायें। घण्‍टे भर बाद चने भि‍गोये गये पानी को भी पी लें। इससे कब्‍ज दूर होगी।
*मैथी – के पत्‍तों की सब्‍जी खाने से कब्‍ज दूर हो जाती है।
गेहूं के पौधों (गेहूँ के जवारे) का रस लेने से कब्‍ज नहीं रहती है।
*धनि‍याँ – सोते समय आधा चम्‍मच पि‍सी हुई सौंफ की फंकी गर्म पानी से लेने से कब्‍ज दूर होती है।
*दालचीनी – सोंठ, इलायची जरा सी मि‍ला कर खाते रहने से लाभ होता है।
बेल – पका हुआ बेल का गूदा पानी में मसल कर मि‍लाकर शर्बत बनाकर पीना कब्‍ज के लि‍ए बहुत लाभदायक हैं। यह आँतों का सारा मल बाहर नि‍काल देता है।



*नीबू –
नींबू का रस गर्म पानी के साथ रात्रि‍ में लेने से दस्‍त खुलकर आता हैं। नीम्‍बू का रस और शक्‍कर प्रत्‍येक 12 ग्राम एक गि‍लास पानी में मि‍लाकर रात को पीने से कुछ ही दि‍नों में पुरानी से पुरानी कब्‍ज दूर हो जाती है।
*नारंगी – सुबह नाश्‍ते में नारंगी का रस कई दि‍न तक पीते रहने से मल प्राकृति‍क रूप से आने लगता है। यह पाचन शक्‍ति‍ बढ़ाती हैं।
*टमाटर- कब्‍ज दूर करने के लि‍ए अचूक दवा का काम करता है। अमाशय, आँतों में जमा मल पदार्थ नि‍कालने में और अंगों को चेतनता प्रदान करने में बडी मदद करता है। शरीर के अन्‍दरूनी अवयवों को स्‍फूर्ति‍ देता है।
*कब्ज का प्रमुख कारण शरीर मे तरल की कमी होना है। पानी की कमी से आंतों में मल सूख जाता है और मल निष्कासन में जोर लगाना पडता है। अत: कब्ज से परेशान रोगी को दिन मे २४ घंटे मे मौसम के मुताबिक ३ से ५ लिटर पानी पीने की आदत डालना चाहिये। इससे कब्ज रोग निवारण मे बहुत मदद मिलती है।
* भोजन करते समय मन को शांत रखें धीरे-धीरे ठीक तरह चबाकर आधा घंटे में भोजन करें। शाम का भोजन सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए।
* स्वाद के नाम पर आचार, मिर्च-मसालों से बचें। ताजी चटनी ले सकते हैं।
* अमरूद, नाशपाती, सेब, संतरा, पपीता, मौसमी आदि फल तथा गाजर, मूली,टमाटर, पत्तागोभी, चुकंदर, खीरा, ककड़ी आदि की सलाद को भोजन में सम्मिलित करें। पक्का बेलफल पेट रोगों में बड़ा लाभकारी है।

* प्रातः काल उठकर पानी पीना तथा सोते समय पानी पीने का क्रम अवश्य बना लें।
*भोजन के एक घंटे पूर्व तथा भोजन के दो घंटे बाद पर्याप्त पानी पीते रहें।
*भोजन के तत्काल बाद वज्रासन की स्थिति में १० मिनट अनिवार्य रूप से बैठना चाहिए। भोजन करने के तत्काल बाद भाग-दौड़ करने से पाचन गड़बड़ा जाता है।
* फास्ट फूड, जंग फूड, मैदा, चीनी एवं मिठाइयों से बचें।
* कड़ी भूख लगने पर भोजन करें। भोजन में कच्ची सब्जियाॅं (सलाद) तथा छिलकेयुक्त दाल, चोकरयुक्त आटा की रोटी हो।
* सूर्यभेदी प्राणायाम, सर्वांगासन, मत्स्यासन, भुजंगासन, योगमुद्रा, हलासन,पश्चिमोŸाासन तथा नौली आदि यौगिक क्रियाएॅं पाचन संस्थान को सुदृढ़ बनाती हैं।
* इन क्रियाओं को प्रातः नित्य अपनाएॅं। आॅंतों की स्वाभाविक शक्ति लौैटाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का निम्न सरल क्रम अपनाना चाहिए।
*प्रातः ४.४५ बजे जागरण तथा आधा नींबू एक-डेढ़ गिलास पानी में निचोड़कर पीएॅं,
शौच जाएॅं।
* तत्पशचात् १० मिनट कटि स्नान लेकर खुली हवा में टहलने निकल जाएॅं। लगभग ४-५ किलोमिटर अवश्य टहलें। कमजोरी हो तों अपनी क्षमतानुसार टहलें या लेटकर विश्राम करें। टहलने के बाद कुछ योगासन-व्यायाम करें। फिर ठंडे पानी से हाथ से रगड़कर स्नान करें।
* उपासना, ध्यान आदि के बाद नाश्ता करें। नाश्तें में २५० ग्राम ताजे फल, ५० ग्राम किशमिश या मुनक्के पानी में रातभर भिगोए हुए तथा ४० ग्राम अंकुरित अन्न खूब चबाकर खाएॅं।



*प्रातः ७ बजे
पेडू पर मिट्टी की पट्टी (२० मिनट) इसके बाद एनिमा लेकर कोष्ठ साफ करें।
* दोपहर ११ बजे भोजन- २ या ३ गेहॅंू के चोकरदार आटे की रोटी, सब्जी, ३५० ग्राम हरी सब्जी बिना मिर्च-मसाले की १५० ग्राम सलाद तथा १०० ग्राम ताजी दहीं लें।
* अपराहृ २ बजे- मौसम के अनुसार उपलब्ध किसी एक फल का रस २५० ग्राम या गाजर का जूस या सब्जियों का सूप।
* शाम का भोजन-
दोपहर की तरह। यदि इस भोजन क्रम से भी लाभ न हो तों ३ दिन फलाहार दिन में ३-३ घंटे के अंतर से २५० ग्राम ताजे फल लें। यदि फल उपलब्ध नहीं हों तब २५०-२५० ग्राम उबली सब्जी ले सकते हैं। तीन दिन रसाहार-रसाहार में फलों का रस ३-३ घंटे के अंतर से २५० ग्राम लें। (यदि फल उपलब्ध न हों तों हरी सब्जियों का सूप बनाकर ले सकते हैं।) तीन दिन का उपवास-उपवास में मात्र नींबू का रस मिलाकर पानी पीते रहें। दिनभर में ४ नींबू ले सकते हैं। शुद्ध शहद २-२ चम्मच तथा आधा नींबू एक गिलास पानी में लेते रहिए। दिनभर में साढ़े तीन-चार लीटर पानी अवश्य पीएॅं। अब उपवास के बाद रसाहार फिर फलाहार १-१ दिना अपनाकर भोजन का क्रम अपनाना चाहिए। भोजन में धीरे-धीरे पूर्णाहार लेना चाहिए। पहले दिन १ रोटी दूसरे दिन २ रोटी तीसरे दिन ३ रोटी लेकर पूर्ण भोजन क्रम अपनाना चाहिए। आॅंतों को एकदम बोझ डालने से उपवास का लाभ नहीं मिलता। अभी अल्पकालीन तीन दिन उपवास का क्रम ही बताया जा रहा है। घर में रहकर लंबे उपवास नहीं किए जा सकते उसके लिए प्राकृतिक चिकित्सालय में रहकर उचित देखरेख में १५ दिन का उपवास कर सकते हैं। रसादार, फलाहार, उपवास में नित्य मिट्टी की पट्टी देने के बाद एनिमा लेना अनिवार्य है। एनिमा द्वारा आॅंतों में स्थित मल एवं विष बाहर निकलता है। यदि मिट्टी की पट्टी न उपलब्ध हो सके तों एक सूती तौलिया को चार परत कर लें,ठंडे पानी में भिगोकर पेट पर रखें। इससे ठंडक पहुॅंचाकर आॅंतों की क्रियाशीलता व शक्ति बढ़ाई जा सकती है। १०-१५ मिनट तक बदल-बदलकर ठंडी तौलिया पेट पर रखें। रात को सोते समय पेट को ठंडे पानी से भीगी सूती पट्टी की लपेट देकर ऊपर से ऊनी कपड़े की पट्टी लपेट दें।
* एनिमा केवल हल्के गरम पानी (शरीर के तापमान का) लिया जाता है। एनिमा पात्र में एक लीटर लगभग पानी लें तथा एनिमा के नाॅजल में रबर की नली (केथेटर) लगा लें, जिससे एनिमा लेते समय मलद्वार में खरोंच का खतास न रहे। केथेटर मेडिकल स्टोरों में उपलब्ध रहता है। एनिमा में साबुन का पानी या ग्लिसरीन का एनिमा नुकसानदायक है। पानी में नींबू का रस मिला सकते हैं।
*एनिमा उपचार काल में नित्य लेते रहें, परंतु हमेशा लेते रहने की आदत न डालें। यह शरीर शोधन के लिए उपयोगी हैं तथा यौगिक बस्तिक्रिया का सरल विकल्प है।
* त्रिफला चूर्ण एक तोला लगभग, नींबू रस मिले जल से प्रातः लें केवल पांच सात दिन ताकि पुराना जमा मल एक बार साफ हो जाए। लम्बे समय तक प्रयोग न करें।

