बुधवार, 24 मई 2017

नेत्र के पलकों की सूजन ( ब्लेफराइटिस ) रोग के कारण,लक्षण ,उपचार

  

 ब्लेफराइटिस आंखों की एक बीमारी है, जिसमें पलकों में सूजन आ जाती है। पलकों में सूजन आने का कारण हमारी त्वचा व पलकों के ऑयल ग्लैंड के ब्लॉकेज में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और एलर्जी होती है। ब्लेफराइटिस को नज़रअंदाज किया तो आईलैशेज़ कम हो सकते हैं।
ब्लेफराइटिस होने पर पलकें लाल हो जाती हैं, उनमें सूजन आ जाती है, खुजली होने लगती है और आईलैश पर पपड़ी-सी पड़ जाती है। साथ ही आंखें सूख जाती हैं। आंखों के सूखने का प्रमुख कारण आईलिड के ऑयल ग्लैंड का काम न करना होता है।

कारण-
ब्लेफराइटिस होने के कई कारण हैं। इनके कारणों की पहचान इस संक्रमण के प्रकार एक्यूट या क्रॉनिक के आधार पर की जाती है। एक्यूट ब्लेफराइटिस अल्सरेटिव और नॉन अल्सरेटिव दो तरह के होते हैं।
अल्सरेटिव एक्यूट ब्लेफराइटिस सामान्य तौर पर बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण होता है। यह संक्रमण आमतौर पर स्टेफाइलोकोक्कल एवं मेराक्जेला बैक्टीरिया के कारण होता है। वहीं हर्पीस सिम्पलेक्स और वेरिसेल्ला जोस्टर वायरस का संक्रमण भी ब्लेफराइटिस का आसाधारण कारण है।
नॉन अल्सरेटिव एक्यूट ब्लेफराइटिस होने का सामान्य कारण एलर्जिक रिएक्शन होता है। इस तरह के रिएक्शन होने पर एटॉपिक ब्लेफरो डर्मेटाइटिस, सीजनल एलर्जिक ब्लेफरो कंजंक्टिवाइटिस और डर्मेटो ब्लेफरो कंजंक्टिवाइटिस नामक संक्रमण हो जाता है।
ब्लेफराइटिस की  पहचान- 
आंखों की जांच व मरीज की हिस्ट्री पता की जाती है कि उसे कब, किस तरह के आंखों का संक्रमण हुआ था। उसके बाद आंखों की बाहर से जांच की जाती है। इसमें लिड स्ट्रक्चर, स्किन टेक्श्चर और आइलैश अपीयरेंस की जांच की जाती है। आईलिड के किनारे, आइलैशेज के बेस और मेल्बोमियन ग्लैंड ओपनिंग की माइक्रोस्कोप द्वारा जांच की जाती है। आंसू की क्वालिटी और मात्रा की भी जांच की जाती है।
लक्षण :ऐसा महसूस होना कि आंखों में कुछ चला गया है। आंखों में जलन होना। आंखों से पानी आना। आंखों या पलकों का लाल होना और उनका सूज जाना। आंखों का सूखना, स्पष्ट दिखाई न देना, आईलैशेज पर पपड़ी जम जाना और उसका कड़ा हो जाना। पलकें झपकने पर आंखों में भारीपन महसूस होना। इस तरह के लक्षण प्रायः सुबह नींद से उठने के बाद ज्यादा परेशान करते हैं।
रोग के प्रकार :



आईलिड के किनारों की दिखावट यानी अपीयरेंस के आधार पर ब्लेफराइटिस के प्रकार का निर्धारण किया जाता है। इंटीरियर ब्लेफराइटिस आईलिड के बाहरी किनारों पर जहां आईलैशेज जुड़े होते हैं, को प्रभावित करता है। पोस्टीरियर ब्लेफराइटिस आईलिड के ऑयल ग्लैंड, जो आंखों की तरलता बनाए रखने के लिए ऑयल का सीक्रिशन करती हैं, की कार्यप्रणाली में बाधा डालता है। इस संक्रमण से आंखों की तरलता खत्म हो जाती है और वे सूख जाती हैं। इस प्रकार का संक्रमण बैक्टीरिया के पनपने के लिए अनुकूल होता है। इसके अलावा मुंहासे और बालों में रूसी भी बैक्टीरिया के पनपने के लिए जिम्मेदार होती हैं। यह संभव है कि एकसाथ ही हमारी आंखें एंटीरियर और पोस्टीरियर दोनों प्रकार के ब्लेफराइटिस से संक्रमित हो जाएं। लेकिन दोनों प्रकार के संक्रमण की गंभीरता में फर्क हो सकता है।

