मंगलवार, 27 जून 2017

बढ़ी हुई तिल्ली प्लीहा के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार

प्लीहा का बढ़ना ( Spleen Enlargement )
प्लीहा में वृद्धि जिसे तिल्ली का बढ़ना भी कहा जाता है, वो मनुष्य पेट में बायीं तरह ऊपर चतुर्भाग में स्थित होती है. इसका सीधा संबंध किसी भी रोग की प्रक्रिया से सम्बंधित होता है. जिसमे प्लीहा की असामान्य लाल रक्त कोशिकाएं खराब हो जाती है. इसका मुख्य कार्य होता है कि ये इन लाल कोशिकाओं की रक्त की आपूर्ति को पूरा करना है. किन्तु इसके कार्य करने की क्षमता में दिक्कत उत्पन्न होने की कारण या इसकी वृद्धि होने के कारण अनेक तरह के पेट के विकार, खून की कमी धातुक्षय की शिकायत इत्यादि शुरू हो जाती है. अगर इस रोग को शुरू में नियंत्रित नही किया जाता तो इससे अनेक अन्य रोग होने का भी खतरा रहता है.   प्लीहा का मुख्य काम खून को छानना है तथा भक्षक कोशिकाओं जैसे लिम्फोसाइट्स और मोनोसाइट्स का निर्माण करना है.
   प्लीहा में मौजूद भक्षक कोशिकाएं खून से क्षय प्राप्त या मृत लाल कोशिकाओं (Erythrocytes) एवम प्लेटलेट्स, सूक्षम जीवाणुओं तथा अन्य कोशिकीय कचरे (Debris) को हटाने में सहायता करती है. भक्षक कोशिकाएं जीर्ण लाल रक्त कोशिकाओं के हिमोग्लोबिन से आयरन को भी हटती हैं तथा अस्थिसज्जा (Bone Marrow) में लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन के लिए इसे रक्त परिसंचरण (Blood Circulation) में लौटा देती हैं. हिमोग्लोबिन के टूटने से बिलरुबिन पिगमेंट का उत्पादन होता है जो लीवर में परिसंचरित (Circulate) होता है.
प्लीहा के रक्त में विद्यमान एंटीजेंस लिम्फोसाइट्स को क्रियाशील बनाकर कोशिकाओं में विकसित होते हैं. तथा एंटी बॉडीज का निर्माण करते हैं.
   भ्रूण अवस्था में प्लीहा लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करती है. बाद में यह ताज़ी बनी लाल रक्त कोशिकाओं को और प्लेटलेट्स को संचयित (Store) रखती है.
प्लीहा रक्त के भण्डारण का काम करती है.
शरीर में तिल्ली की स्थिति.
तिल्ली (प्लीहा – Spleen) पेट में बांयी और ऊपर की और रहती है. खून की अधिकता और कमी के अनुसार इसका आकार घटता बढ़ता रहता है. सामान्यतः इसकी लम्बाई 5 इंच, चौड़ाई 1-2 इंच, मोटाई लगभग 12 इंच तथा वजन तीन छटांक होता है.
क्यों बढती है तिल्ली.
एलॉपथी के अनुसार बीमारी के अधिक समय तक शरीर में बने रहने से, मलेरिया होने से, दूषित स्थानों पर रहने, अथवा चिकने, मीठे, भारी पदार्थों का अधिक सेवन करने से प्लीहा बढ़ जाती है.
किस स्थिति में हो जाता है असाध्य.
यदि प्लीहा के रोगी की नाक तथा दांत से रक्त गिरे, मुख से रक्त की उल्टी हो, रक्त मिले हुए दस्त हों, आँख, पाँव, तथा सम्पूर्ण शरीर में सूजन हो, गुदा से रक्त गिरे, एवम दांतों की जड़ों में घाव के साथ साथ पांडू तथा कामला (पीलिया) के लक्षण हों तो ऐसे रोगी के जीवन की आशा बहुत कम रहती है.
प्लीहा रोगी के लक्षण.
   प्लीहा वृद्धि के कारण रोगी अत्यंत दुखी रहता है. उसे हर समय मंद मंद ज्वर बना रहता है, अग्नि मंद हो जाती है, बल घट जाता है, तथा शरीर पीला पड़ जाता है. तिल्ली के स्थान पर दर्द होता है, जलन होती है, कब्ज बना रहता है, पेशाब कम होती है, तथा श्वांस, खांसी, प्यास, वमन (उल्टी) आदि उपद्रव प्रकट होते हैं. मुंह का स्वाद ख़राब रहता है. आँखें तथा हाथ की अंगुलियाँ एवम नाख़ून पीले पड़ जाते हैं. आँखों के सामने अँधेरा छा जाने लगता है और बेहोशी आदि के लक्षण दीखते है. प्लीहा के अत्यधिक बढ़ जाने पर दांत तथा नाक से खून गिरना, खून की उल्टी, दांतों की जड़ों में घाव, तथा सम्पूर्ण शरीर में सूजन के साथ ही पांडू कामला (पीलिया) के लक्षण प्रकट हो जाते हैं. इस बीमारी में ज्वर या तो निरंतर बना रहता है. अथवा समय छोड़ छोड़कर आता है. पेट बढ़कर बाहर की और निकल आता है. किसी किसी का सम्पूर्ण शरीर सूख जाता है. परन्तु कुछ लोग तिल्ली अथवा यकृत (लीवर) के बहुत बढ़ जाने पर भी स्वस्थ बने रहते हैं. उन्हें पाचन सम्बन्धी कोई शिकायत भी नहीं होती.
प्लीहा (तिल्ली – Spleen) को सही करने के घरेलु नुस्खे.
पुराना गुड डेढ़ ग्राम और बड़ी पीली हरड़ के छिलके का चूर्ण बराबर वजन मिलाकर एक गोली बनाये और ऐसी दिन में दो बार प्रात: सायं हल्के गर्म पानी के साथ एक महीने तक ले. इससे यकृत और प्लीहा यदि दोनों ही बढे हुए हो, तो भी ठीक हो जाते है. इस प्रयोग को तीन दिन तक प्रयोग करने से अम्लपित्त का भी नाश होता हैं.
निम्बू –
 निम्बू को बीच में से काटकर और उसको तवे पर गर्म करके थोडा सेंधा नमक मिलाकर भोजन से पहले जितना चूसा जा सके उतना चूसे. कुछ दिन ऐसा करने से बढ़ा हुआ लीवर और बढ़ी हुयी तिल्ली दोनों सही होकर अपने प्राकृतिक आकार में आ जाती है.
आम और शहद = 
70 ग्राम आम का रस 15 ग्राम शहद मिलाकर हर रोज़ सुबह 3 हफ्ते तक पीने से तिल्ली के घाव और सूजन में लाभ होता है. इस औषिधि में खटाई ना खाएं.
पपीता –
 तिल्ली में नियमित पपीता खाने से लाभ होता है.
गाजर – 
गाजर का आचार बनाकर खिलाने से बढ़ी हुई तिल्ली अपने वास्तविक रूप में आती है.
करेला –
 करेले का रस 25 ग्राम. एक कप पानी में मिलाकर दिन में तीन बार पियें. कुछ दिन प्रयोग करने से बढ़ी हुयी तिल्ली में आराम मिलेगा.
त्रिफला और काली मिर्च ( Triphala and Black Pepper ) : 
आपको एक काढ़ा तैयार करना है जिसके लिए आपको कुछ जरूरी सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी जो इस प्रकार है. आप सौंठ, दारुहल्दी, गियोल, सहिजन की छल, पीपल, त्रिफला, काली मिर्च और पुनर्नवा. इस सामग्री के मिश्रण से आप एक काढ़ा तैयार कर लें और उसे पी जायें. शीघ्र ही आपको प्लीहा रोग से मुक्ति मिलेगी.बैंगन –
 बैंगन के मौसम में जब तक बैंगन मिलते रहें तब तक खाने चाहिए. इस से भी बढ़ी हुयी तिल्ली सही होती है.
पुराना गुड ( Old Jaggery ) :
 माना जाता है कि नये गुड से अधिक लाभदायी पुराना गुड होता है अगर आपके पास पुराना गुड ना भी हो तो आप नये गुड को धुप में रखकर प्रयोग में ला सकते हो. इसको प्लीहा के रोग में इस्तेमाल करने के लिए आप कुछ बड़ी हरद में सेंधा नमक मिलायें और उसमे पीपल का चूर्ण डालें. इस पाउडर का आप गुड के साथ प्रतिदिन नियमित रूप से सेवन करें.अजवायन – 
15 ग्राम अजवायन सुबह मिटटी के बर्तन में 2 कप पानी डालकर भिगो दें. दिन में छायादार स्थान पर और रात में बाहर खुले में रखें जिस से यह ओस के संपर्क में रहे. सुबह अर्थात 24 घंटे के बाद इस पानी को छानकर पियें. इस प्रकार ये प्रयोग 15 दिन से 3 महीने तक करें. इस से बढ़ी हुयी तिल्ली ठीक होती है. (अजवायन इस रोग में बहुत लाभकारी है,इसलिए रोगी को अजवायन अधिक सेवन करवानी चाहिए)
अजवायन और नमक – 
सेंधा नमक (आधा ग्राम) और अजवायन का चूर्ण (2 ग्राम) मिलाकर भोजन के बाद गर्म पानी के साथ निरंतर सेवन करने से तिल्ली की वृद्धि में लाभ होता है. इस से पेट का दर्द बंद होता है. पाचन क्रिया सही होती है. कृमिजन्य सभी विकार तथा अजीर्ण आदि रोग दो तीन दिन में ही दूर हो जाते हैं. पतले दस्त होते हों तो वे भी बंद हो जाते हैं. जुकाम में भी लाभ होता है.
अंजीर – 
तिल्ली की वृद्धि में 2 अंजीर को जामुन के सिरके में डालकर नित्य सुबह खाली पेट खाएं.
बथुआ –
 कच्चे बथुए का रस या बथुआ उबाल कर उसका उबला हुआ पानी पियें. इससे तिल्ली ठीक होती है. स्वाद के लिए इसमें सेंधा नमक मिलाएं.
मिटटी – 
तिल्ली के रोग में एक महीने तक गीली मिटटी लगाने से लाभ होता है.
त्रिफला, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, सहिजन की छाल, दारुहल्दी, कुटकी, गिलोय एवं पुनर्नवा के समभाग का काढ़ा बनाकर पी जाएं.
प्लीहा वृद्धि (बढ़ी हुई तिल्ली)
अपराजिता की जड़ बहुत दस्तावर है. इसकी जड़ को दूसरी दस्तावर और मूत्रजनक औषधियों के साथ देने से बढ़ी हुई तिल्ली और जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) आदि रोग मिटते हैं तथा मूत्राशय की जलन भी मिटती है
.तिल्ली बढ़ने के आयुर्वेदिक घरेलु उपचार.
त्रिफला, सौंठ, काली मिर्च, पीपल, सहजन की छाल, दारुहल्दी, कुटकी, गिलोय, और पुनर्नवा को समान भाग में मिलाकर इसका काढ़ा बनाकर पी जाएँ. तिल्ली बढ़ने पर आराम मिलेगा.
तिल्ली बढ़ने पर बड़ी हरड, सेंधा नमक, और पीपल का चूर्ण पुराने गुड के साथ खाने से आराम होता है.
गिलोय और छोटी पीपल –
 गिलोय के दो चम्मच रस में तीन ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण और एक दो चम्मच शहद मिलाकर चाटने से तिल्ली का विकार दूर होता है. भूख खुलकर लगती है.
तिल्ली में वृद्धि होने पर आधा ग्राम नौसादर गर्म पानी के साथ सुबह के समय लेने से शीघ्र आराम मिलता है.
पुराना गुड और बड़ी हरड (पीली) के छिलके का चूर्ण बराबर वजन मिलाकर एक गोली बनायें. और ऐसी गोली दिन में दो बार प्रातः सांय हलके गर्म पानी के साथ एक महीने तक लें. इस से यकृत और प्लीहा (तिल्ली) यदि दोनों बढे हुयें हों तो भी ठीक हो जाते हैं. इसके तीन चार दिन सेवन से एसिडिटी में भी लाभ होता है.
प्लीहा के लिए कुछ विशेष आयुर्वेदिक इलाज.
प्लीहा शोथहर अर्क.
सज्जी खार डेढ़ किलो, बिना बुझा हुआ चूना (जिससे पुताई करते हैं) 75 ग्राम. दोनों को अलग अलग पीसकर आपस में मिला लें और 7 भागों में बाँट लें. अभी एक मिटटी के बर्तन में एक भाग डालकर इसमें 5 किलो पानी डालें और आग पर रख दीजिये. जब एक उबाल आ जाए तब नीचे उतार कर रख लें. कुछ दिन तक पड़ा रहने दें. जब इसकी गार नीचे बैठ जाए और पानी निथर जाए (अर्थात ऊपर साफ़ पानी दिखने लगे) तब ऊपर का पानी लेकर इसमें दवा का दूसरा भाग डालकर एक उबाल दिलाएं. और फिर इस को उसी प्रकार गार बैठने तक इंतजार करें और फिर निथरे पानी में तीसरा भाग डालें. इस प्रकार सातों भागों को इस प्रकार करें. अंत में जो पानी बचेगा वो ही प्लीहा शोथहर अर्क है. अर्क ठीक बना है या नहीं यह जानने के लिए अर्क में सर का बाल डालकर रख लें. यदि बाल जल जाए तो अर्क ठीक बना है. वरना सज्जी और चूना एक दो भाग और डालकर (उपरोक्त बताई गयी मात्रा के अनुसार) और एक दो बार और पकाएं. ठीक बन जायेगा.
इसकी 1 ग्राम से 2 ग्राम की मात्रा को 50 ग्राम पानी में डालकर पिलाया करें. कुछ ही दिनों में तिल्ली से शोथ हटकर तिल्ली असली हालत में आ जाएगी
प्लीहाघ्न चूर्ण.
शुद्ध गंधक 50 ग्राम, भुना सुहागा, लाहोरी नमक, सांभर नमक, काला नमक, प्रत्येक 10-10 ग्राम बारीक पीसकर रख लें. बस दवा तैयार है.
बालकों को 1 ग्राम युवकों को 3 ग्राम पानी से दिया करे. प्लीहा शोथ, पाचन शक्ति की दुर्बलता, शुधा ना लगना, आदि के लिए अत्यंत हितकर है.
प्लीहा मूलद्राव
मूली का रस 1 किलो, अदरक का रस 250 ग्राम, लहसुन का रस 125 ग्राम, नौशादर 60 ग्राम. मूली अदरक और लहसुन के रस को एक रोगनी मिटटी के बर्तन में डाल दीजिये, इसमें नौशादर भी पीसकर डाल दीजिये, फिर बर्तन का मुंह बंद करके 40 दिन तक रख दीजिये. 40 दिन बाद इस दवा को छानकर कांच की शीशी में भरकर रख लीजिये. रोगी की आयु और बल देखकर 1 ग्राम से 6 ग्राम तक की मात्रा 25 ग्राम पानी में डालकर सेवन कराएँ. तिल्ली की अनुपम औषिधि है.
प्लीहा के लिए फकीरी योग.
यवक्षार असली और नौशादर ठीकरी, दोनों बराबर लेकर अलग अलग बारीक पीसकर मिला लीजिये. रोगी की आयु और बल देखर 1 से 6 ग्राम गाढ़ी छाछ के साथ दिया करें. एक से दो हफ्ते के अन्दर तिल्ली कितनी भी बढ़ी हुयी क्यों ना हो अपनी असली हालत में आ जाएगी.
प्लीहा के लिए नौशादर और एलो वेरा.
1 किलो एलो वेरा का रस और 1 किलो नौशादर ठीकरी पीसा हुआ, दोनों को एक कलीदार बर्तन (ताम्बे या कांसे का बर्तन, जिसको अन्दर से कली की हुयी हो) में मुख बंद कर के रख देवें. 40 दिन बाद इसको कांच की बोतल में भर दें. रोगी को सुबह शाम 6-6 ग्राम की मात्रा में पिलायें. बहुत ही उत्कृष्ट प्रयोग है.
प्लीहा वृद्धि में अंजीर के प्रयोग.
गन्ने का सिरका एक किलो, इसमें 12 ग्राम सज्जी क्षार पीसकर मिलादें. और फिर इसमें सूखे अंजीर इतने डालिए के वो सिरके में डूबे रहें. 21 दिन पड़ा रहने दें. इसके बाद 2 अंजीर नित्य प्रातः खाने को दें. बहुत गुणकारी प्रयोग है.
अंजीर 24, नौशादर, खूबकला, रेवन्दचीनी, जीरा सफ़ेद, काला जीरा, पोदीना, बड़ी इलायची, टाटरी प्रत्येक 12-12 ग्राम लेकर बारीक कूट कर चीनी के या कांच के मर्तबान में डालकर ऊपर से 450 ग्राम सिरका डालकर रख दें. 20 दिन बाद खाने योग्य आचार बन जायेगा. हर रोग एक अंजीर रोगी को खिलाएं. 24 दिन में प्लीहा रोग सही होगा. इसकी सूजन उतर जाएगी. रोगी को भूख भी खुलकर लगेगी.
इस रोग में क्या ना खाएं.
इस रोग में भारी, गरिष्ठ, घी तेल में तले, मिर्च मसालेदार भोजन का सेवन ना करें.
घी और चीनी का प्रयोग बहुत ही कम करें. बंद ही कर दें तो अच्छा है.
शराब, चाय, कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक्स, तम्बाकू, मांस, मछली, मिठाइयाँ ना खाएं.
इस रोग में क्या ना करें.
कब्ज की शिकायत ना होने दें.
ज्यादा परिश्रम के काम ना करें.
रात्रि में देर तक जागरण ना करें.