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

काली हल्दी के उपचार प्रयोग टोटके


      जो व्यक्ति अपने जीवन में काली हल्दी का प्रयोग करते है उन्हें अपने जीवन में अनेक तरह की बाधाओं से निजात मिलती है और वे सुख समृद्धि का जीवन व्यतीत करते है. माना जाता है कि काली हल्दी से किये गए टोटके हमेशा सफल होते है और बड़े काम आते है, किन्तु ये हल्दी आसानी से प्राप्त नहीं होती बहुत कम पंसारी है जिनके पास ये उपलब्ध होती है लेकिन आप उनसे इस लाभदायी काली हल्दी को मंगा जरुर सकते हो
हल्दी को मसाले के रूप में भारत में बहुत प्राचीन समय से उपयोग में लाया जा रहा है। पीली हल्दी को बहुत शुद्ध माना जाता है इसलिए इसका उपयोग पूजा में भी किया जाता है। हल्दी की अनेक प्रजातियां हैं लेकिन पीली हल्दी के अलावा काली हल्दी से पूजा की जाती है 

*तंत्र की दुनियां में काली हल्दी का प्रयोग विभिन्न तरह के टोटको में किया जाता है। काली हल्दी को धन व बुद्धि का कारक माना जाता है। काली हल्दी का सेवन तो नहीं किया जाता लेकिन इसे तंत्र के हिसाब से बहुत पूज्यनीय और उपयोगी माना जाती है। अनेक तरह के बुरे प्रभाव को कम करने का काम करती है।
    *इस हल्दी का मुख्य प्रयोग होली के आसपास या होली के दिन किया जाते है, इसका तंत्र क्रियाओं में अहम स्थान है और होली के दिन तो इसे अभिमंत्रित करके या इसके साथ कुछ जड़ी बूटियों को अभिमंत्रित व मन्त्रों से सिद्ध करके घर लाया जाता है. अगर आप किसी को अपने वश में करना चाहते है तो उसके लिए काली हल्दी सर्वोत्तम है. ये हल्दी अंदर से तो हल्की काली होती है जबकि इसका पौधा केली के पौधे की तरह दिखाई देता है.
नीचे लिखे इसके कुछ उपायों को अपनाकर आप भी जिन्दगी से कई तरह के दुष्प्रभावों को मिटा सकते हैं।
*काली हल्दी को पीली हल्दी से ज्यादा फायदेमंद और गुणकारी माना जाता है. काली हल्दी बहुत दुर्लभ मात्रा में पाई और देखी जाती है. काली हल्दी दिखने में अंदर से हल्के काले रंग की होती है व उसका पौधा केली के समान होता है. खास बात यह है कि कहा जाता है – काली हल्दी से जुड़े टोटके खाली नहीं जाते हैं.



*काली हल्दी के पौधे को कंकू, पीले चावल से आमंत्रित कर होली वाले दिन लाया जाता है।

आमंत्रित करने का तरीका
*एक थाली में कंकू, चावल, अगरबती, एक कलश में शुद्ध जल रख, पवित्र कोरे वस्त्र पहन कर जाएं। फिर पौधे को शुद्ध जल से धोकर कंकू चढ़ाएं व पीले चावल चढ़ाकर 5 अगरबत्ती लगाकर कहें- मैं आपके पास अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु आया हूं कल आपको मेरे साथ मेरी मनोकामना की पूर्ति हेतु चलना है। फिर होली की रात को जाकर एक लोटा जल चढ़ाकर कहें कि मैं आपके पास आया हूं, आप चलिए मेरी मनोकामना की पूर्ति हेतु। इस प्रकार काली हल्दी (यह जड़ होती है) खोदकर ले आएं। बस यही आपके काम की है।
*परिवार में कोई व्यक्ति हमेशा अस्वस्थ रहता है तो प्रथम गुरुवार को आटे के 2 पेड़े बनाएं। उसमें गीली चने की दाल के साथ गुड़ और थोड़ी-सी पिसी काली हल्दी को दबाएं। रोगी के ऊपर से 7 बार उतारकर गाय को खिला दें।यह उपाय लगातार 3 गुरुवार करने से आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा।
*यदि पत्रिका में गुरु और शनि पापाक्रांत हैं, तो यह उपाय करें - शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से नियमित रूप से काली हल्दी पीसकर तिलक लगाने से यह दोनों ग्रह शुभ फल देने लगते हैं।



*यदि किसी के पास पैसा आता तो बहुत है किंतु रुकता नहीं है, तो उन्हें इन उपायों को अवश्य आजमाना चाहिए। शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को चांदी की डिब्बी में काली हल्दी, नागकेसर व सिन्दूर को साथ में रखकर मां लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श करवाकर रुपया-पैसा रखने के स्थान पर रख दें। इस उपाय से धन रुकने लगेगा।

रोग नाशक टोटके
*यदि परिवार में कोई व्यक्ति निरन्तर अस्वस्थ्य रहता है, तो प्रथम गुरूवार को आटे के दो पेड़े बनाकर उसमें गीली चने की दाल के साथ गुड़ और थोड़ी सी पिसी काली हल्दी को दबाकर रोगी व्यक्ति के उपर से 7 बार उतार कर गाय को खिला दें। यह उपाय लगातार 3 गुरूवार करने से आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा।
*यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को नजर लग गयी है, तो काले कपड़े में हल्दी को बांधकर 7 बार उपर से उतार कर बहते हुये जल में प्रवाहित कर दें|
*काली हल्दी का चूर्ण दूध में डालकर चेहरे और शरीर पर लेप करने से त्वचा में निखार आ जाता है।
*यदि आपका व्यवसाय मशीनरी से संबंधित है और आए दिन कोई न कोई मशीन खराब होती है तो आप काली हल्दी को पीसकर केसर व गंगा जल मिलाकर प्रथम बुधवार को उस मशीन पर स्वस्तिक बना दें। इस उपाय से मशीन जल्दी -जल्दी खराब नहीं होगी।
*काली हल्दी के 108 दाने बनाएं। उन्हें धागे में पिरोकर धूप, गूगल और लोबान से धूनी देने के बाद पहन लें। जो भी व्यक्ति इस माला को पहनता है, वह ग्रहों के दुष्प्रभावों व नजरादि टोने-टोटके से सुरक्षित रहता है|
*यदि कोई व्यक्ति मिर्गी या अपस्मार (पागलपन) से पीड़ित हो तो किसी अच्छे मूहूर्त (सर्वार्थसिद्धि योग) में काली हल्दी को कटोरी में रखकर लोबान की धूप दिखाकर शुद्ध करें। तत्पश्चात एक टुकड़े में छेद कर धागे की मदद से उसके गले में पहना दें और नियमित रूप से कटोरी की थोड़ी-सी हल्दी का चूर्ण ताजे पानी से सेवन कराते रहें, अवश्य लाभ मिलेगा।



*नमक और हल्दी का वशीकरण के लिए बहुत लोकप्रिय है इसके द्वारा किसी को भी अपने वस में कर लेने की बात कही जाती है. वैसे तो इंसान हर वस्तु का प्रयोग अपनी आस्था, समझ, ज्ञान, विश्वास, और भ्रम के आधार पर अनेक प्रकार से करता है. वैसे ही काली हल्दी का प्रयोग भी अन्धविश्वासी, तांत्रिक , वैद्य, सब अलग अलग तरीके से करते हैं.

*काली हल्दी मजबूत एंटीबायोटिक गुणों के साथ चिकित्सा में जडी़ – बूटी के रूप में उपयोग की जाती हैं. इसका प्रयोग घाव, मोच, त्वचा, पाचन तथा लीवर की समस्याओं के निराकरण के लिए किया जाता है. उसकी साखें कोलस्ट्राँल को कम करने में मदद करती है.
*गुरुपुष्य-योग में काली हल्दी को सिंदूर में रखकर धुप देने के बाद लाल कपड़े में लपेटकर एक दो सिक्को के साथ उसे बक्से में रख दें। इसके प्रभाव से धन की वृद्धि होने लगती है।
आरोग्य जीवन के लिए ( For Healthy Life ) :

 अगर परिवार में बीमारियाँ वास करती है और घर का कोई न कोई सदस्य हमेशा बीमार पड़ा रहता है तो आपको गुरूवार के दिन का चुनाव करना है और गेहूँ के आटे से 2 पेड़ियाँ बनानी है. अब इन पेड़ियों में थोड़ी सी पीसी हुई काली हल्दी, गुड और गीली चने की दाल मिलायें, फिर इन पेड़ियों को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार घडी की दिशा की तरह घुमाएं और किसी गाय को खिलाएं. ये उपाय आपको 3 गुरूवार तक अपनाना है, आपको आश्चर्यजनक तरीके से लाभ प्राप्ति होगी और पीड़ित भी धीरे धीरे स्वस्थ होने लगेगा.