ब्लेफराइटिस के उपचार-
ब्लेफराइटिस के उपचार के लिए एंटी-माइक्रो बायल्स का इस्तेमाल किया जाता है और पलकों की साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखना जाता है। एरिथ्रोमाइसिन, एजिथ्रोमाइसिन, क्लोरैमफेनिकॉल और टेट्रासाइक्लिन आदि एंटीबायोटिक्स आई ड्रॉप के तौर पर आंखों में डाला जाता है। बिना डॉक्टर की सलाह के दवा नहीं लेनी चाहिए।
सही इलाज न होने पर यह गंभीर रूप धारण कर लेता है। इसके कारण पलकों के किनारे असमान हो जाते हैं। ऐसा अल्सर के कारण घाव से होता है। इतना ही नहीं, इस बीमारी को नजरअंदाज करने से ट्राइकिएसिस भी हो सकता है। क्रॉनिक ब्लेफराइटिस के कारण आईलैशेज भी कम हो जाते हैं। ब्लेफराइटिस से बचने के लिए पलकों की साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए और गंदे हाथों से आंखों को छूने या उसे रगड़ने से बचना चाहिए। *इस बीमारी के उपचार में डॉक्टरी सलाह के साथ ही खुद के द्वारा आंखों की देखभाल बहुत महत्वपूर्ण होती है। जिन लोगों की पलकों में सूजन है, उन्हें उपचार के दौरान काॅस्मेटिक जैसे मस्कारा सहित आंखों के दूसरे मेकअप से बचना चाहिए।




*सूजी हुई आँखों को ठीक करने के लिए ग्रीन टी एवं ब्लैक टी काफी फायदेमंद हैं। चाय में मौजूद कैफीन रक्त वाहिकाओं को दबाता है जिसकी वजह से आँखों के नीचे से सूजन कम होती है। गरम पानी में अपनी पसंद के 2 टी बैग्स कुछ देर तक डुबोकर रखें और फिर निकाल लें। इसे ठंडा होने के लिए छोड़ दें और फिर अपनी आँखों पर लगाएं। इससे आँखों की जलन एवं आँखें लाल होने जैसी समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है।ग्रीन टी में प्राकृतिक आयुर्वेदिक गुण होते हैं। आँखों को ठीक करने का यह काफी कारगर एवं तेज़ उपाय है। दोनों आँखों पर टी बैग रखकर 10-15 मिनट तक छोड़ दें। इससे काफी फायदा मिलेगा।
*आँखों पर खीरे का प्रयोग काफी प्रचलित एवं असरदार पद्दति है। खीरा त्वचा को आराम देता है और अगर खीरा तुरंत फ्रिज से निकाला हुआ हो तो इसका असर और भी ज़्यादा होता है। इसके प्रयोग से त्वचा की सूजन कम होती है और चेहरा आकर्षक लगता है। खीरे में मौजूद एस्ट्रिंजेंट के गुण रक्त वाहिकाओं को संकुचित करते हैं और सूजन दूर करते हैं। खीरे का ठंडा अहसास ना सिर्फ त्वचा को सुकून देता है बल्कि दिमाग भी तरोताज़ा रखता है। इसमें जलन से रक्षा करने वाले गुण भी होते हैं जो आपकी आँखों को फूलने से बचाते हैं।
फ्रिज में रखा हुआ अंडे का सफ़ेद भाग भी आँखों के लिए काफी अच्छा सिद्ध होता है। अंडे से त्वचा में कसावट आती है। अंडे के सफ़ेद भाग को पीसकर एक ब्रश की मदद से आँखों के नीचे लगाएं एवं 15-20 मिनट के लिए छोड़ दें। इसके बाद आँखें ठन्डे पानी से धो लें।
*फ्रिज में मौजूद टी बैग्स भी आँखों के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। दो टी बैग लें और उन्हें ठन्डे पानी में डुबोकर कुछ देर तक फ्रिज में रखें। अब इन्हें निकालकर 25-30 मिनट तक आँखों पर रखें और अच्छे परिणाम के लिए आँखें ठन्डे पानी से धो लें।1 गिलास गरम पानी में नमक मिलाएं और कॉटन पैड्स की सहायता से आँखों पर लगाएं। कुछ देर इसी तरह रखने पर कमाल के नतीजे सामने आएँगे। आप आँखों की सूजन / पफी आइज़ कम करने के लिए ठन्डे पानी में डुबोये हुए कॉटन बॉल्स में विटामिन E का तेल मिलाकर आँखों पर लगाकर रख सकते हैं।