सोमवार, 26 जून 2017

गर्दन के दर्द के घरेलू उपाय // Home remedies for neck pain




गर्दन दर्द को कभी हलके में नहीं लेना चाहिये क्‍योंकि इससे कई लक्षणों का पता चलता है। गर्दन में दर्द की समस्‍या से ना तो आप ठीक से उठ-बैठ सकते हैं और ना ही रोज मर्रा के काम कर सकते हैं।
गर्दन में दर्द होना एक आम समस्या है।जिसे लोग अक्सर इग्नोर कर देते है। कई बार तो यह परेशानी इतनी बढ़ जाती है कि काम करने में और उठने-बैठने में भी मुश्किल होती है। गर्दन में लगातार दर्द रहने पर डॉक्टरी सलाह जरूर लेनी चाहिए।आज हम आपको इस परेशानी से निजात पाने के कुछ घरेलू उपाय बता रहे हैं, जिससे आपको काफी फायदा मिलेगा।
सीधे बैठे
गर्दन दर्द का एक कारण झुककर बैठना भी हो सकता है।काम करते समय हमेशा अपनी रीढ की हड्डी को सीधे रखकर ही बैठना चाहिए।
मसाज
गर्दन की दर्द में मसाज करने से बहुत फायदा मिलता है। मसाज से आप अच्‍छी नींद सो सकते है, लेकिन मसाज हमेशा हल्के हाथों से ही करनी चाहिए।



गर्म सिकाई

गर्म पानी की सिकाई करने से दर्द को बहुत आराम मिलता है।इससे खून का दौरा तेज हो जाता है।
अदरक
यह एक दर्द निवारक दवा के रूप में काम करती है। अगर आप अदरक पावडर को पानी में मिला कर पियें या फिर इसे घिस कर गरम पानी में मिला कर पेस्‍ट बना कर गरदन पर लगाएं तो राहत मिलेगी।
आइस पैक लगाएं
गरदन की दर्द में आइस पैक काफी लाभ पहुंचाता है। आप चाहें तो बरफ के टुकड़े को कपड़े में बांध कर दर्द पर रख सकते हैं। इससे दर्द में काफी आराम मिलेगा।
हींग एवं कपूर
गर्दन में दर्द होने पर हींग और कपूर बराबर मात्रा में लेकर सरसों के तेल में मिलाकर अच्छे से फेंटकर क्रीम की तरह बना लें।अब इस पेस्ट से गर्दन की हल्के हाथों से मसाज करने से दर्द में आराम मिलता है।
गरम पानी से स्‍नान
गुनगुने पानी का शॉवर लेने से आपकी गर्दन को आराम मिलेगा और जल्दी असर दिखाई देगा।
सही मुद्रा बना कर रखें
शरीर की सही मुद्रा बना कर रखने से भी गरदन का दर्द ठीक करने में सहायता मिलती है। अपने शरीर को एक दीवार पर सटा कर खड़ा कीजिये। अपनी पीठ और बुटक को दीवार से लगाइये और ठुड्डी को बिल्‍कुल सीधे रखिये। बस इसी मुद्रा में सारे दिन रहिये।

रविवार, 25 जून 2017

दमा अस्थमा रोग मे उपयोगी योग आसन



    अस्थमा फेफड़े की एक बीमारी है जिसमें गला और छाती ज्यादा संवेदनशील रहते है| बदलते मौसम में अस्थमा के रोगियों की परेशानी बड़ जाती है| अस्थमा का मरीज धूल, धुँआ या अधिक सर्द वातावरण सहन नहीं कर पाते है| जहाँ ज्यादा ऑक्सीजन नहीं होती है वहां रहने में उन्हें तकलीफ होती है, साथ ही साँस लेने में परेशानी भी बनी रहती है|
   अस्थमा का कोई भी परमानेंट इलाज नहीं है| सामान्य दवाओं के इस्तेमाल से इसे नियंत्रित किया जा सकता है| योग विशेषज्ञ योगासन और व्यायाम के जरिये इसके संभव उपचार का दावा करते है| अपने नियमित भोजन में लहसुन, अदरक, तुलसी, हल्दी, कालीमिर्च, शहद और गर्म सूप को शामिल करें| कब्ज से बचें और अपने वजन को नियंत्रित रखें|
   


योगाचार्य बालकृष्ण के अनुसार, इस बीमारी का इलाज किसी एक थेरेपी से संभव नहीं है और रोगी को कई तरह की थेरेपी लेनी पड़ती है| उन्होंने कहा, अस्थमा के रोगियों को कार्बनिक भोजन का इस्तेमाल करना चाहिये, साथ ही योग थेरेपी तथा प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतो का पालन करना चाहिए|

उन्होंने कहा सांस लेने में परेशानी, खांसी, छाती में भारीपन, पेट फूलना, जुकाम, कमजोरी तथा शरीर में थकान होना इसके सामान्य लक्षण है
   अस्थमा के इलाज में योग आसन सबसे अधिक लाभदायक है| प्रायाणाम में शुरुवात में अनुलोम – विलोम का अभ्यास करें और फिर इसके बाद किसी योग चिकित्सक की मदद से कपालभाति का अभ्यास करें| आइये जानते है Yoga for Asthma को करने की विधि और लाभ –
अनुलोम विलोम

   इस आसन को करने के लिए एक शांत स्थान पर सामान्य अवस्था में बैठ जाये, उसके बाद अपने दायें हाथ के अंगूठे से दायें हाथ की नाक के छिद्र को बंद करें| अब बायें नाक के छिद्र से साँस को अंदर की ओर लें और उसे अंगूठे के बगल वाली उंगलियो से बंद करें, अब दायी नाक से अंगूठा हटाकर साँस को छोड़िये| ऐसा चार से पांच बार करें| यह प्रक्रिया आप दोनों नाक से बराबर करें|
  यह आसन दिमाग शांत करता है, अनिद्रा से बचाता है, आँखों की रौशनी बढ़ाता है, मस्तिष्क सम्बंधित समस्या से मुक्ति दिलाता है|
कपालभाति

   शांत वातावरण में आराम से बैठ जाये तथा साँस को अंदर करे और छोड़े, साँस लेते समय पेट को धक्का देते हुए साँस अंदर ले| इस आसन को प्रतिदिन करने से, वजन कम होता है, पेट की चर्बी कम होती है| चेहरे की झुर्रियां और आँखों के निचे का कालापन दूर होता है तथा चेहरे की चमक बढ़ती है| स्मरण शक्ति बढ़ती है और नकारात्मक तत्व दूर होते है|
मत्स्यासन

   पद्मासन की स्थिति में बैठ जाये फिर पीछे झुककर लेट जाइये| दोनों हाथों को आपस में बांधकर सिर के पीछे रखे अथवा पीठ के हिस्से को ऊपर उठाकर गर्दन के हिस्से को मोड़कर सिर को जमीन से लगाये|


दोनों पेरो के अंगूठो को हाथो से पकड़े और कोहनियो को जमीन से टिका कर रखें| इसे 1 से 5 मिनट तक करे फिर सामान्य अवस्था में आ जाएं| यह आसन पेट के रोग, मधुमेह, थाइराइड और पाचन प्रणाली के लिए बहुत ही फायदेमंद है|