सोमवार, 6 मार्च 2017

बेल पत्र के औषधीय प्रयोग


   भगवान शिवजी की को अर्पित किया जाने वाला बेलपत्र, सिर्फ पूजा मात्र का ही एक साधन नहीं है, बल्कि आपके स्वास्थ्य के लिए भी यह बेहद फायदेमंद है। बेलपत्र का आयुर्वेदिक महत्व। बेल का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्त्व हैं, ये एक धार्मिक पेड़ भी है और इसका आयुर्वेदिक महत्व भी बहुत ज़्यादा हैं। ये अनेक रोगो में गुणकारी हैं। आइये जाने इसके फायदे —
  * हृदय रोगियों के लिए भी बेलपत्र का प्रयोग बेहद फायदेमंद है। बेलपत्र का काढ़ा बनाकर पीने से हृदय मजबूत होता है और हार्ट अटैक का खतरा कम होता है। श्वास रोगियों के लिए भी यह अमृत के समान है। इन पत्तियों का रस पीने से श्वास रोग में काफी लाभ होता है।
* शरीर में गर्मी बढ़ने पर या मुंह में गर्मी के कारण यदि छाले हो जाएं, तो बेल की पत्तियों को मुंह में रखकर चबाने से लाभ मिलता है और छाले समाप्त हो जाते हैं

बेल पत्र के सेवन से शरीर में आहार के पोषक तत्व अधिकाधिक रूप से अवशोषित होने लगते है |
*मन एकाग्र रहता है और ध्यान केन्द्रित करने में सहायता मिलती है |
* इसके सेवन से शारीरिक वृद्धि होती है |
* इसके पत्तों का काढा पीने से ह्रदय मज़बूत होता है |
* बारिश के दिनों में अक्सर आँख आ जाती है यानी कंजक्टिवाईटीस हो जाता है . बेल पत्रों का रस आँखों में डालने से ; लेप करने से लाभ होता है |
* इसके पत्तों के १० ग्राम रस में १ ग्रा. काली मिर्च और १ ग्रा. सेंधा नमक मिला कर सुबह दोपहर और शाम में लेने से अजीर्ण में लाभ होता है |



*बुखार होने पर बेल की पत्तियों के काढ़े का सेवन लाभप्रद है। यदि मधुमक्खी, बर्र अथवा ततैया के काटने पर जलन होती है। ऐसी स्थिति में काटे गए स्थान पर बेलपत्र का रस लगाने से राहत मिलती है।

* बवासीर आजकल एक आम बीमारी हो गई है। खूनी बवासीर तो बहुत ही तकलीफ देने वाला रोग है। बेल की जड़ का गूदा पीसकर बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर उसका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सुबह शाम ठंडे पानी के साथ लें। यदि पीड़ा अधिक है तो दिन में तीन बार लें। इससे बवासीर में फौरन लाभ मिलता है।यदि किसी कारण से बेल की जड़ उपलब्ध न हो सके तो कच्चे बेलफल का गूदा, सौंफ और सौंठ मिलाकर उसका काढ़ा बना कर सेवन करना भी लाभदायक होगा। यह प्रयोग एक सप्ताह तक करें।
*बेल पत्र , धनिया और सौंफ सामान मात्रा में ले कर कूटकर चूर्ण बना ले , शाम को १० -२० ग्रा. चूर्ण को १०० ग्रा. पानी में भिगो कर रखे , सुबह छानकर पिए | सुबह भिगोकर शाम को ले, इससे प्रमेह और प्रदर में लाभ होता है | 
*यह आंत में कीड़े को नष्ट करने में मदद करता है, और पाचन विकार के लिए एक अच्छा उपाय है। ट्रंक और बेल के पेड़ की शाखाओं 'Feronia गम' नामक गोंद जैसा पदार्थ होते हैं। यह आमतौर पर डायरिया और पेचिश के इलाज के लिए प्रयोग किये जाता है। बरसात के मौसम में होने वाले सर्दी , खांसी और बुखार के लिए बेल पत्र के रस में शहद मिलाकर ले |
*बेल के पत्तें पीसकर गुड मिलाकर गोलियां बनाकर रखे. इसे लेने से विषम ज्वर में लाभ होता है |
स्कर्वी की रोकथाम-
विटामिन सी (Ascorbic Acid) की कमी से स्कर्वी रोग होता है। बेल फल विटामिन सी से भरपूर होता है, तो यह आपको स्कर्वी रोग से बचाता है। विटामिन सी के उच्च स्तर में होने के कारण यह माइक्रोबियल और वायरल संक्रमण से रक्षा करके की लोगों की सुरक्षा, प्रतिरक्षा प्रणाली की ताकत और शक्ति बढ़ाता है।
* बरसात में अक्सर सर्दी, जुकाम और बुखार की समस्याएं अधिक होती हैं। ऐसे में बेलपत्रके रस में शहद मिलाकर पीना फायदेमंद है। वहीं विषम ज्वर हो जाने पर इसके पेस्ट की गोलियां बनाकर गुड़ के साथ खाई जाती हैं।
मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद-
'Feronia गम', ट्रंक और बेल के पेड़ की शाखाओं में प्रचुर मात्रा में होता है। यह मधुमेह रोगियों में counteracts और खून में शर्करा का प्रवाह, स्राव, और संतुलन को मैनेज करने में मदद करता है।



* पेट या आंतों में कीड़े होना या फिर बच्चें में दस्त लगने की समस्या हो, बेलपत्र का रस पिलाने से काफी फायदा होता है और यह समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।मा या अस्थमा के लिए बेल पत्तों का काढा लाभकारी है|

हृदय को रखता है स्वस्थ-
बेल में बीटा कैरोटीन की अच्छी मात्रा पायी जाती है। बेल में थिअमिने और राइबोफ्लेविन होते हैं, जो हृदय टॉनिक के रूप में काम करते हैं। हार्ट को बूस्ट करते हैं और स्वस्थ रखते हैं।
रक्त क्लींज़र-
गर्म पानी और चीनी के साथ मिश्रित बेल फल का रस रक्त शुद्धि और शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटाने का काम करता है। यह विषाक्त पदार्थों को कम करके जिगर और गुर्दे, पर तनाव कम कर देता है।
*सूखे हुए बेल पत्र धुप के साथ जलाने से वातावरण शुद्ध होता है|
फीडिंग-
बेल का रस माताओं द्वारा सूखा अदरक पाउडर और गुड़ के साथ सेवन किया जा सकता है। यह शिशुओं के लिए और अधिक दूध का उत्पादन करने में मदद करता है।



* एक चम्मच रस पिलाने से बच्चों के दस्त तुरंत रुक जाते है |

*त्वचा के लाल चकत्ते की रोकथाम-बेलपत्र के रस 30ml रस के साथ जीरा मिलाकर पीना चाहिए। इससे पित्ती के साथ साथ त्वचा के लाल पीले चकत्ते और खुजली द्वारा बने चकत्ते ठीक हो जाते हैं।
*संधिवात में बेल पत्र गर्म कर बाँधने से लाभ मिलता है |
कैंसर-
कैंसर रोकने के लिए या स्तन कैंसर का इलाज करने के लिए नियमित रूप से बेल के रस का सेवन करना चाहिए।
*महिलाओं में अधिक मासिक स्त्राव और श्वेत प्रदर के लिए और पुरुषों में धातुस्त्राव हो रोकने के लिए बेल पत्र और जीरा पीसकर दूध के साथ पीना चाहिए|
*बेल फल का पके फल के रूप में या रस-रूप में सेवन किया जा सकता है। पका हुआ बेल फल मीठा होता है और यह स्वादिष्ट पेय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पका हुआ फल चीनी या शहद के साथ कस्टर्ड के रूप में सेवन किया जाता है। कच्चे बेल फल का स्वाद खट्टा होता है। बेल फलों के पेड़ की पत्तियों का प्रयोग सलाद और चटनी बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

थूहर,नागफनी) के औषधीय उपयोग

                                                               थूहर का पौधा 

                                                           नागफनी का पौधा 
     सम्पूर्ण भारत में सूखे स्थलों में पायी जाने वाली इस वनस्पति को अपने रेचक (परगेटिव) गुणों के कारण जाना जाता हैI इस वनस्पति में कमाल का दूध पाया जाता है,जो स्निग्ध ,उष्ण वीर्य ,हल्का ,त्वक रोगों एवं पेट के कब्ज को दूर करने वाले गुणों से युक्त होता है |
   नागफनी को संस्कृत भाषा में वज्रकंटका कहा जाता है . इसका कारण शायद यह है कि इसके कांटे बहुत मजबूत होते हैं . पहले समय में इसी का काँटा तोडकर कर्णछेदन कर दिया जाता था .इसके Antiseptic होने के कारण न तो कान पकता था और न ही उसमें पस पड़ती थी . कर्णछेदन से hydrocele की समस्या भी नहीं होती। नागफनी फल का हिस्सा flavonoids, टैनिन, और पेक्टिन से भरा हुआ होता है नागफनी के रूप में इसके अलावा संरचना में यह जस्ता, तांबा, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, मोलिब्डेनम और कोबाल्ट शामिल है ।
*इसके दो पत्तों को केवल आग पर गर्म कर थोड़ा हाथों से मसल कर रस निकालकर थोड़ा सा काला नमक मिलाकर पीयें और देखें खांसी में कितना आराम मिलता है I