सावधानी-
सोडियम की अत्याधिक मात्रा से आपकी आँखों में सूजन आती है। अतः तीखे एवं मसालेदार खाने से परहेज करें। खाने में नमक कम करें एवं तले हुए खाने से दूर रहें।

शुक्रवार, 19 मई 2017

मूत्र का रुक – रुक कर आने के घरेलू उपचार


मूत्रावरोध का कारण व लक्षण
पेशाब का रुक-रुक कर आना भी प्राय: वृधावस्था की ही बीमारी है। इस रोग का प्रमुख कारण या तो मूत्र मार्ग में आया कोई अवरोध या मांसपेशियों पर शरीर के नियंत्रण में कमी होना होता है।
मूत्रावरोध का उपचार
* शलगमः पेशाब के रुक-रुककर आने पर शलगम व कच्ची मूली काटकर खानी चाहिए। इससे काफी लाभ होगा।
*नारियलः नारियल के सेवन से मूत्र संबंधी रोगों में काफी फायदा होता
*बेलः पांच ग्राम बेल के पत्ते, पांच ग्राम सफेद जीरा व पांच ग्राम सफेद मिश्री को मिलाकर पीस लीजिए। इस प्रकार तैयार चटनी को तीन-तीन घंटे के अंतराल के बाद खाएं। इससे खुलकर पेशाब आएगा।
*गुर्दे के रोग -

*आम की बनावट गुर्दे जैसी होती है। नित्य आम खाने से गुर्दे की दुर्बलता दूर हो जाती है। *अंगूर की बेल के ३० ग्राम पत्तों को पीसकर पानी मिलाकर छानकर नमक मिलाकर पीने से गुर्दे के दर्द में आराम मिलता है। 
*लौकी के टुकड़े को गर्म करके दर्द वाले स्थान पर इसके रस की मालिश करने से और लेप करने से आराम मिलता है।
मूत्रजलन —
 इलायची और आंवले का चूर्ण समान भाग में मिलाकर पानी से पीने पर मूत्र की जलन ठीक होती है।