भुजंगासन

   इस आसन को करने के लिए समतल जमीन पर पेट के बल लेट जाइये| दोनों हाथ कंधो के बराबर रखें तथा दोनों कोहनियो को शरीर के सामानांतर रखें| धीरे धीरे साँस अंदर भरकर, पहले मस्तक फिर छाती और फिर पेट को ऊपर की और उठाएं, नाभि को जमीं से लगा रहने दें| अब हाथों का सहारा लेकर शरीर को ऊपर उठाते हुए, कमर के पीछे की और खींचे| दोनों भुजाओ पर एकसमान भार रखें|
  इस आसन को करने से कंधे, कमर, पीठ और रीड की हड्डी के दर्द में आराम मिलता है| अस्थमा और श्वास सम्बंधित बीमारियो के लिए यह बहुत अधिक लाभदायक है|
शवासन

शवासन का अर्थ है मुर्दे के समान इसलिए इस आसन को शवासन कहा जाता है| इस आसन को करने के लिए पीठ के बल लेटकर दोनों पेरो में ज्यादा से ज्यादा अंतर रखते है| पैरों के पंजे बाहर और एड़िया अंदर की और रखते है| दोनों हाथो को शरीर से लगभग 6 इंच की दुरी पर तथा उंगलिया मुड़ी और गार्डन सीधी रहती है| साथ ही आँखों को बंद रखना चाहिए|
   


इस आसन को करने से शरीर के सभी आंतरिक अंगो का तनाव कम होता है, मन शांत रहता है, उच्च रक्तचाप और अनिद्रा की शिकायत दूर होती है साथ ही रक्त का प्रवाह सुचारू रूप से होता है|

चिकित्सकों के अनुसार, अस्थमा के मरीजों को कुछ सावधानिया भी रखनी चाहिए जैसे धूम्रपान ना करें, अगर कोई कर रहा हो तो उनसे दूर रहे, ठन्डे पेय पदार्थो से बचें, साँस फूलने लगे या थकान होने लगे ऐसे काम ना करें| समय समय पर चिकित्सको की राय लेते रहें|

शनिवार, 24 जून 2017

भ्रामरी प्राणायाम करने की विधि और फायदे


   भ्रामरी शब्द की उत्पत्ति ‘भ्रमर’ से हुई है जिसका अर्थ होता है एक गुनगुनाने वाली काली मधुमक्खी। इस प्राणायाम का अभ्यास करते समय साधक नासिका से एक गुनगुनाने वाली ध्वनि उत्पन्न करता है, यह ध्वनि काली मधुमक्खी की गूंज से मिलती-जुलती है, इसलिए इसका नाम भ्रामरी पड़ा है। योग की पुस्तक घेरंडसंहिता में भ्रामरी को दोनों हाथों से दोनों कानों को बंद कर श्वास लेने और रोकने के रूप में बताया गया है।
अर्धरात्रि गते योगी जन्तूनां शब्दवर्जिते।
कणौं पिघाय हस्ताभ्यां कुर्यात्पूरकुम्भकम्।। – घें. सं. 5/78
इस प्राणायाम के प्रतिदिन अभ्यास से साधक को दाहिने कान में विभिन्न प्रकार की ध्वनि सुनाई देती है, जैसे झींगुर की आवाज, बांसुरी, बिजली, ढोल, भौंरा, घड़ीघंट, तुरही इत्यादि और उसके बाद सबसे अंत में हृदय से उठती हुई अनहत की ध्वनि सुनाई पड़ती है। इस ध्वनि के मिश्रण से एक आंतरिक प्रकाश पुंज उठता है। उस प्रकाश पुंज में मस्तिष्क विलुप्त हो जाता है और योग के उच्चतम शिखर को प्राप्त करता है जिसे परमपद कहा जाता है। ऋषि घेरांद के अनुसार भ्रामरी प्राणायाम दिन में तीन बार किया जाना चाहिए। (घेरंडसंहिता 5/77)



भ्रामरी प्राणायाम विधि-

    हठप्रदीपिका के अनुसार भ्रामरी में पुरक के दौरान भ्रंगनाद (नर मधुमक्खी की ध्वनि) और रेचक के दौरान भृंगीनाद (मादा मधुमक्खी की ध्वनि) उत्पन्न होती है जिसको हठ प्रदीपिका में निम्न तरह से बताया गया है।
वेगाद्घोषं पूरकं भृङ्गनादं भृङ्गीनादं रेचकं मंदमंदम्।
योगीन्द्राणामेवमभ्यासयोगाच्चित्ते जाताकाचिदानंदलीला।। – ह. प्र. 2/68
सबसे पहले आप पद्मासन या सिद्धासन या किसी भी आरामदायक अवस्था में बैठें।
आंखें बंद कर लें।
मुंह बंद रखें और गहरा श्वास लें।
श्वास छोड़ते समय मधुर गुनगुनाने वाली ध्वनि करें।



दोनों कानों को अंगूठों से बंद कर लें और मधुमक्खी के गुनगुनाने की ध्वनि के साथ श्वास छोड़े।

यह एक चक्र हुआ।
इस तरह से आप 10 से 15 बार करें। और फिर धीरे धीरे इसको 10 से 15 मिनट्स तक करते रहें।
भ्रामरी प्राणायाम विधि, लाभ और सावधानी
वैसे तो भ्रामरी प्राणायाम के बहुत सारे फायदे हैं। यहां पर इसके कुछ महत्वपूर्ण लाभ के बारे में बताया गया है।
मस्तिष्क को शांत: भ्रामरी प्राणायाम मस्तिष्क को प्रसन्न एवं शांत रखता है।
तनाव : 
यह तनाव एवं घबराहट से राहत दिलाता है।
क्रोध कम करने में : यह क्रोध को कम करने में अहम भूमिका निभाता है।
समाधि का अभ्यास: 
यह चेतना को अंदर तक ले जाता है और समाधि का अभ्यास देता है।
चिंता को दूर करने में: यह प्राणायाम चिंता को कम करने में बहुत अहम रोल निभाता है।
डिप्रेशन के लिए बेहद जरूरी:
 अगर आप डिप्रेशन से ग्रसित हैं तो इस प्राणायाम का अभ्यास जरूर करें। यह डिप्रेशन को कम करने में रामबाण का काम करता है।



वासना :

 वासना की मानसिक और भावनात्मक प्रभाव को कम करता है।
शांत करने में: 
चूंकि यह प्राणायाम आपके शरीर को शीतलता प्रदान करती है जिसके कारण यह आपको शांत करने में अहम् भूमिका निभाता है।
स्वास्थ्य के लिए: 
यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। इसका नियमित अभ्यास से आप बहुत सारे परेशानियों से बच सकते हैं।
 सावधानियां
कानों में संक्रमण के दौरान इसे नहीं करना चाहिए।
हृदय रोग से पीड़ित व्यक्ति को यह कुंभक के बिना करना चाहिए।

बुधवार, 21 जून 2017

आंखों की रोशनी बढ़ाने वाले योग आसन


  आंख हमारे शरीर का सबसे अधिक आकर्षण वाला हिस्सा ही नहीं, बल्कि सबसे उपयोगी अंग भी है। इसका सिर्फ खूबसूरत होना तबतक मायने नहीं रखता जबतक कि आपके आंखों की रोशनी भी सलामत न हो, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो या तो आपकी खूबसूरत आंखों को चश्मे के मोटे-मोटे फ्रेम की नज़र लग जाएगी या फिर लेंस लगाने के झंझटों में फंसे ही रहेंगे। वैसे तो उम्र बढ़ने के साथ-साथ आंखों की समस्या से हमें जूझना ही पड़ता है, लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि आंखों के आसपास की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। यदि यह कसी रहे तो आपके आंखों की रोशनी को आपसे कोई दूर नहीं कर सकता। इसके लिए योग एकमात्र बेहतरीन उपाय है। इससे निकट दृष्टि और दूर दृष्टि दोनों की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। आइए, जानें कौन-कौन से योग और क्या उपाय हैं जो आपकी आंखों की रोशनी को लंबे समय तक आपके साथ तो रखेंगे ही, साथ ही यदि आप फिलहाल चश्मा इस्तेमाल कर रहे हैं तो उससे भी छुटकारा दिला सकते हैं।
   आँखों के जरिये ही हम सारे कामो को ठीक तरह से कर सकते है| इसलिए हमें इसका सही तरह से ख्याल रखना बेहद जरुरी है| दिन भर कंप्यूटर पर काम करना, ज्यादा देर टीवी देखना, या देर तक पढ़ाई करने के कारन हमारी आँखे सिर्फ थकती है नहीं, बल्कि स्ट्रेस का असर हमारी आँखों की रौशनी पर ही पड़ता है|
कई बार ऐसा होता है की पैसे कमाने की जरुरत के लिए देर रात तक जागना, या फिर घंटो काम करना हमारी मज़बूरी बन जाती है| ऐसे में हमारी आंखों के आसपास की माश्पेसिया अपने लचीलेपन को खो देती हैं और कठोर हो जाती हैं। नतीजनत् कम उम्र में ही दृष्टि दोष हो जाता है|
आपने हमेशा सुना होगा की योग से हमें कई स्वास्थ्य लाभ मिलते है| हम आपको बता दे की आँखों के लिए भी योग बेहद फायदेमंद है| आइये जानते है Yoga for Eyes in Hindi, किस तरह आँखों के लिए फायदेमंद है योग|
इन आसनो से बढ़ेगी आँखों की रौशनी
आँखों की रौशनी बढ़ाने के लिए योग एकमात्र बेहतरीन उपाय है। नियमित रूप से योगा करने पर आपके आँखों की रौशनी तो बढ़ेगी ही साथ ही निकट दृष्टि दोष और दूरदृष्टि दोष भी सही हो जाते हैं। जिससे आप लेंस लगाने या चश्मा लगाने के झंझटो से बच जायेंगे| और यदि आपको पहले से चश्मा लगा भी हुआ हो, तो वो भी उतर जायेगा|
चश्मा लगा है तो करे त्राटक आसन
अगर आपको काफी ज्यादा पावर के चश्मे लगे है और नंबर लगातार बढ़ता जा रहा है, तो त्राटक आसन करना आपके लिए फायदेमंद होगा| और यदि आपको चश्मा नहीं भी लगा हे तो त्राटक आसान करने के बाद आपको चश्मा लगाने की नौबत ही नहीं आएगी| इस आसन को अंधेरे में किया जाता है, इसलिए रात का समय बेहतर है| यदि आप इसे दिन में करते है तो कमरे को बंद कर अंधेरा कर लें। कमरे में एक मोमबत्ती जलाकर मोमबत्ती के सामने प्राणायाम की मुद्रा में बैठ जाएं। अब बिना पलकें झपकाए एकटक से मोमबत्ती को देखते रहें। इसके बाद आँखे बंद करके ओम का उच्चारण करें और फिर आंख खोल लें। इस प्रक्रिया को कम से कम 3 बार करें। आखिर में अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ें और फिर उस गर्म हथेली से आंखों को स्पर्श करते हुए आंख खोलें।  ध्यान रखें कि आंख खोलने के दौरान आपकी नजर आपकी नाक पर ही होनी चाहिए।



शवासन से बढ़ाये आँखों की रौशनी

शवासन को करने के लिए सबसे पहले पीठ के बल लेट जाएं| आसान करते वक्त अपने मन को शांत स्तिथि में रखे| इसके पश्चात पैरों को ढीला छोडकर हाथों को शरीर से सटाकर कर बगल में रख लिजिए। आपका पूरा शरीर फर्श पर स्थिर होना चाहिए। इस आसन को नियमित रूप से करने से शरीर की थकान दूर होती है और आंखों को आराम मिलता है और आँखों की रोशनी भी बढती है।पकी नजर आपकी नाक पर ही होनी चाहिए। इस आसान को सप्ताह में कम से कम 3 बार जरूर करें|
अनुलोम विलोम भी फायदेमंद
अनुलोम विलोम प्राणायाम को करने के लिए पालकी मांढ़कर बैठ जाये| आपकी कमर और गर्दन दोनों सीधी होनी चाहिए| अब अपनी आंखें बंद कर लें। अब अपने सीधे हाथ को नासारन्ध्रों पर ले जाएं। अब अपनी बीच की अंगुलियों को सीधा रखते हुए अंगूठे से दाएं नासारन्ध्र(नाक के छिद्र) को बंद कर लें। और बाएं नासारन्ध्र से धीरे-धीरे सांस को बाहर की ओर निकालें। सांस छोड़ने के बाद अब बाएं नासारन्ध्र से ही सांस भरना प्रारंभ करें। अधिक से अधिक सांस भरने के बाद बाएं नासारन्ध्र को अंगुलियों की मदद से बंद कर लें व अंगूठे को दाएं नासारन्ध्र से हटाकर दाईं नासिका से सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालें। इस प्रक्रिया 3 से 5 मिनट दोहराये| इस आसान को करने से मानसिक तनाव दूर होता है| आँखों की थकावट दूर होती है और रौशनी बढ़ती है|