*नागफनी, स्वाद में कड़वी और स्वाभाव में बहुत उष्ण होती है। यह पेट के अफारे को दूर करने वाली, पाचक, मूत्रल, विरेचक होती है।औषधीय प्रयोग के लिए इसके पूरे पौधे को प्रयोग किया जाता है। कान के सर्द में इसकी १-२ बूँद टपकाने से लाभ होता है। कुक्कर खांसी, में इसके फल को भुन कर खाने से लाभ होता है। इसके फल से बना शरबत पिने से पित्त विकार सही होता है।
नागफनी (prickly pear) के औषधीय गुण -
*निमोनिया
पौधे के छोटे-छोटे टुकड़ों काट, उबाल कर, जो एक्सट्रेक्ट मिलाता है उसे एक दिन में दो बार 2 मिलीलीटर की मात्रा में, पांच दिनों के लिए दिया जाता है।
*सूजन, गठिया, Hydrocele
पौधे का तना लें और कांटा निकाल दें। इसे बीच से फाड़ कर हल्दी और सरसों का तेल डाल कर गर्म करें और प्रभावित जगह पर बाँध लें।
*IBS, कोलाइटिस, प्रोस्टेट ग्रंथि की सूजन
फूल का प्रयोग किया जाता है।
*इसकी पत्तियों को वासा (अडूसे) क़ी पत्तियों के साथ पीसकर छोटी -छोटी गोलियां बनाकर एक से दो गोली दिन में दो से तीन बार चूसने से भी खांसी में आराम मिलता है I
*कब्ज
बताशे/ चीनी/मिश्री पर लेटेक्स से केवल कुछ बूंदें डाल कर लें।इसमें विरेचन की भी क्षमता है . पेट साफ़ न होता हो तो इसके ताज़े दूध की 1-2 बूँद बताशे में डालकर खा लें ; ऊपर से पानी पी लें .
*इसका दूध आँख में नहीं गिरना चाहिए . यह अंधापन ला सकता है .
*आँखों की लाली ठीक करनी हो तो इसके बड़े पत्ते के कांटे साफ करके उसको बीच में से फाड़ लें . गूदे वाले हिस्से को कपडे पर रखकर आँख पर बाँधने से आँख की लाली ठीक हो जाती है .



*श्वास या कफ के रोग हैं तो एक भाग इसका रस और तीन भाग अदरक का रस मिलाकर लें .
*इसके पंचाग के टुकड़े सुखाकर , मिटटी की हंडिया में बंद करके फूंकें . जलने के बाद हंडिया में राख रह जाएगी । इसे नागफनी का क्षार कहा जाता है । इसकी 1-2 ग्राम राख शहद के साथ चाटने से या गर्म पानी के साथ लेने से हृदय रोग व सांस फूलने की बीमारी ठीक होती है ,घबराहट दूर होती है । इससे मूत्र रोगों में भी लाभ मिलता है . श्वास रोगों में भी फायदा होता है
*नागफनी सूजन, कब्ज, निमोनिया, गर्भनिरोधक और कई अन्य रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है।
*इसे आंतरिक और बाह्य दोनों तरह से इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी मामले में, इसे प्रयोग करने से पहले कांटों को हटा देना बहुत ही आवश्यक है।
*अगर सूजन है , जोड़ों का दर्द है , गुम चोट के कारण चल नहीं पाते हैं तो , पत्ते को बीच में काटकर गूदे वाले हिस्से पर हल्दी और सरसों का तेल लगाकर गर्म करकर बांधें . 4-6 घंटे में ही सूजन उतर जायेगी .
*Hydrocele की समस्या में इसी को लंगोटी में बांधें .
*कान में परेशानी हो तो इक्का पत्ता गर्म करके दो-दो बूँद रस डालें .
*इसके लाल और पीले रंग के फूल होते हैं . फूल के नीचे के फल को गर्म करके या उबालकर खाया जा सकता है . यह फल स्वादिष्ट होता है ।यह पित्तनाशक और ज्वरनाशक होता है .
*अगर दमा की बीमारी ठीक करनी है तो इसके फल को टुकड़े कर के , सुखाकर ,उसका काढ़ा पीयें . इस काढ़े से साधारण खांसी भी ठीक होती है ।
*ऐसा माना जाता है की अगर इसके पत्तों के 2 से 5 ग्राम तक रस का सेवन प्रतिदिन किया जाए तो कैंसर को रोका जा सकता है



*थूहर (स्नूही),अर्क (मदार ),करंज एवं चमेली की पत्तियों को गोमूत्र के साथ किसी भी प्रकार के घाव में लेप करने से घाव भर जाते हैं I

*यदि कान में दर्द हो रहा हो तो केवल इसके रस को गर्म कर कानों में दो -दो बूँद डालने मात्र से कानों का दर्द दूर होता है 
*स्नूही (थूहर ) के दूध में हल्दी का पाउडर मिलाकर एक लेप जैसा बना लें और इसे अर्श (पाइल्स ) के मस्सों पर लगा दे|मस्से समाप्त हो जायेंगे ..I
*लीवर , spleen बढ़ने पर , कम भूख लगने पर या ascites होने पर इसके 4-5 ग्राम रस में 10 ग्राम गोमूत्र , सौंठ और काली मिर्च मिलाएं . इसे नियमित रूप से लेते रहने से ये सभी बीमारियाँ ठीक होती हैं .
*सामान्य सूजन हो ,सूजन से दर्द हो uric acid बढ़ा हुआ हो , या arthritis की बीमारी हो . इन सब के लिए नागफनी की 3-4 ग्राम जड़ + 1gm मेथी +1 gm अजवायन +1gm सौंठ लेकर इनका काढ़ा बना लें और पीयें .
*इसका औषधीय प्रयोग केवल और केवल आयुर्वेदिक चिकित्सक के निर्देशन में हो I

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

श्वेत प्रदर ,ल्यूकोरिया,सफ़ेद पानी जाने के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार


    अधिकतर महिलाएं ल्यूकोरिया जैसे-श्वेतप्रदर, सफेद पानी जैसी बीमारियो से जुझती रहती हैं, लेकिन शर्म से किसी को बताती नहीं और इस बीमारी को पालती रहती हैं। यह रोग महिलाओं को काफी नुकसान पहुंचाता है। इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए पथ्य करने के साथ-साथ योगाभ्यास का नियमित अभ्यास रोगी को रोग से छुटकारा देने के साथ आकर्षक और सुन्दर भी बनाता है।
    श्वेत प्रदर तथा रक्त प्रदर दोनों ही महिलाओं के शरीर की योनी से सम्बन्धित रोग हैं. श्वेत प्रदर के रोग के होने पर महिला की योनी मार्ग से सफेद पानी निकलने लगता हैं. जो की श्वेत प्रदर की बीमारी का सूचक होता हैं. रक्त प्रदर का रोग अधिकतर मासिक धर्म के दिनों में होता हैं. इन दिनों में ऋतुस्त्राव के समय में अधिक रक्तस्त्राव होता हैं. जिसका प्रभाव महिला के शरीर व स्वास्थ्य पर अधिक पड़ता हैं.
श्वेत प्रदर होने के कारण
श्वेत प्रदर का रोग कई बार महिला के अधिक मांस – मछली खाने, चाय पीने, शराब का सेवन करने से भी हो जाता हैं. अधिक चटपटे पदार्थों का सेवन करने से भी यह रोग हो सकता हैं. जिन महिलाओं का जीवन आलस्य से भरा होता हैं उनको भी यह रोग हो जाता हैं. मासिक धर्म के अनियमित समय पर होने के कारण भी यह रोग हो सकता हैं. कई लडकियों की जल्दी शादी हो जाती हैं जिसके कारण ही उन्हें जल्दी गर्भ धारण करना पड़ता हैं. उनको भी यह रोग हो जाता हैं. बार – बार गर्भ धारण करने के कारण भी यह रोग हो सकता हैं. इन सब के आलावा योनी के भीतरी भाग में किसी प्रकार की फुंसी, फोड़े या रसूली के होने के कारण भी यह रोग हो जाता हैं
अन्य कारण
अत्यधिक उपवास
उत्तेजक कल्पनाए
अश्लील वार्तालाप
सम्भोग में उल्टे आसनो का प्रयोग करना
सम्भोग काल में अत्यधिक घर्षण युक्त आघात
रोगग्रस्त पुरुष के साथ सहवास
सहवास के बाद योनि को स्वच्छ जल से न धोना व वैसे ही गन्दे बने रहना आदि इस रोग के प्रमुख कारण बनते हैं।
बार-बार गर्भपात कराना भी एक प्रमुख कारण है।
योनि के स्राव से बचने के लिए



यौन सम्बन्धों से लगने वाले रोगों से बचने और उन्हें फैलने से रोकने के लिए कंडोम का इस्तेमाल अवश्य करना चाहिए।

जननेन्द्रिय क्षेत्र को साफ और शुष्क रखना जरूरी है।
योनि को बहुत भिगोना नहीं चाहिए (जननेन्द्रिय पर पानी मारना) बहुत सी महिलाएं सोचती हैं कि माहवारी या सम्भोग के बाद योनि को भरपूर भिगोने से वे साफ महसूस करेंगी वस्तुत: इससे योनिक स्राव और भी बिगड़ जाता है क्योंकि उससे योनि पर छाये स्वस्थ बैक्टीरिया मर जाते हैं जो कि वस्तुत: उसे संक्रामक रोगों से बचाते हैं
दबाव से बचें।
मधुमेह का रोग हो तो रक्त की शर्करा को नियंत्रण में रखाना चाहिए।
श्वेत प्रदर रोग के लक्षण
श्वेत प्रदर के रोग के होने पर महिलाओं के योनी मार्ग से गाढ़ा सफेद पानी निकलता हैं. यह पानी मटमैला, चिपचिपा, हल्का लाल और बदबूदार होता हैं. यह यह श्वेत प्रदर के रोग का गम्भीर रूप का लक्षण होता हैं. इन लक्षणों के आलावा इस रोग के गम्भीर रूप धारण करने पर महिला के हाथ – पैरों में, पिंडलियों में, घुटनों में और पैर की हड्डियों में बहुत दर्द होता हैं. इस रोग के होने पर हाथ – पैरों में जलन होती हैं. स्मरण शक्ति कम हो जाती हैं. शरीर में कमजोरी आ जाती हैं. चेहरा पीला पड जाता हैं. पेट में भारीपन महसूस होता हैं. इस रोग के होने पर शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती हैं तथा भूख भी कम लगती हैं. इस रोग के होने पर योनी में खुजली, जलन, योनिशूल, योनिगंध की समस्या उत्पन्न हो जाती हैं. इस रोग के होने पर योनी द्वार में जख्म भी हो जाता हैं.
उपचार:
 *श्वेत प्रदर के रोग से मुक्ति पाने के लिए आप फालसे के शर्बत का सेवन कर सकते हैं. फालसे के शर्बत का सेवन करने से जल्दी ही श्वेत प्रदर के रोग से राहत मिलती हैं.