पेशाब की रुकावट —
पलास के फूल सूखे या हरे पानी के साथ पीसकर थोड़ा सा कलमी शोरा मिलाकर नाभि के नीचे पेडू पर लगाने से ५.१० मिनट में पेशाब खुलकर आने लगता है।
पथरी — 
१ गिलास पानी में १ नींबू निचोडकर सेंधा नमक मिलाकर सुबह शाम दो बार नित्य १ माह तक पीने से पथरी पिघलकर निकल जाती है।
*आंवलाः आंवले को पीसकर पेडू पर लेप कर दें। कुछ ही मिनटों में खुलकर पेशाब आ जाएगा।
खीराः ताजे परंतु कच्चे खीरे को काटकर नमक में मसल लें व कुछ बूंद नीबूमिलाकर खाएं, दो घंटे तक पानी न पीएं पेशाब की सारी रुकावटें समाप्त हो जाएंगी।
उपचार
* नीबूः नीबू के बीजों को महीन पीसकर नाभि पर रखकर ठंडा पानी डालें। इससे रुका हुआ पेशाब खुल जाता है।
*. केलाः केले के तने का चार चम्मच रस लेकर उसमें दो चम्मच घी मिलाकर पीएं। इससे बंद हुआ पेशाब तुरंत खुलकर आने लगता है। केले की जड़ के रस को गोमूत्र में मिलाकर सेवन करने से रुका हुआ पेशाब खुल जाता है। केले की लुगदी बनाकर उसका पेडू पर लेप करने से भी पेशाब खुल जाता है। यह काफी प्राचीन व मान्यताप्राप्त नुस्खा है।
3. अरंडीः अरंडी का तेल 25 से 50 ग्राम तक गरम पानी में मिलाकर पीने से भी 15-20 मिनट में ही रुका हुआ पेशाब खुल जाता है।
पेशाब रुकना — हरे धनिए की पत्तियों का रस दो तोले और एक तोला शक्कर मिलाकर दें यदि एक बार देने से लाभ न हो तो दोबारा दें। गर्म दूध में गुड मिलाकर पीने से मूत्राशय के रोगों में लाभ होता है। यह नित्य एक गिलास दो बार पिएं। गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बंद हो जाए तो मूली का रस दो औंस प्रति मात्रा पीने से वह फिर बनने लगता है। नींबू के बीजों को पीसकर नाभि पर रखकर ठण्डा पानी डालें। रुका हुआ पेशाब होने लगता है। जीरा और चीनी—दोनों को समान मात्रा में पीसकर दो चम्मच फंकी लेने से लाभ होता है। रोज दो बार ५० ग्राम नारियल खाने से लाभ होता है। ककड़ी का रस लेने से मूत्र अधिक मात्रा में आता है। खरबूजा लेने से भी लाभ होता है। केले के तने का रस चार चम्मच, घी दो चम्मच मिलाकर नित्य दो बार पिलाने से पेशाब खुलकर आता है। मूत्रकृच्छ (पेशाब में रक्त आना और रुकावट) रात को कोरी हाँडी में आधा किलो उबलता हुआ पानी भर कर उसमें तीस ग्राम अधकचरा कुटा हुआ धनिया डालना।
* तरबूजः तरबूज के भीतर का पानी 250 ग्राम, 1 माशा जीरा व 6 माशा मिश्री को मिलाकर पीने से मूत्र का रुकना ठीक हो जाता है व रोगी को बहुत आराम मिलता है।
* नारियलः नारियल व जौ का पानी, गन्ने का रस व कुलथी का पानी मिलाकर पीने से पेशाब खुल जाता है।



मूत्र का पीलापन

*शहतूतः शहतूत के शरबत में थोड़ी शक्कर घोलिए और पी जाइए। इससे पेशाब का पीलापन दूर हो जाएगा।
*संतराः पेशाब में जलन होने पर नियमित एक गिलास संतरे का रस पीएं।
* नीबूः नीबू की शिकंजी पीने से पेशाब का पीलापन दूर हो जाता है।
पेशाब रोग की होमियोपैथिक दवा
लक्षणों की समानता के आधार पर उपरोक्त वर्णित बीमारियों एवं रोग लक्षणों के लिए निम्न होमियोपैथिक औषधियां अत्यधिक कारगर एवं सफल सिद्ध रही हैं –
सारसापेरिला : पेशाब के समय असह्य कष्ट होना, गर्म चीजों के सेवन से कष्ट बढ़ना, बैठक पेशाब करने में तकलीफ के साथ-साथ बूंद-बूंद करके पेशाब उतरना, खड़े होकर करने पर पेशाब आसानी से होना, पेशाब में सफेद पदार्थ का निकलना और पेशाब का मटमैला होने की स्थिति में 6 शक्ति में लें।
केंथेरिस : मूत्र-मार्ग का संक्रमण, बार-बार पेशाब जाना, असंयम, पेशाब रोक पाने में असमर्थ, पेशाब रोकने पर दर्द, बूंद-बूंद करके पेशाब होना, पेशाब से पहले एवं पेशाब के बाद में जलन रहना, हर वक्त पेशाब की इच्छा, जेलीयुक्त पेशाब आदि लक्षण मिलने पर दवा 30 शक्ति में प्रयोग करनी चाहिए।
नाइट्रिक एसिड : थोड़ा पेशाब होना, घोड़े के बदबूदार पेशाब जैसी दुर्गंध, जलन, चुभन पेशाब में खून एवं सफेद पदार्थ (एल्ब्युमिन) आना, ठंडा पेशाब, साथ ही किसी चौपहिया गाड़ी में चलने पर सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं, तो 30 शक्ति में औषधि का सेवन करना चाहिए।
हेमेमिलिस : बार-बार पेशाब की हाजत के साथ ही पेशाब में खून आना (काले रंग का रक्त स्राव, स्त्रियों में उपनियमित माहवारी) मूल अर्क में 5-10 बूंद औषधि दिन में तीन बार नियमित रूप से लेने पर आराम मिलता है। 30 शक्ति में भी ले सकते हैं।
एपिस : पेशाब में जलन व दुखन, कम मात्रा में कतरे आना, बार-बार हाजत, चुभन जैसा दर्द, गाढ़े पीले रंग का पेशाब, पेशाब की हाजत होने पर रोक पाना मुश्किल, आखिरी बूंद पर अत्यधिक जलन एवं दर्द महसूस होना आदि लक्षण मिलने पर 30 शक्ति में सेवन करना लाभप्रद रहता है।