सर्वांगासन से बढ़ाएँ नजर 
इस आसन में शरीर के सारे अंगों का व्यायाम एक साथ हो जाता है, इसलिए इसे सर्वांगासन का नाम दिया गया है।
कैसे करें:
सपाट जमीन पर पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों हाथों को शरीर के साइड में रखें। दोनों पैरो को धीरे-धीरे ऊपर उठाइए। पूरा शरीर गर्दन से समकोण बनाते हुए सीधा लगाएं और ठोड़ी को सीने से लगाएं। इस पोजिशन में 10 बार गहरी सांस लें और फिर धीरे-धीरे पैर को नीचे करें।यह आपकी आंखों के आसपास की मांसपेशियों में रक्त संचार को बढ़ाता है, जिससे आंखों की रोशनी हमेशा अच्छी बनी रहती है।
अन्य तरीके इन्हे भी अपनाये
अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ें और फिर तेजी से आँखों पर रखें। कुछ क्षण बाद हाथों को हटा लें और फिर धीरे-धीरे आंखें खोलें। आँखों को अधिक स्ट्रेस से राहत पहुंचाने के लिए यह बेहतरीन Yoga Exercises for Eyes है।
अपने आँखों का फोकस बढाने के लिए सबसे पहले तो एक ऐसा टार्गेट चुनें जो आपकी नजर से सबसे दूर हो और उसे देखने की कोशिश करें। रोज पांच से दस मिनट तक यह एक्सरसाइज करें। इससे दूर की नजर मजबूत होती है|
पलक को झपकाकर आप आँखों पर देर तक रहने वाले तनाव को कम कर सकते है| इसके लिए तीन से चार सेकंड तक अपनी पलकों को लगातार झपकाएं और फिर आँखे तेजी से बंद कर लें। कुछ सेकंड बाद फिर आँखे खोलें। यह आँखों को आराम दिलाने का सबसे आसान तरीका है|




प्राणायाम : 
हममें से कई लोग ऐसे हैं जो कंप्यूटर पर लगातार 10-12 घंटे काम करते हैं, जिससे उनकी आंखें धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ने लगती हैं। ध्यान रखें, आंखों को आराम देने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि आप रात में सोते हैं। क्या आप जानते हैं कि आंखों की रोशनी कमजोर हो तो यह आपकी याद्दाश्त को भी क्षीण कर सकती है? प्राणायाम आंखों की रोशनी को सही और आपके मानसिक स्वास्थ्य को भी बनाए रखता है। <br>इसे करने के लिए आप सबसे पहले ध्यान की मुद्रा में बैठ जाएं। अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रखें और पीठ सीधी रखें। अब आंखें बंद रखकर लंबी सांस लें और फिर छोड़ें। इस क्रिया को लगातार करें। ध्यान रखें कि जहां आप यह आसान कर रहे हों वहां उचित साफ-सफाई और वातावरण एकदम शांत हो।

सोमवार, 19 जून 2017

हरी मिर्च खाने के बेहतरीन फायदे

   

वैसे तो आमतौर पर इसका इस्तेमाल खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए ही किया जाता रहा है लेकिन हाल में हुए कई शोध इस बात का दावा करते हैं कि हरी मिर्च खाने से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.
   भोजन के साथ अगर साथ में हरी मिर्च ना रखी हो तो कहीं न कहीं कमी सी लगती है। भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर हरी मिर्च का प्रयोग भोजन में काफी किया जाता है। भारतीय हरी मिर्च में एक औषधी के समान है जिसमें शरीर के कई रोगों को खतम करने की ताकत है। हरी मिर्च में कई स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक गुण समाए होते हैं, इसलिये हमें इसे नियमित तौर पर अपने खाने में रखनी चाहिये।
    हरी मिर्च कई तरह के पोषक तत्वों जैसे- विटामिन ए, बी6, सी, आयरन, कॉपर, पोटेशियम, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है। यही नहीं इसमें बीटा कैरोटीन,क्रीप्टोक्सान्थिन, लुटेन -जॅक्सन्थि‍न आदि स्वास्थ्यवर्धक चीजें
हरी मिर्च के फायदे /
*रक्तचाप :-
रक्तचाप को नियंत्रित करने में हरी मिर्च काफी फयदेमंद होती है। मधुमेह होने की स्थिति में भी हरी मिर्च में रक्तचाप का स्तर नियंत्रित रखने के गुण होते हैं।
मौजूद हैं।



*.कैंसर से राहत दिलती है हरी मिर्च :-

हरी मिर्च में anti-oxidents होते है जो शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाते है और कैंसर से लड़ने में मदद करते है इस लिए हरी मिर्च का खाने के साथ सेवन करे |
*.स्किन के लिए मददगार है हरी मिर्च :-
हरी मिर्च मै बहत सारे विटामिन पाए जाते है जो स्किन के लिए फायदेमंद होते है अगर आप तीखा खाते है तो आपकी तवचा मै निखार आ जाता है लेकिन इतना तीखा भी नहीं खाना चहिये के आप को नुकसान हो |
*फेफड़ों के कैंसर का ख़तरा कम करे :-
हरी मिर्च का सेवन करने से फेफड़ों के कैंसर का ख़तरा काफी कम हो जाता है। इस बात का ध्यान धूम्रपान करने वालों को ज़्यादा रखना चाहिए क्योंकि वे रोज़ाना अपने फेफड़ों का थोड़ा सा हिस्सा हवा में उड़ा देते हैं |
*बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाव –
हरी मिर्च में एंटी बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जो कि संक्रमण को दूर रखते हैं। इसीलिए हरी मिर्च को खाने से आपको संक्रमण के कारण होने वाले त्वचा रोग परेशान नहीं करेंगे।
*आयरन बढाए –
महिलाओं में अक्‍सर आयरन की कमी हो जाती है लेकिन अगर आप हरी मिर्च खाने के साथ रोज खाएंगी तो आपकी यह कमी भी पूरी हो जाएगी।
*.मर्दों के लिए हरी मिर्च फायदेमंद:-



मर्दों को हरी मिर्च खानी चाहिए क्योंकि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर का ख़तरा रहता है। वैज्ञनिक शोधों ने यह साबित किया है कि हरी मिर्च खाने से प्रोस्टेट की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाती है।

*पाचन सुधरता है –
हरी मिर्च खाना जल्दी पचा देती है। साथ ही, शरीर के पाचन तंत्र में भी सुधार कर देती है। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। इसीलिए यह कब्ज दूर करती है।
*शुगर से आराम देती है हरी मिर्च :-
* हरी मिर्च ,पूछ समेत एक गलास पानी में रात को भिगो कर रखे और सुबहे ख़ाली पेट मिर्च को निकाल कर पानी पीये इस विधि का एक हफ्ते तक प्रयोग करे ऐसा करने से सुगर कन्ट्रोल में आ जाती है अगर फरक नहीं लगता तो 4 हप्ते तक इस पानी का सेवन करे |
*दमे के रोगी के लिए मददगार है हरी मिर्च :-
हरी ताजी मिर्च का एक चमच रस, शहद में मिलाकर ख़ाली पेट खाने से दमे के रोगी को राहत मिलेगी इस का प्रयोग दस दिनों तक करने से लाभ होगा 
*|विटामिन ए से भरपूर हरी मिर्च आंखों और त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद है.
*गर्मी के दिनों में यदि हम खाने के साथ हरी मिर्च खाए और फिर घर से बाहरजाए तो कभी भी लू नहीं लग सकती । खून में हेमोग्लोबिन की कमी होने पर रोजाना खाने के साथ हरी मिर्च खाए कुछ ही दिन में आराम मिल जायेगा।
*तीखा खाने से मूड बनता है बेहतर मिर्च खाने से दिमाग में एंडोर्फिन पैदा होता है जो कि आपका मूड हल्‍का बना कर आपको खुशी प्रदान करता है।

शुक्रवार, 16 जून 2017

आम के इतने सारे फायदे नहीं जानते होंगे आप!


आम के चमत्कारी फायदे 
आम के फल को शास्त्रों में अमृत फल माना गया है इसे दो प्रकार से बोया (उगाया) जाता है पहला गुठली बोकर उगाया जाता है जिसे बीजू या देशी आम कहते हैं। दूसरा आम का पेड़ जो कलम द्वारा उगाया जाता है। इसका पेड़ 30 से 120 फुट तक ऊंचा होता है।
इसके पत्ते 10 से 30 सेमी लम्बे तथा 2.5 से 7 सेमी चौडे़ होते हैं। आम के फूल देखने में छोटे-छोटे और हरे-पीले होते हैं। वसंत ऋतु में फूल (मौर) और ग्रीष्म ऋतु में फल उगते हैं। इस पेड़ के सभी भाग दवाइयों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
* संस्कृत : आम्र
* हिंदी : आम
*बंगला : आम
*कर्नाटकी : माविनेमार या मावपहेष्ण

*गुजराती : ऑंबो
* अरबी : अबज
* अग्रेंजी : मैंगों
* लैटिन : मैंगीफेरा इंडिका
* तैलगी : मामिडी चेट्ट या मवीं

*तमिल : मार्मर
* मलयालम : मावु
*. मराठी : ऑंबा
रंग : कच्चे आम का रंग हरा व पक्के आम का रंग पीला होता है।
स्वभाव : यह तर और गर्म प्रकृति का होता है।
स्वाद : आम खट्टे और मीठे व स्वादिष्ट होते हैं।
आम की किस्में :
लंगड़ा, फजली, चौसा, दशहरी, तोतापरी, गुलाब खास, पायरी, सफेदा, नीलम, हाफुस, अलकासो आदि। आम के पेड़ ज्यादातर गर्म देशों में होते हैं।
गुण :
ग्रन्थों के अनुसार आम का फल खट्टा, स्वादिष्ट, वात, पित्त को पैदा करने वाला होता है, किन्तु पका हुआ आम मीठा, धातु को बढ़ाने वाला (वीर्यवर्धक), शक्तिवर्धक, वातनाशक, ठंडा, दिल को ताकत देने वाला, पित्त को बढ़ाने वाला और त्वचा को सुन्दर बनाने वाला होता है।
यूनानियों के अनुसार कच्चे आम का स्वाद खट्टा, पित्तनाशक, भूख बढ़ाने वाला, पाचन शक्ति बढ़ाने वाला और कब्ज दूर करने वाला होता है।
वैज्ञानिकों द्वारा आम पर विश्लेषण करने पर यह पता चला है कि इसमें पानी की मा़त्रा 86 प्रतिशत, वसा 0.4 प्रतिशत, खनिज 0.4 प्रतिशत, प्रोटीन 0.6 प्रतिशत, कार्बोहाड्रेट 11.8 प्रतिशत, रेशा 1.1 प्रतिशत, ग्लूकोज आदि पाया जाता है।
दुष्प्रभाव :
अधिक मात्रा में कच्चे आम का सेवन करने पर वीर्य में पतलापन, मसूढ़ों में कष्ट, तेज बुखार, आँखों का रोग, गले में जलन, पेट में गैस और नाक से खून आना इत्यादि विकार उत्पन्न हो जाते हैं। खाली पेट आम खाना शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। भूखे पेट आम नहीं खाना चाहिए। आम के अधिक सेवन से अपच की शिकायत होती है। रक्त विकार, कब्ज बनती है। अधिक अमचूर खाने से धातु दुर्बल होकर नपुसंकता आ जाती है।
विशेष :
आम के कच्चे फलों को अधिक खाने से मंदाग्नि, विषमज्वर (टायफाइड), रक्तविकार, कब्ज एवं नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं।
आम के खाने के बाद पाचन सम्बन्धी शिकायत होने पर, दो-तीन जामुन खा लें। जामुन में आम को पचाने की तीव्र शक्ति होती है। जामुन उपलब्ध न होने पर, चुटकी भर नमक और सौंठ पीसकर खा लें।
यकृत और जलोदर के रोगी को आम नहीं खाना चाहिए।
आम खाने के बाद, दूध, जामुन, कटहल की गुठली, सूक्ष्म मात्रा में सौंठ, नमक या सिकंज के बीज सेवन करना चाहिए।
आम के सेवन के बाद दूध पीना चाहिए तथा पानी नहीं पीना चाहिए।
विभिन्न रोगों में आम का उपयोग
1. कमजोरी :
दूध में आम का रस मिलाकर पीने से शरीर की कमजोरी दूर होती है और वीर्य बनता है।
अच्छे पके हुए मीठे देशी आमों का ताजा रस 250 से 350 मिलीलीटर तक, गाय का ताजा दूध 50 मिलीलीटर अदरक का रस 1 चम्मच तीनों को कांसे की थाली में अच्छी तरह फेट लें, लस्सी जैसा हो जाने पर धीरे-धीरे पी लें। 2-3 सप्ताह सेवन करने से मस्तिष्क की दुर्बलता, सिर पीड़ा, सिर का भारी होना, आंखों के आगे अंधेरा हो जाना आदि दूर होता है। यह गुर्दे के लिए भी लाभदायक है।
2. सूखी खांसी : 