*घृतकुमारी / घीकुंवर ( aloe-barbadenis) गुड़ या मिसरी के साथ खाली पेट लें ।
खुराक: 1 चम्मच 5-10 दिनों के लिए, यदि स्थिति में सुधार न हो तो इसे जारी रखें।एक सप्ताह या दस दिन के अन्तराल पर, यह उपचार 1-2 माह तक जारी रख सकते हैं आवश्यकतानुसार ।
*अशोक( saraca- indica- ashoka-tree) का 60 ग्राम छाल को 1 लीटर पानी में उबाल कर 250 मिलीलीटर तक कर लें।
खुराक: चार बार 1-2 चम्मच प्रतिदिन लें, 1-2 माह तक।

*नागकेशर
नागकेशर को 3 ग्राम की मात्रा में छाछ के साथ पीने से श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) की बीमारी से छुटकारा मिल जाता है।*शतावर (Asparagus Racemosus) की ताज़ी कंदमूल या सूखी जड़ो का चूर्ण 5-10 ग्राम स्वादानुसार जीरे के चूर्ण के साथ 1 कप ढूध में सुबह खाली पेट में पिलाने से कमजोरी औ तनाव से होने वाली श्वेत वाली प्रदर 2-3 सप्ताह में ठीक हो जाती है ।
*गुलाब
गुलाब के फूलों को छाया में अच्छी तरह से सुखा लें, फिर इसे बारीक पीसकर बने पाउडर को लगभग 3 से 5 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह और शाम दूध के साथ लेने से श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) से छुटकारा मिलता है।
*5 या 6 कच्चे केले लें और उन्हें सुखा लें. फिर इन सूखे केलों को पीसकर इसका चुर्ण तैयार कर लें. अब चुर्ण की समान मात्रा में गुड़ लें और उसे चुर्ण में मिला दें. फिर इस चुर्ण का सेवन करें. चुर्ण का सेवन करने से श्वेत प्रदर के रोग ठीक हो जायेगा|



*ब्राम्ही, बेंग साग (Centella asiatica) का चूर्ण दो छोटी चम्मच या उसका स्वरस 1-2 चाय की चम्मच दिन में दो बार मिसरी के साथ 15 -20 दिन तक दें।

*भिंडी का सेवन करने से भी श्वेत प्रदर का रोग ठीक हो जाता हैं. इस रोग को ठीक करने के लिए रोजाना सुबह खाली पेट कच्ची भिंडी का सेवन करें. आपको इस रोग से आराम मिलेगा|
*चना
सेंके हुए चने पीसकर उसमें खांड मिलाकर खाएं। ऊपर से दूध में देशी घी मिलाकर पीयें, इससे श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) गिरना बंद हो जाता है।
*श्वेत प्रदर के रोग में आराम पाने के लिए 20 ग्राम मुलैठी लें. 10 ग्राम जीरा लें. 40 ग्राम अशोक के पेड़ की छाल लें. अब इन सभी चीजों मिलाकर महीन चुर्ण पीस लें. पिसने के बाद इस चुर्ण का सेवन दिन में 4 या 5 बार करें. आपको इस रोग से जल्दी ही छुटकारा मिलेगा.
*फिटकरी
चौथाई चम्मच पिसी हुई फिटकरी पानी से रोजाना 3 बार फंकी लेने से दोनों प्रकार के प्रदर रोग ठीक हो जाते हैं। फिटकरी पानी में मिलाकर योनि को गहराई तक सुबह-शाम धोएं और पिचकारी की सहायता से साफ करें। ककड़ी के बीजों का गर्भ 10 ग्राम और सफेद कमल की कलियां 10 ग्राम पीसकर उसमें जीरा और शक्कर मिलाकर 7 दिनों तक सेवन करने से स्त्रियों का श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) रोग मिटता है।
*जामुन
छाया में सुखाई जामुन की छाल का चूर्ण 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार पानी के साथ कुछ दिन तक रोज खाने से श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) में लाभ होता है।
*सफेद मूसली का चुर्ण और ईसबगोल का सेवन करके भी श्वेत प्रदर के रोग से निजात पाई जा सकती हैं. श्वेत प्रदर के रोग से मुक्ति पाने के लिए मूसली का चुर्ण लें और ईसबगोल लें. अब इन दोनों का सेवन एक साथ करें. ईसबगोल और मूसली के चुर्ण का सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हगो जायेगा|*श्वेत प्रदर के रोग को ठीक करने के लिए 3 केलों का सेवन रोजाना करें. आपको इस रोग से जल्द ही मुक्ति मिलेगी|
*सेमल (Bomabax-malabaricum- Silk cotton) की छाल- 200 ग्राम, पलाश (Butena fondosa – palas) का छाल- 200 ग्राम, शतावरी (Asparagus recemosus) की जड़ ( मूलकंद) -200 ग्राम, सभी को बराबर मात्र में लेकर कूट- पिसकर छान कर चूर्ण को कांच की शीशी में भरकर रख लें।इस चूर्ण को 1-2 चम्मच ठण्डे पानी या चावल के पानी, या मांड (ठण्डा) के साथ 15-20 दिन तक सुबह –शाम लें।
*श्वेत प्रदर के रोग को ठीक करने के लिए 5 या 6 ग्राम आंवले का चुर्ण लें और थोडा शहद लें. अब इन दोनों को अच्छी तरह से मिला लें और इसका सेवन करें. श्वेद प्रदर के रोग से राहत मिलेगी.
तेल, खटाई, मसाला, टमाटर, गर्मी पैदा करने वाला भोजन व कब्ज कारक पदार्थों का सेवन न करें|

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

जैतून का तेल अमृत तुल्य है,(Benefits of Olive oil)

   

    जैतून का तेल जिसे हम ऑलिव ऑयल भी कहते है। यह तेल हमारे शरीर को कई रोगों से राहत दिलवाता है। जैतून का तेल हमारी सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ हमें ओर भी कई समस्याओं जैसे बालों और त्वचा सम्बन्धी समस्याओं से राहत दिलवाता है। जैतून के तेल का प्रयोग खाना पकाने में, सौंदर्य सामग्री और दवाओं में तेल के रूप में प्रयोग किया जाता है।
आमतौर पर गरम देशों में जैतून का तेल अधिक स्वादिष्ट पाया जाता है। एक्स्ट्रा वर्जिन तेल बहुत ही स्वादिष्ट और सुगन्धित होता है
जैतून के तेल में फैटी एसिड की पर्याप्त मात्रा होती है जो हृदय रोग के खतरों को कम करती है। मधुमेह रोगियों के लिए यह काफी लाभदायक है। शरीर में शुगर की मात्रा को संतुलित बनाए रखने में इसकी खास भूमिका है।..
* ऑलिव ऑयल मोटापे से भी मुक्ति देता है। यह बॉडी में फैट को जमने नही देता।
* जैतून के सेवन से एलर्जी होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं।



*जैतून के तेल का सेवन करने से कब्ज से राहत मिलती है।

*जैतून के तेल और चीनी का प्रयोग करके हम चेहरे पर स्क्रब भी कर सकते है।
*.जैतून के तेल का प्रयोग हम फेसपैक में भी कर सकते है।
*.जैतून का तेल त्वचा के अंदर गहराई से जा कर त्वचा को पोषण प्रदान करता है।
*.जैतून के तेल का प्रयोग खाना पकाने में,सौंदर्य सामग्री और दवाओं में तेल के रूप में किया जाता है।
*. सलाद को और भी पौष्टिक बनाने के लिए उसके ऊपर ऑलिव ऑयल डालकर खाना चाहिए।
* कई तरह के कैंसर से बचाने में भी जैतून सहायक है।
*. आँखों को स्वस्थ रखने में ऑलिव बेहद लाभकारी है।.
* ऑलिव के सेवन से खून में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा घटती है।
*ऑलिव ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है।
* ऑलिव अल्जाइमर जैसी बीमारी के प्रभाव को कम करता है।