रविवार, 14 मई 2017

एयर कंडीशनर के मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव

   एयर कंडीशनर गर्म तापमान से राहत देकर आपको ठंडक और सुकून का एहसास कराता है, वह भी बगैर शोर शराबे के। यही कारण है कि अब पंखे और कूलर से ज्यादा एसी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। दफ्तर में तो पूरे आठ घंटे आप एसी में बैठते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लंबे समय तक एसी में बैठना आपके लिए बेह हानिकारक हो सकता है? अगर नहीं जानते, तो अब जरूर जान लीजिए... 
*मोटापा - 
आपको जानकर हैरानी होगी, लेकिन यह पूरी तरह सच है कि एसी के इस्तेमाल से आपके शरीर में मोटापा बढ़ सकता है। तापमान कम होने के कारण हमारा शरीर अधिक सक्रिय नहीं हो पाता और शरीर की ऊर्जा का सही मात्रा में उपयोग नहीं हो पाता, जिससे मोटापा बढ़ता है। 
*त्वचा की समस्याएं - 
एसी के दुष्प्रभाव आपकी त्वचा पर भी दिखाई देते हैं। यह आपकी त्वचा की प्राकृतिक नमी समाप्त कर सकता है जिससे आपकी त्वचा में रूखापन महसूस होता है। 
*रक्तसंचार - 
एसी में बैठने से शारीरिक तापमान कृत्रिम तरीके से ज्यादा कम हो जाता है जिससे कोशिकाओं में संकुचन होता है और सभी अंगों में रक्त का संचार बेहतर तरीके से नहीं हो पाता, जिससे शरीर के अंगों की.क्षमता प्रभावित होती है। 
* बुखार या थकान - 

लंबे समय तक एसी में रहने से आपको लगातार हल्का बुखार और थकान बने रहने की समस्या हो सकती है। इतना ही नहीं इसका तापमान ज्यादा कम करने पर आपको सिरदर्द और चिड़चिड़ाहट महसूस हो सकती है। अगर आप एसी से निकलकर सामान्य तापमान या गर्म स्थान पर जाते हैं तो आप लंबे समय तक बुखार से पीड़ित हो सकते हैं।
*जोड़ों में दर्द - 