पके आम को गर्म राख में भूनकर खाने से सूखी खांसी खत्म हो जाती है।
3. नींद न आना : 

दूध के साथ पका आम खाने से अच्छी नींद आती है।
4. भूख न लगना :

 आम के रस में सेंधानमक तथा चीनी मिलाकर पीने से भूख बढ़ती है।
5. खून की कमी :
एक गिलास दूध तथा एक कप आम के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर नियमित रूप से सुबह-शाम पीने से लाभ प्राप्त होगा।
300 मिलीलीटर आम का जूस प्रतिदिन पीने से खून की कमी दूर होती है।
6. दांत व मसूढ़े के लिए :
आम की गुठली की गिरी (गुठली के अंदर का बीज) पीसकर मंजन करने से दांत के रोग तथा मसूढ़ों के रोग दूर हो जाते हैं।
आम के फल की छाल व पत्तों को समभाग पीसकर मुंह में रखने से या कुल्ला करने से दांत व मसूढ़े मजबूत होते हैं।
7. मिट्टी खाने की आदत :
बच्चों को पानी के साथ आम की गुठली की गिरी का चूर्ण मिलाकर दिन में 2-3 बार पिलाने से ये आदत छूट जाती है और पेट के कीड़े भी मर जाते हैं।
बच्चे को मिट्टी खाने की आदत हो तो आम की गुठली का चूर्ण ताजे पानी से देना लाभदायक है। गुठली को सेंककर सुपारी की तरह खाने से भी मिट्टी खाने की आदत छूट जाती है।
8. नाक से खून आना :

 रोगी के नाक में आम की गुठली की गिरी का रस एक बूंद टपकाएं।
9. मकड़ी का जहर :
मकड़ी के जहर पर कच्चे आम के अमचूर को पानी में मिलाकर लगाने से जहर का असर दूर हो जाता है।
गुठली को पीसकर लगाने से अथवा अमचूर को पानी में पीसकर लगाने से छाले मिट जाते हैं।



10. रक्तस्राव : आम की गुठली की गिरी का एक चम्मच चूर्ण बवासीर तथा रक्तस्राव होने पर दिन में 3 बार प्रयोग करें।
11. आग से जलने पर :
आम के पत्तों को जलाकर इसकी राख को जले हुए अंग पर लगायें। इससे जला हुआ अंग ठीक हो जाता है।
गुठली की गिरी को थोड़े पानी के साथ पीसकर आग से जले हुए स्थान पर लगाने से तुरन्त शांति प्राप्त होती है।
12. धातु को पुष्ट करने के लिए : 

आम के बौर (आम के फूल) को छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर 1-1 चम्मच दूध के साथ नियमित रूप से लें। इससे धातु की पुष्टि (गाढ़ा) होती है।
13. हाथ-पैरों की जलन :
हाथ-पैरों पर आम के फूल को रगड़ने पर लाभ पहुंचेगा।
आम की बौर (फल लगने से पहले निकलने वाले फूल) को रगड़ने से हाथों और पैरों की जलन समाप्त हो जाती है।
14. प्लीहा वृद्धि (तिल्ली के बढ़ने पर) :

 15 ग्राम शहद में लगभग 70 मिलीलीटर आम का रस रोजाना 3 हफ्ते तक पीने से तिल्ली की सूजन और घाव में लाभ मिलता है। इस दवा को सेवन करने वाले दिन में खटाई न खायें।
15. पाचन शक्ति (खाना पचाने की क्रिया) :
रेशेदार आम गुणकारी व कब्जनाशक होते हैं, आम खाने के बाद दूध पीने से आंतों को बल मिलता है। 70 मिलीलीटर मीठे आम का रस 2 ग्राम सौंठ मिलाकर प्रात: काल पीने से पाचनशक्ति बढ़ती है।
जिस आम में रेशे हो वह भारी होता है। रेशेदार आम अधिक सुपाच्य, गुणकारी और कब्ज को दूर करने वाला होता है। आम चूसने के बाद दूध पीने से आंतों को बल मिलता है। आम पेट साफ करता है। इसमें पोषक और रुचिकारक दोनों गुण होते हैं। यह यकृत की निर्बलता तथा रक्ताल्पता (खून की कमी) को ठीक करता है। 70 मिलीलीटर मीठे आम का रस, 2 ग्राम सोंठ में मिलाकर सुबह पीने से पाचन-शक्ति बढ़ती है।
16. मधुमेह (डायबिटीज) :
आम के कोमल पत्तों का छाया में सुखाया हुआ चूर्ण 25 ग्राम की मात्रा में सेवन करना मधुमेह में उपयोगी है।
जामुन व आम का रस एक समान मात्रा में मिलाकर नियमित रूप से पीने से मधुमेह ठीक हो जाता है।
छाया में सुखाए हुए आम के 1-1 ग्राम पत्तों को आधा किलो पानी में उबालें, चौथाई पानी शेष रहने पर छानकर सुबह-शाम पिलाने से कुछ ही दिनों में मधुमेह दूर हो जाता है
आम के पत्तों को छाया में सुखाकर कूट छान लें। इसे 5-5 ग्राम सुबह-शाम पानी से 20-25 दिन लगातार सेवन से मधुमेह रोग में लाभ होता है।
आम के 8-10 नये पत्तों को चबाकर खाने से मधुमेह पर नियंत्रण होता है।
17. सूखा रोग (रिकेटस): 

कच्चे आम के अमचूर को भिगोकर उसमें 2 चम्मच शहद मिला लें। इसे 1 चम्मच दिन में 2 बार लेने से सूखा रोग में आराम मिलता है।
18. लू लगने पर :
लू लगने पर केरी यानी कच्चे आम की छाछ पीने से लाभ होता है। जिस किसी को गर्मी या लू लग जाय, मुंह और जबान सूखने लगे, माथे, हाथ-पैर में पसीना छूटने लगे, दिल घबरा जाए और प्यास ही प्यास लगे तो ऐसी अवस्था में रोगी को केरी की छाछ निम्न विधि से बनाकर देना चाहिए। एक बड़ा-सा कच्चा आम उबालें या कोयलों की आग के नीचे दबा दें जब वह बैगन की तरह काला पड़ जाय तो उसे निकाल लें और ठंडे पानी में रखकर जले हुए छिलके उतार लें और इसे दही की तरह मथकर इसके गूदे में गुड़, जीरा, धनियां, नमक और कालीमिर्च डालकर इसे अच्छी तरह मथ लें और आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर दिन में 3 बार पीयें तो लू में लाभ होगा।
आम की कच्ची कैरी को गर्म राख में भूनकर, जल में उसके गूदे को मिलाकर थोड़ी-सी शक्कर डालकर पिलाने से लू का प्रकोप खत्म हो जाता है। लू लगने के कारण होने वाली जलन और बेचैनी से भी बचा जा सकता है।
कच्चे आम (कैरी) का शर्बत (पन्ना) बनाकर पीने से लू तथा बेचैनी में कमी आती है।
19. विषैले दन्त द्वारा काटे जाने पर :
पागल कुत्ते के, बंदर के, बिच्छू, मकड़ी का विष, ततैया के काटे जाने पर आम की गुठली पानी के साथ घिसकर लगाने से दर्द व घाव में आराम मिलता है।
अमचूर और लहसुन समान मात्रा में पीसकर बिच्छू दंश के स्थान पर लगाने से बिच्छू का जहर उतर जाता है।
20. गुर्दे की दुर्बलता : 

प्रतिदिन आम खाने से गुर्दे की दुर्बलता दूर हो जाती है।
21. अजीर्ण :
लगभग 10-15 ग्राम आम की चटनी को अजीर्ण रोग में रोगी को दिन में दो बार खाने को दें।
3-6 ग्राम आम की गुठली का चूर्ण अजीर्ण में दिन में 2 बार दें।
22. अर्श (खूनी बवासीर) :
आम की अन्त:छाल का रस दिन में 20-40 मिलीलीटर तक दो बार पिलायें। इससे बवासीर, रक्तप्रदर या खूनी दस्त के कारण होने वाले रक्तस्राव (खून का बहाव) में लाभ होता है।
15 से 30 मिलीलीटर आम के पत्तों का रस शहद के साथ दिन में 3 बार लें एवं ऊपर से दूध का सेवन करें।
आम की गुठली की गिरी का चूर्ण 1 से 2 ग्राम दिन में 2 बार सेवन करें।
23. तृष्णा (बार-बार प्यास लगना) :
लगभग 7 से 15 मिलीलीटर आम के ताजे पत्तों का रस या 15 से 30 मिलीलीटर सूखे पत्तों का काढ़ा चीनी के साथ दिन में 3 बार पीयें।
गुठली की गिरी के 50-60 मिलीलीटर काढ़े में 10 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने से भयंकर प्यास शांत होती है।
24. शरीर में जलन:
भुने हुए या उबाले हुए कच्चे आम के गूदे का लेप बनाकर लेप करें।
आम के फल को पानी में उबालकर या भूनकर इसका लेप बना लें और शरीर पर लेप करें इससे जलन में ठंडक मिलती है।
25. बच्चों के दस्त :
7 से 30 ग्राम आम के बीज की मज्जा तथा बेल के कच्चे फलों की मज्जा का काढ़ा दिन में 3 बार प्रयोग करें।
आम के गुठली की गिरी भून लें। 1-2 ग्राम की मात्रा में चूर्ण कर 1 चम्मच शहद के साथ दिन में 2 बार चटावें। यदि रक्तातिसार (खूनी दस्त) हो तो आम की अन्तरछाल को दही में पीस कर पेट पर लेप करें।
26. यकृत-प्लीहा का बढ़ना : 

10 मिलीलीटर फलों का रस शहद के साथ दिन में 3 बार लेने से रोग ठीक होता है।
27. सुन्दर, सिल्की और लंबे बाल : 

आम की गुठलियों के तेल को लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं तथा काले बाल जल्दी सफेद नहीं होते हैं। इससे बाल झड़ना व रूसी में भी लाभ होता है।
28. स्वरभंग : 

आम के 50 ग्राम पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में उबालकर चौथाई भाग शेष काढ़े में मधु मिलाकर धीरे-धीरे पीने से स्वरभंग में लाभ होता है।
29. खांसी और स्वरभंग : 

पके हुए बढ़िया आम को आग में भून लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चूसने से सूखी खांसी मिटती है।
30. लीवर की कमजोरी : 

लीवर की कमजोरी में (जब पतले दस्त आते हो, भूख न लगती हो) 6 ग्राम आम के छाया में सूखे पत्तों को 250 मिलीलीटर पानी में उबालें। 125 मिलीलीटर पानी शेष रहने पर छानकर थोड़ा दूध मिलाकर सुबह पीने से लाभ होता है।
31. अतिसार :
आम की गुठली की गिरी को लगभग 6 ग्राम की मात्रा में 100 मिलीलीटर पानी में उबालें। इसके बाद इसमें लगभग 6 ग्राम गिरी और मिलाकर पीस लें। इसे दिन में 3 बार दही के साथ सेवन करें तथा खाने में चावल और दही लें।
गुठली की गिरी 10 ग्राम, बेलगिरी 10 ग्राम तथा मिश्री 10 ग्राम तीनों का चूर्णकर 3-6 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है। गुठली की गिरी व आम का गोंद समभाग लेकर 1 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 से 3 बार सेवन करने से अतिसार मिटता है।
आम की गुठली की 10 से 20 ग्राम गिरी को कांजी के साथ पीसकर पेट पर गाढ़ा लेप करने से बहुत लाभ होता है।
आम के पेड़ की अन्तरछाल 40 ग्राम जौ कूटकर आधा किलो पानी में अष्टमांश काढ़ा सिद्ध करें। ठंडा होने पर इसमें थोड़ा शहद मिलाकर पिलाने से अतिसार (दस्त) विशेषकर आमातिसार में लाभ होता है।
आम की ताजी छाल को दही के पानी के साथ पीसकर पेट के आसपास लेप करने से लाभ होता है।
मिसरी, बेल की गिरी तथा आम की गुठली की गिरी एक समान मात्रा में पीसकर 1-1 चम्मच दिन में 3 बार ग्रहण करें।
15 से 30 मिलीलीटर आम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार दें।
5 ग्राम आम के तने की छाल या जड़ की छाल का चूर्ण शहद एवं बकरी के दूध के साथ दिन में तीन बार दें।
15 से 30 मिलीलीटर आम, जामुन एवं आंवलों के पत्तों से निकाला रस बकरी के दूध के साथ तीन बार दें।
32. गर्भिणी के आमातिसार : 