*जैतून के सेवन से एनीमिया से बचा जा सकता है।

*जैतून फर्टिलिटी और रिप्रोडक्शन को बढ़ाता है।
* ऑलिव में ओलिक एसिड होता है जो कि हार्ट के लिए फायदेमंद है।
* एक कप ऑलिव में भरपूर आयरन होता है जो शरीर में खून की कमी को पूरा करता है।
*जैतून का तेल चेहरे से झुर्रियां हटाने में भी कारगर है।
* बालों के गिरने से परेशान हैं तो जैतून के तेल को गुनगुना करके स्कैल्प पर की गई मालिश आपकी समस्या को हल कर सकती है।
* रूखी त्वचा को मखमल सी मुलायम बनाने के लिए रोज रात को सोते समय ऑलिव ऑयल की मसाज करें।
* ऑलिव ऑयल मोटापे से भी मुक्ति देता है। यह बॉडी में फैट को जमने नही देता।
*जैतून के सेवन से एलर्जी होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं।
.*. कई तरह के कैंसर से बचाने में भी जैतून सहायक है।
अन्य लाभ (Other Benefits of Olive)
*जैतून ऑस्टेरोपिरोसिस में भी लाभकारी है। यह बोन मिनरल्स को इम्प्रूव करके उनमे कैल्शियम को स्टोर करता है।
*डिप्रेशन के शिकार लोगों को भी ऑलिव का इस्तेमाल करना चाहिए। खाना बनाने में इसके तेल का इस्तेमाल करें।



*जैतून के तेल से चेहरे पर मसाज करने से चेहरे में चमक और झुर्रियों से भी राहत मिलती है।

*जैतून के तेल का प्रयोग हम शरीर पर मालिश करने के लिए भी करते है ,यें त्वचा को कोमल बनाएं रखने में मदद करता है।
*जैतून के तेल का प्रयोग पैरों के लिए भी लाभकारी होता है,पैरों को कोमल बनाएं रखने में मदद करता है।
*जैतून के तेल से आंखों के आसपास मसाज करने से आंखों के काले घेरों से छुटकारा मिलता है।
*.जैतून के तेल का प्रयोग भोजन में करने से हड्डियां मजबूत बनती है।
*जैतून के तेल का सेवन करने से हृदय संबधी रोगों से निजात मिलती है।
*ऑलिव त्वचा के कैंसर से भी बचाता है।
* धूप से झुलसी त्वचा को ठीक करने के लिए जैतून का तेल बहुत प्रभावी है।
* नहाने के बाद ऑलिव ऑयल लगाने से शरीर पर मौजूद काले धब्बे दूर हो जाते हैं और पूरे दिन आपके शरीर पर नमी बनी रहती है।
*जैतून का तेल चेहरे और गर्दन पर लगाएं। इससे चेहरे पर रौनक आ जाएगी और गर्दन का कालापन दूर हो जाएगा।
*ऑलिव ऑयल में चीनी मिलाकर रोज स्क्रब करने से काली त्वचा की समस्या से काफी हद तक निजात मिलती है।
*जैतून के तेल से सिर पर मालिश करने से बाल मुलायम हो जाते है। बालों की समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है।

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

अरंडी के तेल के गुण, औषधीय उपयोग

   

    एरंड का पेड़ (गुल्म) छोटा, 5 से 12 फुट ऊँचा होता है। पत्ते हरापन या ललाई लिये, 1-1 फुट के घेरे में, गोलाकार, कटे हुए, अँगुलियों सहित हथेली के आकार-से, 4-12 इच्च लम्बे और पीले डंठल पर लगे होते हैं। फूल पीलापन लिये गुच्छे में मोटे डंठल पर रहते हैं। एरण्ड के फल गोल, कई एक साथ, कोमल काँटों से युक्त, कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर धूसर वर्ण के होते हैं। वे पक जाने पर सूर्य की गर्मी से फट जाते हैं। प्रत्येक एरण्ड के फल में तीन-तीन बीज, ललाई लिये काले रंग के, सफेद चितकबरे होते हैं।
    अरंडी तेल बहुत सारे गुणों से भरपूर होता है फिर वो फ़ायदा बालों के लिए हो, हमारे शरीर के लिए हो या फिर हमारी त्वचा के लिए हो, अरंडी का तेल से आप जैसा चाहे फायदा ले सकते है। ज्यादातर अरंडी तेल का इस्तेमाल बालों से जुड़ी समस्याओं के लिए किया जाता है लेकिन स्वास्थय से जुड़ी समस्या जैसे जोड़ों का दर्द, त्वचा रोग और कब्ज जैसी समस्याओं में भी इसका प्रयोग हितकारी होता है। यदि आपके बाल ख़राब हो रहे है, झड़ रहे तो आप आज से ही अरंडी के तेल का इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए । यह तेल बालों की समस्या से आपको कोसों दूर रखेगा क्योंकि यह तेल बालों से जुड़ी हर समस्या का निवारण बहुत जल्दी करता है । प्रदूषण का, हमारे खान-पान का प्रभाव हमारे बालों पर अधिक पड़ता है और बालों की समस्या होना आज एक आम सी बात हो गई है, हर दूसरा इंसान इस समस्या से परेशान है। कैस्टर ऑइल एक तरह का चिपचिपा तेल होता है। लेकिन बालों के लिए भी यह औषधि मानी जाती है। अरंडी तेल का हमारी हर तरह से मदद करता है तो आइए जानते है इसके कई फायदों के बारे में
एरण्ड के गुण : 
   यह स्वाद में मीठा, चरपरा, कसैला, पचने पर मीठा, भारी, चिकना, गर्म और तीक्ष्ण होता है। इसका मुख्य प्रभाव वातनाड़ी-संस्थान पर पड़ता है। यह शोथहर-पीड़ानाशक, विरेचक, हृदयबलदायक, श्वासकष्टहर, मूत्रविशोधक, कामोत्तेजक, गर्भाशय और शुक्र-शोधक तथा बलदायक है।
वजन कम करना-
   अरंडी तेल आपका वज़न कम करने में भी आपकी मदद कर सकता है। कैसे : अगर आप अपना वज़न कम करना चाहते है तो आप रोज़ सुबह खली पेट सबसे पहले दो चम्म्च अरंडी के तेल का सेवन करें, लेकिन आप ऐसा 10 दिनों में से 5 दिन ही करना है। क्योंकि अरंडी का तेल अधिक लेने से आपको दस्त भी हो सकता है ।
पेट का स्वास्थ्य -
  अरण्डी के तेल का कम मात्रा मे सेवन करना पेट की समस्याएँ जैसे कमजोर पाचन, indigestion (बदहजमी), फ़ूड poisoning, कब्ज (कॉन्स्टिपेशन), पेट मे कीड़े आदि को ठीक कर आपके पेट की सेहत बेहतर करने में मददगार होता है| हल्के गर्म तेल की पेट पर मसाज से पाचन और आमाशय के स्वस्थ्य  पर पॉज़िटिव प्रभाव  देखने को मिलता है|
आमवात : 
आमवात की गाँठों में सूजन और दर्द होने पर 1 तोला अरण्डी तेल में 3 माशा सोंठ का चूर्ण मिलाकर देने से लाभ होता है।
2. कमर-दर्द :
    एरण्ड-बीजों का छिलका निकाल उसकी आधा पाव (10 तोला) गिरी एक सेर गाय के दूध में पीसकर पकायें। मावा (खोया) जैसा बन जाने पर उतार लें। यह 1-2 तोला तक सुबह-शाम सेवन करने से कमर-दर्द, गृध्रसी (साइटिका) और पक्षाघात में आराम होता है।
* टिटनेस : 
धनुस्तम्भ, हिस्टीरिया, आक्षेप और जकड़न में अरण्डी-तेल से मालिश कर सेंकना चाहिए।
* रक्त-आमातिसार :
 एरण्ड की जड़ को दूध के साथ पीने से रक्त-आमातिसार मिट जाता है।
*श्लीपद :
 श्लीपद (फायोलेरिया) पर अरण्डी-तेल गोमूत्र में मिलाकर एक मास तक पीने से लाभ होता है।
* वृक्कशूल-पथरी :
 दर्द गुर्दा (वृक्कशूल) और उदरशूल में एरण्ड की जड़ का काढ़ा सोंठ डालकर पीने से लाभ होता है। इसमें हींग और नमक मिलाने से पथरी भी निकल जाती है।
* मलबन्ध-बवासीर : मलबन्ध कब्ज बवासीर और आँव में अरण्डी का तेल 5 तोला पिलाने से लाभ होता है। उससे विरेचन होकर वायु का अनुलोमन हो जाता है।
* शोथ : 
किसी स्थान पर शोथ (सूजन) या वेदना (दर्द) हो, वहाँ अरण्डी-तेल लगाकर उसी के पत्तों को गर्म करके बाँध देना चाहिए।
* योनि-शूल : 
योनि-शूल में अरण्डी-तेल में रूई का फाहा भिगोकर योनि में रखने पर लाभ होता है। प्रसवकाल के कष्ट में भी इसका प्रयोग करना चाहिए।
* अाँखों की जलन : 
कभी आँखों में सोडा, चूना, आक आदि का दूध पड़ जाय तो 1-2 बूंद अरण्डी-तेल आँखों में डालने से जलन और दर्द में शीघ्र आराम हो जाता है।* चर्म रोग : एरण्ड के जड़ को पानी में उबाल कर उस पानी को त्वचा पर लगाने या धोने से चर्म रोग का नाश होता है।