लगातार एसी के कम तापमान में बैठना सिर्फ घुटनों की समस्या ही नहीं देता बल्कि आपके शरीर के सभी जोड़ों में दर्द के साथ-साथ अकड़न पैदा करता है और उनकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। आगे चलकर यह हड्ड‍ियों से जुड़ी बीमारियों को जन्म भी दे सकता है।
*ब्लडप्रेशर व अस्थमा -
 अगर आपके ब्लडप्रेशर संबंधित समस्याएं हैं तो आपको एसी से परहेज करना चाहिए। यह लो ब्लडप्रेशर के लिए जिम्मेदार हो सकता है और सांस संबंधी समस्याएं भी पैदा कर सकता है। अस्थमा के मरीजों को भी एसी के संपर्क में आने से बचना चाहिए। .
सावधानियाँ-
*ऐसे कई ऑफिस होते हैं जहां पूरे दिन AC में बैठना मजबूरी होती है। ऐसी स्थिति में हर एक या दो घंटे में 5 से 7 मिनट के लिए ऑफिस के ही ऐसे स्थान पर जाएं जहां AC की कूलिंग नहीं हो (AC से सीधे धूप में ना जाएं)।
*अगर संभव हो तो AC को हर एक या दो घंटे में कुछ समय के लिए बंद कर दें।
*AC की हवा का एक्सपोजर सीधे सिर या आंखों पर न हो।

शनिवार, 13 मई 2017

लू लगने(Heat Stroke) के कारण ,उपाय ,उपचार



   सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि लू क्या है ? गर्मी के मौसम में गर्म हवाएं चलने लगती हैं । निर्बल या कमजोर व्यक्तियों में इसका खतरा अधिक रहता है । युवाओं की तुलना में बच्चे और वृद्ध इसकी चपेट में ज्यादा आते हैं । इसी प्रकार मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग से पीड़ित व्यक्ति भी गर्म हवाओं की चपेट में जल्दी आ जाते हैं । किसी व्यक्ति को लू लगी है या नहीं, इसका पता उसके शरीर में हुए परिवर्तनों या लक्षणों को देख कर लगाया जा सकता है ।
>लू लगने के लक्षण

लू लगने से चक्कर आने लगते हैं, श्वास लेने में कठिनाई उत्पन्न होने लगती है, नब्ज की गति बढ़ जाती है, तीव्र सिर दर्द, बदन दर्द और सम्पूर्ण शरीर में कमजोरी का एहसास होने लगता है, मन खराब होने लगता है और उल्टियां भी आ सकती हैं। शरीर में पसीना नहीं आता और त्वचा खुश्क हो जाती है । कई बार लू से पीड़ित व्यक्ति बेहोश हो जाता है।लू से बचने के लिए कुछ उपाय इस प्रकार है -
*मेथी की सूखी पत्तियों को ठंडे पानी में कुछ समय भिगोकर रखें, बाद में उसे हाथ से मसलकर छान लें, इस पानी में थोड़ा सा शहद मिलाकर दो-दो घंटे पर रोगी को पिलाएँ, इससे लू से तुरंत छुटकारा मिलता है।