पुराने आम की गुठली की गिरी का चूर्ण 5-5 ग्राम को शहद या पानी के साथ भोजन के 2 घंटे पहले दिन में 3 बार सेवन कराने से लाभ होता है। भोजन में नमकीन चावल बिना घी डाले ले सकते हैं।



33. हैजा :
हैजे की शुरुआती अवस्था में 20 ग्राम आम के पत्तों को कुचलकर आधा किलो पानी में उबालें जब यह एक-चौथाई की मात्रा में शेष बचे तो इसे छानकर गर्म-गर्म पिलाने से लाभ होता है।
आम का शर्बत या आम का पना बार-बार पिलाना भी लाभकारी होता है।
250 ग्राम आम के पत्तों को कुचलकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाए तो उसे छानकर रोगी को थोड़ी-थोड़ी देर बाद, कई बार पिलाएं।
25 ग्राम आम के मुलायम पत्ते पीसकर एक गिलास पानी में तब तक उबालें जब तक कि पानी आधा न हो जाये और छानकर गर्म-गर्म दिन में दो बार पिलाने से अथवा कच्चे आम 20 ग्राम कूट कर दही के साथ सेवन करने से हैजा खत्म हो जाता है।
34. बालों का झड़ना : 

नरम टहनी के पत्तों को पीसकर लगाने से बाल बड़े व काले होते हैं। पत्तों के साथ कच्चे आम के छिलकों को पीसकर तेल मिलाकर धूप में रख दें। इस तेल के लगाने से बालों का झड़ना रुक जाता है व बाल काले हो जाते हैं।
35. उल्टी-दस्त : 

आम के ताजे कोमल 10 पत्ते और 2-3 कालीमिर्च दोनों को पानी में पीसकर गोलियां बना लें। किसी भी दवा से बंद न होने वाले, उल्टी-दस्त इससे बंद हो जाते हैं।
36. संग्रहणी :
ताजे मीठे आमों के 50 मिलीलीटर ताजे रस में 20-25 ग्राम मीठा दही तथा 1 चम्मच शुंठी चूर्ण बुरककर दिन में 2-3 बार देने से कुछ ही दिन में पुरानी संग्रहणी (पेचिश) दूर होती है।
कच्चे आम की गुठली (जिसमें जाली न पड़ी हो) का चूर्ण 60 ग्राम, जीरा, कालीमिर्च व सोंठ का चूर्ण 20-20 ग्राम, आम के पेड़ के गोंद का चूर्ण 5 ग्राम तथा अफीम का चूर्ण एक ग्राम इनको खरलकर, वस्त्र में छानकर बोतल में डॉट बंद कर सुरक्षित करें। 3-6 ग्राम तक आवश्यकतानुसार दिन में 3-4 बार सेवन करने से संग्रहणी, आम अतिसार, रक्तस्राव (खून का बहना) आदि का नाश होता है।
37. भूख बढ़ना

आम के फूलों (बौर) का काढ़ा या चूर्ण सेवन करने से अथवा इनके चूर्ण में चौथाई भाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से अतिसार, प्रमेह, भूख बढ़ाने में लाभदायक है।
38. प्रमेह (वीर्य विकार) : 

आम के फूलों के 10-20 मिलीलीटर रस में 10 ग्राम खांड मिलाकर सेवन करने से प्रमेह में बहुत लाभ होता है।
39. स्त्री के प्रदर में : 

कलमी आम के फूलों को घी में भूनकर सेवन करने से प्रदर में बहुत लाभ होता है। इसकी मात्रा 1-4 ग्राम उपयुक्त होती है।
40. एड़ी का फटना : 

आम के ताजे कोमल पत्ते तोड़ने से एक प्रकार का द्रव पदार्थ निकलता है इस द्रव पदार्थ को एंड़ी के फटे हिस्से में भर देने से तुरन्त लाभ होता है।
41. आम की चाय : 

आम के 10 पत्ते, जो पेड़ पर ही पककर पीले रंग के हो गये हो, लेकर 1 लीटर पानी में 1-2 ग्राम इलायची डालकर उबालें, जब पानी आधा शेष रह जाये तो उतारकर शक्कर और दूध मिलाकर चाय की तरह पिया करें। यह चाय शरीर के समस्त अवयवों को शक्ति प्रदान करती है।
42. धातु को बढ़ाने वाला : 

आम के फूलों के चूर्ण (5-10 ग्राम) को दूध के साथ लेने से स्तम्भन और कामशक्ति की वृद्धि होती है।
43. भैंसों का चारा : 

आम की गुठली की गिरी का अनाज और चारे की जगह अच्छा प्रयोग हो सकता है। इसमें प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट काफी मात्रा में पाये जाते हैं।
44. सूतिकृमि (पेट के कीड़े) : 

कच्चे आम की गुठली का चूर्ण 250 से 500 मिलीग्राम तक दही या पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से सूत जैसे कृमि नष्ट हो जाते हैं।
45. शक्तिवर्द्धक :
रोज सुबह मीठे आम चूसकर, ऊपर से सौंठ व छुहारे डालकर पकाये हुए दूध को पीने से पुरुषार्थ वृद्धि और शरीर पुष्ट होती है।
आम का रस 250 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से और इसके ऊपर से दूध पीने से शरीर में ताकत आती है।



46. दाद, खुजली, घाव आदि चर्म रोग में :

आम के कच्चे फलों को तोड़कर (जिनमें जाली न पड़ी हो), कुचलकर कपड़े में छानकर रस निकाल लें। रस का चौथाई भाग देशी शराब मिलाकर शीशी में भर कर रखें। 2 दिन बाद प्रयोग करें। इसके लगाने से पुरानी दाद, चम्बल आदि बीमारियां शीघ्र मिटती हैं। गहरे से गहरे नासूर भी इसे दिन में 2 बार लगाने से दूर होते हैं। इसे रूई की फुहेरी से लगाने से फूटी हुई कंठमाला, भगंदर, पुराने फोड़े आदि जड़ से दूर हो जाते हैं। इसे लगाने से बवासीर के मस्से भी सूख जाते हैं।
आम को तोड़ते समय, आमफल की पीठ में जो गोंदयुक्त रस (चोपी) निकलती है, उसे दाद पर खुजलाकर लगा देने से फौरन छाला पड़ जाता है और फूटकर पानी निकल जाता है। इसे 2-3 बार लगाने से रोग से छुटकारा मिल जाता है।
47. फोड़ों पर : 

आम के पेड़ का गोंद थोड़ा गर्म करके लगाने से फोड़ा पूरा पककर फूटकर बह जाता है और घाव आसानी से भर जाता है।
48. घमौरियां : 

गरमी के दिनों में शरीर पर पसीने के कारण छोटी-छोटी फुन्सियां हो जाती हैं, इन पर कच्चे आम को धीमी अग्नि में भूनकर, गूदे का लेप करने से लाभ होता है।
49. पेचिश :
दस्त में रक्त आने पर आम की गुठली पीसकर छाछ में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
आम के पत्तों को छाया में सुखाकर पीसकर कपड़े में छान लें। नित्य 3 बार आधा चम्मच की फंकी गर्म पानी से लें।
आम की गुठली को सेंककर नमक लगाकर प्रतिदिन खाने से दस्त होने पर पेट को ताकत मिलती है। 1-1 गुठली 3 बार नित्य खायें।
50. दांतों की मजबूती :

 आम के ताजे पत्ते खूब चबायें और थूकते जायें। थोड़े दिन के निरंतर प्रयोग से हिलते दांत मजबूत हो जायेंगे तथा मसूढ़ों से रक्त गिरना बंद हो जायेगा।
51. यक्ष्मा (टी.बी.) : 
एक कप आम के रस में 60 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम नित्य पीयें। नित्य 3 बार गाय का दूध पीयें। इस प्रकार 21 दिन करने से यक्ष्मा में लाभ होता है।
52. मस्तिष्क की कमजोरी : 

एक कप आम का रस, चौथाई कप दूध, एक चम्मच अदरक का रस, स्वाद के अनुसार चीनी सब मिलाकर एक बार नित्य पीयें। इससे मस्तिष्क की कमजोरी दूर होती है। मस्तिष्क की कमजोरी के कारण पुराना सिर दर्द, आंखों के आगे अंधेरा आना दूर होता है। शरीर स्वस्थ रहता है। यह रक्तशोधक भी है तथा यह हृदय, यकृत को भी शक्ति देता है।
53. शरीर में खून की कमी दूर करना : 

आम खाने से रक्त बहुत पैदा होता है। दुबले, पतले लोगों का वजन बढ़ता है। मूत्र खुलकर आता है। शरीर में स्फूर्ति आती है। आम का मुरब्बा भी ले सकते हैं।
54. सौंदर्यवर्धक : 

लगातार आम का सेवन करने से त्वचा का रंग साफ होता है तथा रूप में निखार आकर चेहरे की चमक बढ़ती है।
55. पायरिया : 

आम की गुठली की गिरी के महीन चूर्ण का मंजन करने से पायरिया एवं दांतों के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
56. पथरी :
आम के मुलायम व ताजे पत्ते छाया में सुखाकर महीन पीस लें और इस चूर्ण को एक चम्मच प्रतिदिन सुबह बासी मुंह पानी के साथ लें। इसके परिणामस्वरूप पथरी पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है।
आम के पत्तों को सुखाकर महीन (बारीक) चूर्ण बनाकर रखें। प्रतिदिन सुबह-शाम 2 चम्मच चूर्ण पानी के साथ खायें। इसको खाने से कुछ दिनों में ही पथरी गलकर पेशाब के द्वारा निकल जाती है।
57. बिच्छू काटना : 

अमचूर और लहसुन समान मात्रा में पीसकर काटे स्थान पर लगाने से बिच्छू का जहर मिट जाता है।
58. अनिद्रा : 

सोते समय रात को आम खाएं व दूध पीयें। इस प्रयोग से नींद अच्छी आएगी।
59. जलोदर : 

आम खाने से जलोदर रोग में लाभ होता है। नित्य 2-3 आम खायें।
60. अंडकोष की सूजन :
आम के पेड़ की गांठ को गाय के दूध में पीसकर लेप करने से अंडकोष की सूजन कम हो जाती है।
25 ग्राम की मात्रा में आम के कोमल पत्तों को पीसकर उसमें 10 ग्राम सेंधा नमक को मिलाकर हल्का-सा गर्म करके अंडकोष पर लेप करने से अंडकोष की सूजन मिट जाती है।



61. अंडकोष के एक सिरे का बढ़ना :
आम के पेड़ पर के बांझी (बान्दा) को गाय के मूत्र में पीसकर अंडकोष के बढ़े हिस्से पर लेप करने और सेंकने से लाभ होता है।
आम के पत्तों को नमक के साथ पीसकर लेप करें। इससे अंडकोष का बढ़ना, पानी भरना बंद हो जाता है।
62. श्वास या दमे का रोग :
आम की गुठली को फोड़कर उसकी गिरी निकाल लेते हैं। उसे सुखाकर पीस लेते हैं। इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा शहद के साथ चाटने से लाभ मिलता है।
आम की गुठली के चूर्ण को 2-3 ग्राम मात्रा में शहद के साथ चाटने से दमा, खांसी में लाभ मिलता है तथा पेचिश भी ठीक हो जाती है।
63. बाल बढ़ाने के लिए : 

10 ग्राम आम की गिरी को आंवले के रस में पीसकर बालों में लगाएं इससे बाल लम्बे और घने होते हैं।
64. बुखार होने पर : 

आम की चटनी बनाकर पीने से लू के कारण आने वाले बुखार में लाभ होता है।
65. रतौंधी :
अमोठ चूड़ा खाने से रतौंधी दूर होती है। आम का रस भी पीने से लाभ होता है।
रतौंधी रोग विटामिन `ए´ की कमी से होता है। आम में सभी फलों से ज्यादा विटामिन `ए´ होता है। इसलिए आम खाना रतौंधी रोग में लाभकारी है। चूसने वाला आम इस रोग में ज्यादा उपयोगी है।
66. अजंनहारी, गुहेरी