*. बालों के लिए वरदान :
 रोजाना सिर के बालों की मालिश एरण्ड के तेल से करने पर बाल काले, घने, चमकीले और जिनके बाल कम हो गए हों पुनः वापिस आ जाते हैं।
*काँच खा लेने पर : काँच खा लेने पर एरण्ड का तेल पिला देने से नुकसान नहीं होता।
गठिया का उपचार
अरंडी का तेल Ricinoleic, Oleic और Linoleic acidsसे भरपूर होता है| साथ ही इसमें फॅटी acids भी पाया जाते हाइन| ये सभी गुण Rheumatism जैसे arthritis, gout आदि के लक्षण जैसे दर्द, inflammation और सुजन को कम करने मे असरदार होते हैं
पीठ मे दर्द का इलाज (backpain home treatment)
यदि आपकी कमर या पीठ मे दर्द हो रहा है तो इसमें भी अरंडी के तेल का इस्तेमाल करके आप उस दर्द से निजात पा सकते हैं| यह तेल backache के लिए एक आसन और सुरक्षित होम रेमेडी होती है| बस आपको हल्का गरम तेल अपनी पीठ पर मलना है और उसपर कुछ देर hot pad लगाके रखना है ताकि सेक (हीट) से तेल स्किन के अंदर समा कर inflammation , सूजन और दर्द को कम कर सके| ऐसा रोजाना रात को 3 दिन करने से आपको लाभ मिलेगा और दर्द का अंत होगा तुरंत|इम्युनिटी सिस्टम में सुधार करता है : नेचुरोपैथी कराने वाले लोगों को कैस्टर ऑयल से इम्युनिटी सिस्टम मज़बूत करने में मदद मिलती है। ये व्हाइट ब्लड सेल्स को बढ़ाकर आपके शरीर को इन्फेक्शन से लड़ने की शक्ति देता है।



कब्ज़ से राहत दिलाता है : 
ये तेल रिसिनोलिक एसिड जारी करने में मदद करता है, जो आंत में मौजूद है। एसिड जारी करने के बाद, यह एक लैक्सटिव के रूप में अच्छी तरह से काम करता है। ये तेल गर्म होता है, इसलिए ये मल त्याग के प्रक्रिया को आसान बनाने और आंतरिक प्रणाली को साफ रखने में सहायक होता है।
गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छा :
 कैस्टर ऑयल गर्भाशय संकुचन पर दबाव डालकर लेबर के लिए प्रेरित करता है। इसमें रिसिनोलिक एसिड होता है, जो गर्भाशय में ईपी3 प्रोस्टेनोइड रिसेप्टर को सक्रिय करता है, जिससे प्रसव को आसान और सहज बनाने में मदद मिलती है।
अल्सर से छुटकारा दिलाने में सहायक : 
कैस्टर ऑयल को बेकिंग सोडा के साथ मिलाकर लगाने से मिनटों अल्सर से राहत मिलती है। ये कॉर्न के प्रभावी इलाज में भी सहायक है। इसमें फैटी एसिड होता है, जिसे त्वचा आसानी से अवशोषित कर लेती है। ये ओवेरियन सिस्ट को भी खत्म करता है।
जोड़ों के दर्द को कम करता है : इसका एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभाव पड़ता है, जिस वजह से ये गठिया के इलाज में सहायक है। इसके अलावा इस तेल की मालिश करने से जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों में सूजन और नसों के बेचैनी को कम करने में मदद मिलती है।
बालों की समस्‍या दूर करने के लिए अरंडी का तेल प्रयोग करना बहुत ही कारगर है. अरंडी का तेल बालों के बढ़ने में वृद्धि करता है. पतले हो रहे बालों को घना करने में मदद करता है. बालों का नुकसान दिखना कम करता है और बालों के नुकसान को रोकता है. सूखे बालों को पोषण और उन्हें चमक और उछाल देता है. बालों को घनापन और चमक देता है जिसके परिणामस्वरुप बाल स्वस्थ दिखते है. बालों और सिर की त्वचा को गहराई से कंडिशनिंग और नमी देता है. सिर की त्वचा का सूखापन रोकता है.



प्रयोग

उंगलियों के प्रयोग से, बाल की जड़ों और सिर की त्वचा पर उच्च मात्रा में अरंडी के तेल लगाए.
सिर की त्वचा पर तेल समान रूप से वितरित हो रहा है,यह सुनिश्चित करे.
बाकी बालों में तेल लगाने से बचें क्योंकि तेल के गाढ़ेपन से बालों से तेल धोकर निकालने में मुश्किल हो सकती है.
सिर की त्वचा पर लगाने के बाद, एक प्लास्टिक की टोपी के साथ अपने बालों को ढके और एक तौलिया में लपेटे.
तेल को कम से कम 15 से 20 मिनट तक रहने दे या रात भर भी रख सकते हैं.
बाद में अरंडी के तेल को निकालने के लिए शैम्पू के साथ धोले|.
यह उपाय हप्ते में एक बार करे और छह से आठ सप्ताह तक ऐसा करे जिससे अच्छे परिणाम दिखेंगे.
श्वेत एरण्ड : बुखार, बलगम, पेट में दर्द, शरीर में किसी भी अंग में सूजन, शरीर में दर्द, सिर दर्द, कमर में दर्द, अंडकोष वृद्धि को ठीक करने के काम आती है।



रक्त एरण्ड : पेट में कीड़े, बवासीर ( Piles ), भूख ना लगना, पीलिया संबंधी रोगों को ठीक करता है

एरण्ड के फूल : एरण्ड के फूल लाल बैंगनी रंग के एक लिंगी होते हैं। एरण्ड के फूल सर्दी के सभी रोगों जैसे सर्दी-जुकाम, ठण्ड से बुखार, बदन दर्द बलगम आदि के लिए लाभदायक है।
Menstrual problems करे दूर
यदि आपको पीरियड यानि मासिक धर्म आने में प्राब्लम है, या पीरियड में देर हो रही है या पीरियड बंद हो और अधिक दर्द हो रही है तो अरंडी का तेल उपयोग करके आप इन सभी प्रॉब्लम्स से छुटकारा पा सकते हैं| अरण्डी के तेल में emmenagogue गुण होते हाइन जो कई पीरियड सम्बंधित प्रॉब्लम्स को दूर करे हैं|
Castor oil for skin care
यदि आपकी स्किन sunburn के कारण सूज गयी है तो उसे पर अरंड का तेल लगाइए| इस तेल के एंटी इनफ्लमेटरी गुण इनफ्लमेशन कम करके आपको आराम देंगे| साथ ही sunburnके कारण काली पड़ी स्किन को वापिस सही tone मे लाने मे मदद भी मिलेगी|
यदि प्रेग्नेन्सी या मोटापे के कारण आपके पेट या कमर पर स्ट्रेच मार्क्स पड़ गये हो तो रोजाना अरंडी के तेल की मसाज करे|. 2 महीने मे वो गायब हो जायेंगे|
Ringworm या दाद होने पर एक चम्मच castor oil को 2 चम्मच कोकनट आयल मे मिलकर स्किन पर लगाने से दाद खाज खुजी दूर हो जाती है|
इसे मस्से पर लगाने से भी फ़ायदा होता है|
रेग्युलर इसका इस्तेमाल त्वचा पर करने पर age spots और फ्रेकल्स भी दूर होते हैं|
यदि आपका चेहरा, हाथ, एड़ियाँ, टाँगे आदि खुश्क (ड्राइ) रहते हैं तो आप अपनी त्वचा को अच्छे से सॉफ करके रात को सोने से पहले अरण्डी के तेल को लगा कर सो जायें| ये नुस्ख़ा आपकी स्किन को नम करने के साथ उसे सॉफ्ट, सिल्की, कोमल, मुलायम बना देगा|
इस तेल से चेहरे पर मसाज करने से आप कुछ ही मिनिट्स मे ग्लोयिंग फेस पा सकते हैं| मसाज से ब्लड फ्लो अच्छा होगा साथ ही आपकी स्किन को पोषण मिलेगा जिससे आपके फेस पर पिंक ग्लो आ जाएगा|
यदि आपकी त्वचा काली है या उस पर blackspots, dark patch, काले दाग धब्बे आदि हैं तो उस जगह पर अरण्डी का तेल रोज मलने से वो ब्लैक मार्क्स धीरे धीरे मिट जायेंगे| ऐसा castor oil के स्किन whitening गुण के कारण होता है| इतना ही नही ये आयल उस जगह पर नए टिश्यू की growth को प्रमोट करवाता है फलसवरूप डार्क और डॅमेज्ड टिश्यूस दूर हो जाते हैं और सॉफ निखरी त्वचा बाहर आ जाती है|