*इमली के बीज को पीसकर उसे पानी में घोलकर कपड़े से छान लें। इस पानी में शकर मिलाकर पीने से लू का शमन होता है।
*लू से बचने के लिए दोपहर के समय बाहर नहीं निकलना चाहिए। अगर बाहर जाना ही पड़े तो सिर व गर्दन को तौलिए या अंगोछे से ढँक लेना चाहिए। अंगोछा इस तरह बाँधा जाए कि दोनों कान भी पूरी तरह ढँक जाएँ।
*गर्मी के दिनों में हल्का व शीघ्र पचने वाला भोजन करना चाहिए। बाहर जाते समय खाली पेट नहीं जाना चाहिए।गर्मी के दिनों में भूखे नहीं रहना चाहिए । जब भी घर से बाहर निकलना हो भरपेट भोजन करके निकलना चाहिए ।
*लू लगे व्यक्ति को छांव में लिटा दें। ठंडे गीले कपड़े से शरीर पोछे या फिर ठण्डे पानी से नहलाये। सामान्य तापमान का जल सिर पर डाले। ध्यान खे कि जिससे शरीर का तापमान कम हो जाये। व्यक्ति को नींबू पानी या नारियल पानी पीने को दे।
* धूप से बचने के लिए गमछा, टोपी, छाते का इस्तेमाल करें। सफर में अपने साथ पानी रखे।
*धनिए को पानी में भिगोकर रखें, फिर उसे अच्छी तरह मसलकर तथा छानकर उसमें थोड़ी सी शक्कर मिलाकर पीने से गरमियों में लू से राहत मिलती है।
*कच्चे प्याज का सेवन करने से भी लू से राहत मिलती है या खाने के साथ कच्चे प्याज का सलाद खाने से भी लू से राहत मिलती है।
*ग्रीष्मकाल में चूंकि पसीना अधिक आता है इसलिए शरीर का पानी अधिक मात्रा में खर्च होता है । अब यदि पानी की आपूर्ति न हो तो शरीर से पसीना निकलना बंद हो जाएगा । पसीना शरीर के तापमान को नियंत्रित कर लू से बचाव करता है । इसी प्रकार शीतल जल एक अमृत पेय है । घर से निकलने से पहले खूब पानी पिएं ताकि शरीर में उसकी कमी न रहे । पानी के अतिरिक्त इस मौसम में शरबत, गन्ने का रस, लस्सी आदि का भी सेवन करना चाहिए। पानी व रेशा प्रधान तरावट देने वाले फलों का सेवन करना चाहिए ।
*बाजारू ठंडी चीजे नहीं बल्कि घर की बनी ठंडी चीजो का सेवन करना चाहिये
ठंडा मतलब आम(केरी) का पना, खस,चन्दन गुलाब फालसा संतरा का सरबत ,ठंडाई सत्तू, दही की लस्सी,मट्ठा,गुलकंद का सेवन करना चाहिये
* लू लगने पर जौ के आटे और प्याज को पीसकर पेस्ट बनाएं और उसे शरीर पर लगाएं. जरूर राहत मिलेगी.
* धूप में निकलने से पहले नाखून पर प्याज घिसकर लगाने से लू नहीं लगती. यही नहीं धूप में बाहर निकलते वक्‍त अगर अाप छिला हुआ प्‍याज लेकर साथ चलेंगे तो भी आपको लू नहीं लगेगी.

गुरुवार, 11 मई 2017

नाक से खून बहने के उपाय उपचार नुस्खे



कई बार नाक से अचानक से खून आने लगता है। चिकित्‍सा जगत में इसे नकसीर फूटना कहा जाता है। बच्‍चों में यह समस्‍या अक्‍सर देखी जाती है, नाक में चोट लग जाने या बहुत गर्मी के दिनों में नाक से खून निकलना आम बात होती है, क्‍योंकि नाक के ऊतक क्षतिग्रस्‍त हो जाते हैं।
नाक से खून आने के कारण
गर्मी के कारण
रक्तकोश में खून की अधिक होने से|
नाक पर चोट लगने से|
रक्तताप बढ़ जाने के कारण |
स्कर्वी रोग मसुडो के फूलने के कारण|
नाक को जोर से खींचने के कारण
नकसीर  फूटने के कुछ समय बाद रक्त निकलना बंद हो जाता है| किसी का ज्यादा निकलता है तो किसी का कम खून निकलता है|बार बार नाक से खून आरहा है तो जल्द ही डॉक्टर को दिखाना चाहिए| यह किसी रोग के संकेत हो सकते है|



नाक से खून बहने पर उपचार -

*नाक से खून निकलने पर व्‍यक्ति के नथुनों को पकड़ लें और उसे सीधा बैठ जाने को कहें। 5 से 10 मिनट यूं ही बैठाये रखें। सिर केा हिलाने न दें। न ही लेटने दें। वरना गले में खून उतरने पर सांस की नली में अवरोध हो सकता है। बर्फ का इस्‍तेमाल एकदम से नहीं करना चाहिए। सबसे पहले नाक पर मॉश्‍चराइजर या कोई क्रीम लगाएं। खून रूक जाने पर आईसक्‍यूब से सेंक लें।
*प्याज का रस नाक में डालने से नाक में खून बहना कम होती है|
गाय के कच्चे दूध में फिटकरी घोलकर सूंघने से नकसीर ठीक होती है|