आम के पत्तों को डाली से तोड़ने पर जो रस निकलता है उस रस को गुहेरी पर लेप करने से गुहेरी जल्दी समाप्त हो जाती है।
67. मसूढ़ों के रोग :

 आम की गुठली की गिरी को बारीक पीसकर मंजन बना लें। इससे रोजाना मंजन करने से दांत व मसूढ़ों के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
68. खांसी : 

आम की गुठली की गिरी को सुखाकर पीस लेते हैं इसमें से एक चम्मच चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से खांसी से छुटकारा मिल जाता है।
69. आमाशय (पेट) का जख्म : 

आम की भुनी हुई गुठली की गिरी का चूर्ण बनाकर खाने से आंतों की कमजोरी मिट जाती है।
70. गंजेपन का रोग :

 एक साल पुराने आम के आचार के तेल से रोजाना मालिश करने से गंजेपन का रोग कम हो जाता है।
71. गैस्ट्रिक अल्सर : 

पके मीठे और रस युक्त आम को छानकर सेवन करने से गैस्ट्रिक अल्सर में लाभ होता है।
72. कब्ज (गैस) होने पर :

 आम को खाने के बाद दूध पीने से शौच खुलकर आती है और पेट साफ होता है।
73. सिर की रूसी : 

आम की गुठली और हरड़ दोनों को बराबर मात्रा में लें और इसे दूध के साथ पीसकर सिर में लगायें। इससे रूसी मिट जाती है।
74. गर्भधारण : 

आम के पेड़ का बान्दा पानी के साथ बारीक पीसकर मासिक धर्म खत्म होने के 2 दिन बाद सुबह के समय गाय के कच्चे दूध में मिलाकर सेवन करना चाहिए। इसके सेवन के बाद सेक्स करने से गर्भ ठहरता है।
75. दस्त होने पर :
आम और जामुन के पत्तों को पीस लें। इससे प्राप्त रस को 5-5 ग्राम की मात्रा में थोड़ा शहद मिलाकर एक दिन में 2 से 3 बार चाटें। इससे अतिसार यानी दस्त के साथ होने वाली उल्टी, बुखार (ज्वर) और प्यास आदि समाप्त हो जाती है।
आम की गुठली के चूर्ण को लगभग 15 ग्राम की मात्रा में ताजे दही के साथ खाने से लाभ मिलता है।
आम की गुठली की गिरी 25 ग्राम, जामुन की गुठली 25 ग्राम और भुनी हुई हरड़ को 25 ग्राम की मात्रा में पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इसी बने चूर्ण को पानी के साथ दिन में 2 से 3 बार पीने से लाभ होता है।
आम के फूल (बौर) को पीसकर उसमें 1 चम्मच दही को मिलाकर खाने से लाभ प्राप्त होता है।
आम की गुठली को पानी में अच्छी तरह घिसकर पीने और नाभि पर लगाने से लूज मोशम (अतिसार) में आराम मिलता है।
आम की गुठली, नमक, सोंठ, बेल की गिरी और हींग को पानी में घिसकर लगभग 2 ग्राम की मात्रा में 1 दिन में 2 से 3 बार पीने से आमातिसार और हल्के दस्तों में लाभ मिलता है।

वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय



रिसर्च में ये साबित हुआ है की वीर्य दो प्रकार का होता है एक तो गाढ़ा और सफ़ेद और दूसरा पतला पानी जैसा| रिसर्च में यह भी पाया गया है की ज्यादातर पुरुष अपने वीर्य को गाढ़ा करना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार गाढ़ा वीर्य मर्दाना ताकत और मर्दानगी का प्रतीक होता है| कुछ लोगों के अनुसार वीर्य का गाढ़ापन उनके पार्टनर को संतुष्ट करने के लिए जरुरी होता है| वहीँ कुछ पुरुष ऐसा भी सोचते हैं की पतला वीर्य होने पर उन्हें संतान प्राप्ति में दिक्कत होगी और गाढ़ा वीर्य उन्हें जल्दी संतान सुख प्रदान करेगा| इन्ही सब कारणों के कारण हर मर्द अपने वीर्य को गाढ़ा करना चाहता है|
वीर्य की 1 ml मात्रा में करीब 2 करोड़ शुक्राणु पाए जाते हैं| आप अपनी शुक्राणु की संख्या spermcheck kit के द्वारा घर में ही जांच सकते हैं| इस kit को आप ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं| जैसे की हमने ऊपर बताया की गाढ़ा वीर्य मर्दानगी का प्रतीक माना जाता है खास कर तब जब आप बच्चे के लिए प्लान कर रहे हों|
मोटापा, मानसिक तनाव, पोषण की कमी, tight अंडरवियर आदि कुछ कारन हैं जो की वीर्य के पतलेपन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं| आप अपने वीर्य में शुक्राणु की संख्या बढ़ा सकते हैं और उसे गाढ़ा भी कर सकते हैं| आपकी सहायता के लिए हमने वीर्य को गाढ़ा करने के टिप्स, उपाय और घरेलु नुस्खे इस लेख में बताये हैं जिन्हें अपनाकर आप वीर्य का गाढ़ापन और उसमें शुक्राणुओं की संख्या को जल्दी से बढ़ा सकते हैं|
एमिनो एसिड सप्लीमेंट के तौर पर या खाने के रूप में लें: एमिनो एसिड कुछ मात्रा में मांसों, फलों और सब्जियों में पाया जाता है। एमिनो एसिड वीर्य की मात्रा को बढ़ता है, और उसे गाढ़ा होने से भी बचाता है। एमिनो एसिड जो आपको खाने में सम्मिलित करना चाहिए।
एल- कार्निटीन (L-Carnitine) यह रेड मीट और दूध में पाया जाता है।
एल- आरगिनेइन (L-Arginine) यह ड्राईफ्रूट्स, तिल और अंडे में पाया जाता है।
एल- लीसीन- (L-Lysine) यह दूध और पनीर में पाया जाता है।
अपने आहार को बदलें: आपके खानपान में सुधार, अधिक और स्वस्थ वीर्य उत्पन्न करता है। इस प्रक्रिया को कम नहीं आंके।
प्रोसेस्ड फ़ूड का कम सेवन करें या फिर विल्कुल नहीं करें, और इसके बदले आहार जिसमें कम वसा और ज्यादा प्रोटीन हो उनका सेवन करें। ज्यादा सब्जी और अनाज खाएँ, संभव होने पर जैविक आहार (organic foods) खरीदें। बहुत ज्यादा पानी पीएँ। जो भी आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, वो वीर्य के लिए भी लाभदायक होता है।
अपना लाइफस्टाइल बदलो
ख़राब लाइफस्टाइल और नशा जैसे तंबाकू, धुम्रपान, शराब का सेवन ला प्रभाव निश्चित रूप से आपकी वीर्य की सेहत पर पड़ता है और वीर्य पानी जैसा पतला हो जाता है| इसलिए यह जरुरी हो जाता है की आप बुरी आदतों से दूर रहे और अच्छी लाइफस्टाइल आदतें जैसे अच्छा पोषण युक्त खान पान, नियमित exercise और अच्छी नींद लें| अच्छी आदतों से आपकी जनन क्षमता भी अच्छी होगी और वीर्य की सेहत में भी सुधार होगा|
ज्यादा सख्लन से बचें
जरुरत से ज्यादा हस्तमैथुन करना या फिर सामान्य से अधिक संभोग में रूचि लेने से अकसर वीर्य पतले हो जाता है| इसलिए जरुरी है की आप इस ज्यादा सख्लन होने से बचें और हो सके तो हफ्ते में एक या दो बार ही संभोग करें| यह सच है की सख्लन आपको मानसिक तनाव से मुक्त रखता है लेकिन वीर्य को गाढ़ा करने के लिए जरुरी है की आप अपने ऊपर थोडा सयम रखें|
supplements से लीजिये मदद
कुछ supplements जिनमें विटामिन E और जिंक पाया जाता है आपके वीर्य को गाढ़ा कर सकते हैं और आपकी मर्दानगी और यौनशक्ति को काफी बढ़ा सकते हैं| लेकिन यह जरुरी है की supplements का इस्तेमाल डॉक्टर की देख रेख में करें| आप अपने डॉक्टर को अपनी प्रॉब्लम बता कर उचित supplement ले सकते हैं| आप जरुरी विटामिन्स और minerals को कददू के बीज, अखरोट, बादाम आदि नियमित रूप से खा कर भी प्राप्त कर सकते हैं|
मिनरल जिंक (mineral zinc) का ज्यादा सेवन करें:
 इससे वीर्य की मात्रा, संख्या और टेस्टस्टेरन बढ़ती है। करीब 11 mg प्रति दिन लें, यह अखरोट, बीन्स, शुत्कि (oysters) या चिकन खाने से पूर्ति हो जाएगा।
अश्विनी मुद्रा का अभ्यास कीजिये
अश्विनी मुद्रा को इंग्लिश में kegel exercise के नाम से भी जाना जाता है| यह मर्दों के लिए काफी अच्छी मुद्रा मानी जाती है| यह लिंग की नसों में कमजोरी, शीघ्रपतन, वीर्य सम्बन्धी समस्याएँ और स्तम्भन दोष आदि को सही करने में काफी लाभप्रद मानी जाती है| इस exercise में आपको अपनी गुदा की muscles को अन्दर की और कुछ सेकंड्स खीच कर रखना होता है और फिर यह क्रिया एक बार में 10 बार करनी होती है|
*विटामिन C और एंटीअॅक्सीडेंट से भरपूर भोजन खाएँ: ये पोषक तत्व आपकी वीर्य से संबंधित बीमारी को कम करेगा और वीर्य के जीवनकाल को भी बढ़ाएगा। भोजनोपरान्त एक नारंगी खाएँ! एक 8 आउन्स (230 ml) ग्लास नारंगी के जूस में 124 ml विटामिन C होता है जो एक दिन के लिए काफी है।
*अपने आहार में फोलिक एसिड सप्लीमेंट लें: फोलिक एसिड (विटामिन B9) वीर्य की मात्रा बढ़ाने में मददगार साबित होता है। 400 ग्राम फोलिक एसिड हरी सब्जियां, फलियां, अनाज और नारंगी के रस में पाया जाता है।
जेहरीले वातावरण से करें बचाव
जेहरीले वातावरण और pollution का प्रभाव आपकी जनन क्षमता को कम करता है| यदि आप किसी high रिस्क इंडस्ट्री में काम करते हैं to दस्तानों और मुँह पर मास्क पहनकर अपने ऊपर होने वाले जेहरीले तत्वों के प्रभाव से बचाव करें| इसी प्रकार डिटर्जेंट और chemicals से काम करते समय अपने हाथों पर रबर के दस्ताने पहने|
विटामिन D और कैल्शियम के प्रतिदिन सेवन को बढ़ाएँ: 
आप दोनों को सप्लीमेंट के तौर पर भी ले सकते हैं या फिर कुछ समय धूप में व्यतीत करके विटामिन D की संश्लेषण कर सकते हैं। दही, स्लिम दूध, सैल्मन अधिक मात्रा में सेवन करके से आप कैल्शियम और विटामिन D की जरूरत को पूरा कर सकते हैं। अगर आप ज्यादा समय धूप में व्यतीत करते हैं तो अपने शरीर पर सनस्क्रीन लगाना नहीं भूलें ताकि सूर्य की हानिकारक किरणों से प्रभाव कम हो।
वीर्य को गाढ़ा करने वाली herbs यानि जड़ी बूटियाँ
हो सकता है जिन herbs के बारे में हम यहाँ बताने वाले हैं वो भारत में ना मिलती हों लेकिन इन्हें आप आसानी से ऑनलाइन आर्डर करके मंगवा सकते हैं| यहाँ कुछ ऐसी जड़ी बूटियाँ हम बताने जा रहे हैं जो की पुरुष की समस्त समस्याएं दूर कर सकती हैं और आपके वीर्य को गाढ़ा बना सकती हैं|
गोखरू
यह भारत में भी आसानी से मिल जाती है| इसमें पाए जाने वाले गुण आपके वीर्य को गाढ़ा करने में मदद करते हैं| इतना ही नहीं यह हर्ब वीर्य में शुक्राणु बढाती है, शुक्राणुओं की गतिशीलता बढाती है और शुक्राणु के जीवन को भी बढाती है| यह सभी बातें तब जरुरी होती हैं जब आपको संतान प्राप्ति में दिक्कत आ रही हो|
एलिसीन (Allicin) का सेवन करें: 
यह लहसुन में पाया जाता है, एलिसीन एक ओरगानोसल्फर यौगिक है जो वीर्य की मात्रा को यौन अंग में खून के संचार के अनुकूल बनाता है, जिससे स्वस्थ वीर्य की मात्रा बढती है। कुछ नए और दिलचस्प लहसुन युक्त खाना खाएँ या फिर लौंग और लहसुन की चाय बनाकर सुबह पी लें।
वीर्य को स्वस्थ बनाने वाले इन भोजनों का सेवन करें: अगर वीर्य को आँखों से चमकते हुए देखना चाहते हैं, तो अपने खानपान में इन चीजों का प्रयोग करें।
Goji berries (एंटीॅआक्सीडेंट)
जिनसेंग (Ginseng), अश्वगंधा
पम्पकिन सीड्स (omega-3 fatty acids)
अखरोट (omega-3 fatty acids)
एस्परगस (विटामिन C)
केला (विटामिन C)
ढीले कपडे पहनें: 
ऐसे कपडे पहने जिनसे आपके अंडकोश (testicles) पर दबाब न पड़े। गर्मी अंडकोश के लिए हानिकारक होती है, इसलिए ढीले वस्त्र जिसमें हवा का प्रवेश हो पहनें। अंडकोश का शरीर से बाहर होने का एकमात्र कारण यही है, ताकि उनमें ठंडक बनी रहे
अपने वज़न की जांच करें: 
ज्यादा या कम वजन हार्मोन प्रक्रिया के संचालन में प्रभाव डालता है। एस्ट्रोजन (estrogen) की ज्यादा मात्रा या टेस्टोश्टेरोन (testosterone) की कमी वीर्य की मात्रा में गलत प्रभाव डाल सकता है। जिम ज्वाइन करें, और खुद को प्रोत्साहित करने के लिए नए और दिलचस्प तरीके ढ़ूढें ताकि, अपने वज़न कम करने की लक्ष्य को आप पूरा कर पाएँ।
तनाव दूर करें: 
तनाव जानलेवा होता है। हालांकि, आप इसे कुछ समय के लिए संभाल लेंगे, मगर आपका वीर्य इतना मजबूत नहीं होता। तनाव वीर्य उत्पन्न करने वाले हार्मोन को कम कर देता है
गर्म टब से बाहर निकलें: 
यह सुखद तो होता है, लेकिन जब आप मनमोहक क्रिया में खोए होते हैं, आपके अंडकोश गर्मी से तप जाते हैं। टब में विश्राम को किसी और समय के लिए छोड़ दें।
साइकिल से उतर जाएं: 
साइकिल की सीटें वीर्य को कम करने के लिए प्रख्यात है, अगर कुछ पल के लिए आप सोचेंगे तो आपको महसूस होगा कि क्यों! दबाव, धक्का और उछाल- वीर्य को इनमें से कुछ भी पसंद नहीं है । जब ज्यादा वीर्य उत्पन्न करने की इच्छा हो तो कार या बस का प्रयोग करें।
वीर्य गाढ़ा करने का घरेलु नुस्खा.
वीर्य ही शारीर का सार है, एक योगी को सबसे ज्यादा दुःख अपने वीर्यपात होने पर ही होता है, मगर आज कल के युवा और आधुनिक डॉक्टर इसकी उतना नहीं आंकते, अत्यधिक मैथुन से या अश्लील सिनेमा और साहित्य से वीर्यपात कर चुके युवा जिनका वीर्य पानी कि भाँती हो चूका है, उनका जीवन नरक के समान है. वीर्य ही जीवन है, यही व्यक्ति कि आभा है, ये नहीं तो कुछ नहीं. वीर्य को गाढ़ा और शक्तिशाली करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन का ये प्रयोग बहुत लाभदायक है. आइये जाने.
वीर्य गाढ़ा करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन का प्रयोग.
    एक किलो सफ़ेद प्याज का रस निकाल कर रख लीजिये, अभी इसमें 100 ग्राम अजवायन को 12 घंटे तक सफेद प्याज के रस में भिगोकर रख लीजिये, रस इतना ही डाले के अजवायन इसको सोख ले, सुबह जब सारा रस अजवायन सोख ले तो इसको छाया में सुखा लें। सूखने के बाद उसे फिर से इसी प्रक्कर प्याज के रस में गीला करके सुखा लें। इस तरह से तीन बार करें। उसके बाद इसे कूटकर किसी बोतल में भरकर रख लें। आधा चम्मच इस चूर्ण को एक चम्मच पिसी हुई मिश्री के साथ मिलाकर खा जाएं। फिर ऊपर से हल्का गर्म दूध पी लें। करीब-करीब एक महीने तक इस मिश्रण का उपयोग करें। इस दौरान संभोग बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। यह सेक्स क्षमता को बढ़ाने वाला सबसे अच्छा उपाय है।
सफ़ेद मूसली पुरुष रोगों में रामबाण औषिधि. वियाग्रा और जिन्सेंग से कहीं बढ़कर है भारतीय सफ़ेद मूसली. आयुर्वेद में सदियों से ही इसका उपयोग कमजोरी से ग्रस्त रोगियों के लिए किया जाता रहा है. मुसली के पौधे की जड़ मूसल के समान होती और इसका रंग सफ़ेद होता है इसलिए इसे मुस्ली या मूसली कहा जाता है। वीर्य गाढ़ा करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन. वीर्य गाढ़ा करने का घरेलु नुस्खा. वीर्य ही शारीर का सार है, 
स्टेरॉयड (steroids) का सेवन समाप्त करें: 
यह भले ही आपकी मसल्स को बनाने में मददगार होंगे, लेकिन इससे आपके अंडकोश पर बुरा असर पड़ता है। वीर्य की मात्रा के अनुरूप ऐसा कौन चाहेगा? ऐनेबोलिक स्टेरइड (anabolic steroids) आपके समस्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