क्या आपके फेस पर असमय wrinkles और छोटी छोटी धारियाँ (फाइन लाइन्स) पड़ गयी हैं? आप रोजाना रात को इस आयिल से अपने सॉफ फेशियल स्किन पर मसाज करिए| इसके anti-ageing गुण signs of ageing को हटाने में काफ़ी मददगार साबित होते हैं|
चेहरे की त्वचा के लिए अरंडी के तेल के बहुत फायदे हैं जैसे की ये आयिल collagen production को तेज करवाता है इसलिए उम्र बढ़ने के प्रभाव कम करके ये आपकी स्किन को टाइट और यंगर लुकिंग रखने मे सहायता करता है|
अरण्डी आयल के मेडिसिनल गुणों के कारण इसे बहुत सारी स्किन प्रॉब्लम्स को ठीक करने मे उपयोग किया जाता है| इस oil को इसके moisturizing और हीलिंग गुणों के कारण skin care मे सदियों से उसे किया जा रहा है| ये wrinkles, acne, पिंपल्स, फेस के खुश्की (ड्राइनेस्), dark marks, acne scars और दूसरी त्वचा सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने मे असरदार माना जाता है| नीचे अरंडी के तेल के skin and face care uses दिए गये हैं|
castor oil में कमाल के घाव भरने वाले गुण पाए जाते हैं और ये गुण इसमे पाए जाने वेल यूनीक रायसीनोलिक फैटी एसिड के कारण होते हैं| ये फॅटी एसिड अरण्डी के अलावा किसी और तेल या नॅचुरल स्त्रोत मे नही पाया जाता|
आपको इसके स्किन को moisturize करने वाले गुणों के बारे मे तो पता ही है लेकिन इसमे इसके अलावा अनडीसाईंलेनिक एसिड होते हैं जिनसे इस तेल को कमाल के एंटी बॅक्टीरियल गुण मिलते हैं|. और यही गुण फेस पर acne और संक्रमण को रोकने मे काम आते हैं| साथ ही इस आयिoilल के anti inflammatory गुण मुहासे से सम्बंधित सोज को ठीक करके उसे जल्दी ठीक होने मे मदद करते हैं|

    शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

    तिल्ली बढ़ जाने (स्प्लेनोमेगाली) के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार



        तिल्ली (Spleen) पेट के निचले भाग में पीछे बाईं ओर स्थित होती है | यह पेट की सभी ग्रंथियों में बड़ी और नलिकारहित है | इसका स्वरूप अंडाकार तथा लम्बाई लगभग तीन से पांच इंच होती है | तिल्ली शरीर के कोमल और भुरभुरे ऊतकों का समूह है | इसका रंग लाल होता है |
      तिल्ली का मुख्य रोग इसका आकार बढ़ जाना है | विशेष रूप से टॉयफाइड और मलेरिया आदि बुखारों में इसके बढ़ जाने का भय रहता है |
    शुरू में इस रोग का उपचार करना आसान होता है, परंतु बाद में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह रोग मनुष्य को बेचैनी एवं कष्ट प्रदान करता है। तिल्ली में वृद्धि (स्प्लेनोमेगाली) होने से पेट के विकार, खून में कमी तथा धातुक्षय की शिकायत शुरू हो जाती है।
      इस रोग की उत्पत्ति मलेरिया के कारण होती है। मलेरिया रोग में शरीर के रक्तकणों की अत्यधिक हानि होने से तिल्ली पर अधिक जोर पड़ता है। ऐसी स्थिति में जब रक्तकण तिल्ली में एकत्र होते हैं तो तिल्ली बढ़ जाती है।
    तिल्ली वृद्धि में स्पर्श से उक्त भाग ठोस और उभरा हुआ दिखाई देता है। इसमें पीड़ा नहीं होती, परंतु यथासमय उपचार न करने पर आमाशय प्रभावित हो जाता है। ऐसे में पेट फूलने लगता है। इसके साथ ही हल्का ज्वर, खांसी, अरुचि, पेट में कब्ज, वायु प्रकोप, अग्निमांद्य, रक्ताल्पता और धातुक्षय आदि विकार उत्पन्न होने लगते हैं। अधिक लापरवाही से इस रोग के साथ-साथ जलोदर भी हो जाता है।
    तिल्ली की खराबी में अजवायन और सेंधा नमक : 
     अजवायन का चूर्ण दो ग्राम, सेंधा नमक आधा ग्राम मिलाकर (अथवा अजवायन का चूर्ण अकेला ही) दोनों समय भोजन के पश्चात गर्म पानी के साथ लेने से प्लीहा (तिल्ली spleen) की विकृति दूर होती है।
    इससे उदर-शूल बंद होता है। पाचन समय भोजन क्रिया ठीक होती है। कृमिजन्य सभी विकार तथा अजीर्णादि रोग दो-तीन दिन में ही दूर हो जाते है। पतले दस्त होते है तो वे भी बंद हो जाते है। जुकाम में भी लाभ होता है।
    तिल्ली अथवा जिगर या फिर तिल्ली और जिगर दोनों के बढ़ने पर :
       पुराना गुड डेढ़ ग्राम और बड़ी पीली हरड़ के छिलके का चूर्ण बराबर वजन मिलाकर एक गोली बनाये और ऐसी दिन में दो बार प्रात: सायं हल्के गर्म पानी के साथ एक महीने तक ले। इससे यकृत और प्लीहा यदि दोनों ही बढे हुए हो, तो भी ठीक हो जाते है। इस प्रयोग को तीन दिन तक प्रयोग करने से अम्लपित्त का भी नाश होता हैं।
    प्लीहा वृद्धि (बढ़ी हुई तिल्ली) :
    अपराजिता की जड़ बहुत दस्तावर है। इसकी जड़ को दूसरी दस्तावर और मूत्रजनक औषधियों के साथ देने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है|
    अन्य घरेलु उपयोग :
    गिलोय के दो चम्मच रस में 3 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण और एक-दो चम्मच शहद मिलाकर चाटने से तिल्ली का विकार दूर होता है।
    बड़ी हरड़, सेंधा नमक और पीपल का चूर्ण पुराने गुड़ के साथ खाने से तिल्ली में आराम होता है।
    त्रिफला, सोंठ, 
    *कालीमिर्च, पीपल, सहिजन की छाल, दारुहल्दी, कुटकी, गिलोय एवं पुनर्नवा के समभाग का काढ़ा बनाकर पी जाएं।
    *1/2 ग्राम नौसादर को गरम पानी के साथ सुबह के वक्त लेने से रोगी को शीघ्र लाभ होता है।
    *दो अंजीर को जामुन के सिरके में डुबोकर नित्य प्रात:काल खाएं| तिल्ली का रोग ठीक हो जाएगा। 
    * कच्चे बथुए का रस निकालकर अथवा बथुए को उबालकर उसका पानी पीने से तिल्ली ठीक हो जाती है | इसमें स्वादानुसार नमक भी मिला सकते हैं |
    * आम का रस भी तिल्ली की सूजन और उसके घाव को ठीक करता है | 70 ग्राम आम के रस में 15 ग्राम शहद मिलाकर, प्रात:काल सेवन करते रहने से दो-तीन सप्ताह में तिल्ली ठीक हो जाती है | निरंतर इसका प्रयोग करते समय खटाई से बचे |
    *. पेट पर लगातार एक माह तक चिकनी गीली मिट्टी लगाते रहने से भी तिल्ली रोग में लाभ होता है |
    *. तिल्ली के विकार में नियमित रूप से पपीते का सेवन लाभदायक है |
    * गाजर में राई आदि मिलाकर बनाया गया अचार खिलाने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है |
    * 25 ग्राम करेले के रस में थोड़ा सा पानी मिलाकर दिन में दो-तीन बार पीने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है |
    * लम्बे बैंगनों की सब्जी नियमित खाने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक होती है |
    *पहाड़ी नीबू दो भागों में काटकर उसमें थोड़ा काला नमक मिश्रित कर हीटर या अंगीठी की आंच पर हल्का गर्म करके चूसने से लाभ होता है |
    * गुड़ और बड़ी हरड़ के छिलके को कूट-पीसकर गोलियां बना लें | प्रातः-सायं हल्के गरम पानी से एक महीने तक सेवन करने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है |
    * छोटे कागजी नीबू को चार भागों में काट लें | एक भाग में काली मिर्च, दूसरे भाग में काला नमक, तीसरे में सोंठ और चौथे हिस्से में मिश्री अथवा चीनी भर दें | रातभर के लिए ढककर रखें | प्रातःकाल जलपान से एक घंटा पहले, हल्की आंच पर गरम करके चूसने से लाभ होता है |
    *. तिल्ली के विकार में नियमित रूप से पपीते का सेवन लाभदायक है |
    *सेंधा नमक और अजवायन ( Rock Salt and Parsley ) : आप प्रतिदिन 2 ग्राम अजवायन में ½ ग्राम सेंधा नमक मिलाएं और उन्हें अच्छी तरह पीसकर पाउडर तैयार करें. इस पाउडर को आप गर्म पानी के साथ लें आपको तिल्ली की वृद्धि में अवश्य लाभ मिलेगा.
    *त्रिफला और काली मिर्च ( Triphala and Black Pepper ) :
     आपको एक काढ़ा तैयार करना है जिसके लिए आपको कुछ जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी जो इस प्रकार है. आप सौंठ, दारुहल्दी, गियोल, सहिजन की छल, पीपल, त्रिफला, काली मिर्च और पुनर्नवा. इस सामग्री के मिश्रण से आप एक काढ़ा तैयार कर लें और उसे पी जायें. शीघ्र ही आपको प्लीहा रोग से मुक्ति मिलेगी.
    गिलोय और शहद : 

    3 ग्राम पीपल लेकर उसका पाउडर बना लें और उसमे 2 चम्मच गियोल के रस के मिलाएं. इसके ऊपर से आप 2 चम्मच शहद के भी डाल लें और इस मिश्रण को चाटें. इससे भी आपको तिल्ली विकार से आराम मिलता है.