रविवार, 11 जून 2017

हिस्टीरिया के कारण, लक्षण और उपचार



हिस्टीरिया रोग जो है वो अमूमन अविवाहित लड़कियों और स्त्रियों को होता है और इसके होने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण भी है | हिस्टीरिया रोग होने पर रोगी को मिर्गी के समान दौरे पढ़ते है और यह काफी तकलीफदेह भी होता है | इसलिए इसके कारण और उपचार से जुडी जानकारी हम आपसे शेयर कर रहे है चलिए इस बारे में बात करते है |
आयुर्वेद में इसे ‘योषापस्मार’ के नाम से जाना जाता है। योषा शब्द स्त्रीवाचक है और अपस्मार मिर्गी का घोतक। यह रोग अविवाहित स्त्रियों को अधिक होता है। इस रोग में मिर्गी के समान दौरे पड़ते हैं।
हिस्टीरिया के कारण
हिस्टीरिया के प्रमुख कारणों में पर पुरुष से बलात्कार के कारण उत्पन्न खौफ, प्रेम में असफलता, काम वासना में अतृप्ति, प्रेमी से बिछुड़ना, शारीरिक मानसिक परिश्रम न कर आराम तलब जिंदगी गुजारना, अत्यंत भोग-विलास में जीवन व्यतीत करना, अश्लील साहित्य पढ़ना, उत्तेजक फिल्में देखना, श्वेत प्रदर से लंबे समय तक पीड़ित रहना, बांझपन, डिंबाशय व जरायु रोग, नाड़ियों की कमजोरी, आकस्मिक मानसिक आघात, मासिक धर्म का रुकना, कष्टपूर्ण मासिक धर्म, सास-बहू आदि परिवार के सदस्यों से तालमेल न बैठना, सामाजिक एवं पारिवारिक बंधनो में बांधना, चिंता, भय, शोक, मानसिक तनाव, अत्यधिक भावुक प्रकृति का होना, पति का वृद्ध, छोटा, बीमार होना या अन्य स्त्री से प्रेम का चक्कर, लम्बे समय तक पति से दूर रहना, संभोग करने का मौका न मिलना, जवानी बीत जाने पर भी विवाह न होना, असुरक्षा की भावना, बुद्धि की कमी, किसी गुप्त पाप को मन में दबाये रखना आदि होते हैं।
हिस्टीरिया के लक्षण
इस रोग के लक्षणों में रोगिणी को दौरा पड़ने से पूर्व आभास होने लगता है, लेकिन जब दौरा पड़ जाता है, तो उसे कुछ ज्ञान नहीं रहता। बेहोशी का दौरा 24 से 48 घंटों तक रह सकता है। मूर्च्छावस्था के दौरान ही झटके आते हैं, गले की मांसपेशियां जकड़ जाती हैं, मुट्ठी बंध जाती हैं, दांत भिंच जाते हैं, कंपकंपी होती है, श्वास लेने में तकलीफ होती है, सांस रूकती सी लगती है, पेट फूल जाता है, स्मृति का लोप हो जाता है, बहुत ज्यादा मात्रा में पेशाब होता है। इसके अलावा किसी किसी रोगी में हाथ-पैर पटकना, सांसे तेज चलना, ह्रदय की धड़कन अधिक बढ़ जाना, भयंकर सिर दर्द, बेचैनी, असंभव बातें बोलना, कभी रोना, कभी हंसना, कभी गाना, उलटी करना, आँखें नचाना, बाल और शरीर नोंचना आदि लक्षण भी देखने को मिलते हैं।
हिस्टीरिया में क्या खाएं
हिस्टीरिया का इलाज और रोकथाम खान पान को संतुलित करने से भी संभव है और रोगी अपनी खानपान की आदतों में बदलाव कर इसे संयमित कर सकती है |गेहूं की रोटी, पुराना चावल, दलिया, मूंग की दाल, मसूर की दाल भोजन में खाएं।
फलों में पपीता, अंजीर, खीरा, संतरा, मौसमी, अनार, बेल के फल का सेवन करें।
आंवले का मुरब्बा सुबह-शाम के भोजन के साथ खाएं।
गाय का दूध ,नारियल का पानी और मठा और छाछ का उपयोग खाने के दौरान अधिक से अधिक करें |
दूध पीते समय उसमे जितना आपको अच्छा लगे उतनी मात्रा  मे शहद  मिलकर उसके साथ किशमिश का सेवन करें | यह काफी लाभप्रद है |

हिस्टीरिया में क्या न खाएं
भारी, गरिष्ठ, बासी, तामसी भोजन न खाएं।
ताली-भुनी, मिर्च-मसालेदार, चटपटी चीजें सेवन न करें।
चाय, कॉफी, शराब, तम्बाकू, गुटखे से परहेज करें।
गुड़, तेल, हरी-लाल मिर्च, खटाई, अचार न खाएं।
मांस, मछली, अंडा आदि से परहेज करें।
हिस्टीरिया रोग निवारण में सहायक उपाय
हिस्टीरिया में क्या करें
सुबह घूमने जाएँ। नियमित हलका-फुलका व्यायाम करें।
रोगिणी अविवाहित हो तो विवाह करवा दें।
पति-पत्नी में सुलह करवाएं।
रोगिणी को दौरा पड़ने पर बदन के कपड़े ढीले कर दें। हवादार, साफ जगह में बिस्तर पर लिटाएं और सिर के नीचे तकिया लगा दें।
बेहोशी रोगिणी के मुँह, आँखों पर ठंडे पानी के छीटें मारें।
मानसिक कारणों का मनोवैज्ञानिक से विश्लेषण कराकर उपचार कराएं।
एक मोहल्ले से दूसरे या एक शहर से दूसरे शहर में स्थान परिवर्तन कराएं।
रोगिणी से थोड़ा सख्त व्यवहार करें, लेकिन उसकी उपेछा न करें।
हिस्टीरिया में क्या न करें
कब्ज या गैस बनने की शिकायत न होने दें।
रोगिणी से अत्यधिक सहानुभूति न जतायें।
एकांत निवास में रोगिणी को अकेला न छोड़ें।
अश्लील साहित्य न पढ़ें और न ही ऐसी फ़िल्में देखें।
घूम्रपान की आदत न पालें।
होश में लाने के लिए नाक के नथुनों में प्याज या लहसुन का रस या अमृतधारा या कपूररस की कुछ बूंदें टपकाएं।
गर्भाशय संबंधी विकारों के कारण दौरे पड़ रहे हों, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से इलाज कराएं।
अधिक मानसिक या शारीरिक परिश्रम तथा चिंता, भय, शोक न करें।
मल-मूत्रादि के वेगों को न रोकें
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