*आवले के चूर्ण को नाक पर लेप बनके लगाने से नाक से खून निकलना कम होता है|
*चाय कोफ़ी , गुड , शक्कर आदि का सेवन कम करे|
*हरे ताजे धनिया की पत्तियाँ लगभग २० ग्राम और उसमें चुटकी भर कपूर मिला कर पीस लें और रस छान लें। इस रस की दो बूँदे नाक के छिद्रों में दोनों तरफ टपकाने से तथा रस को माथे पर लगा कर हल्का-हल्का मलने से नाक से निकलने वाला खून, जिसे नकसीर भी कहा जाता है, तुरंत बंद हो जाता है।
*बड़े लोगों में यह समस्‍या, रक्‍तचाप बढ़ जाने के कारण होती है या फिर किसी प्रकार का संक्रमण होने पर होती है, जिस बीमारी के कारण ऐसी समस्‍या होती है उसे आर्टरियोस्‍केलिरोसिस कहा जाता है।
*आवले के मुरब्बे का सेवन करे|आवले का रस नाक में डालने से ब्लड निकलना बंद होता है|
*एक गिलास दूध में शक्कर मिलाकर दो केले दस दिन तक सेवन करे ,बार बार नाक से खून आने का बंद हो जाएगा|



*दूब का रस नाक से सूंघे |

*तुलसी के रस की 4-5 बुँदे नाक में डालने से आराम मिलता है|
*नाक में देसी घी डालने से खून आना कम होता है|
*एक सप्ताह हर सुबह नारियल गिरी खाए और उसका रस पिए |
*ठंडा पानी लेकर इसे सर पर डाले तो रक्तस्त्राव बंद होता है|
*रोगी को किसी ठंडे स्थान पर बिस्तर पर लिटाये और गर्दन पीछे की और रखकर तकिया लगाकर लिटा देना चाहिए |
*सर पर ठंडा पानी डाले|
* मीठे अंगूर का रस नाक में खींचे , नकसीर बंद होती है|
*बार बार नकसीर फूटने पर सूखे आंवलों को रात भर भिगो कर सवेरे उससे सिर धोया करे|
*खुराक में अधिक साइट्रस फलों का सेवन करें। साइट्रस फलों में बायोफ्लैवोनाइड्स की मात्रा काफी ज्‍यादा होती है जिसके कारण नाक से रक्‍त आने की समस्‍या दूर हो जाती है।
*कई बार आपके द्वारा खाई जाने वाली दवाएं भी नाक से रक्‍त निकलने का कारण बन जाती हैं। जैसे कि एस्प्रिन और हेपेरिन, इन दवाईयों में ऐसे तत्‍व होते हैं जो रक्‍त को पतला कर देते हैं और कई बार इसके कारण ही नाक से रक्‍त बहने लगता है। 

सोमवार, 8 मई 2017

भगंदर रोग(fistula) के देसी आयुर्वेदिक नुस्खे



     भगन्दर (Fistula-in-Ano) एक जटिल रोग है जिसमे मरीज़ को काफी पीड़ा सहन करनी पड़ती है। इस में सबसे जरूरी है, इसकी पहचान और चिलित्सा सही समय पर हो जाये। इस लेख में हम जानेगे कि भगन्दर से पीड़ित रोगी को क्या खाना चाहीहे और कौन से घरेलू उपचार वा नुस्खे भगन्दर रोगी के लिए हितकारी है।
भगन्दर गुद प्रदेश में होने वाला एक नालव्रण है जो भगन्दर पीड़िका (abscess) से उत्पन होता है। इसे इंग्लिश में फिस्टुला (Fistula-in-Ano) कहते है। यह गुद प्रदेश की त्वचा और आंत्र की पेशी के बीच एक संक्रमित सुरंग का निर्माण करता है जिस में से मवाद का स्राव होता रहता है। यह बवासीर से पीड़ित लोगों में अधिक पाया जाता है। सर्जरी या शल्य चिकित्सा या क्षार सूत्र के द्वारा इस में से मवाद को निकालना पड़ता है और कीटाणुरहित करना होता है। आमतौर पर यही चिकित्सा भगन्दर रोग के इलाज के लिए करनी होती है जिस से काफी हद तक आराम भी आ जाता है।
भगन्दर रोग के लक्षण
खूनी या दुर्गंधयुक्त स्राव निकलना
थकान महसूस होना
इन्फेक्शन (संक्रमण) के कारण बुखार होना और ठंड लगना
बार-बार गुदा के पास फोड़े का निर्माण होता
मवाद का स्राव होना
मल त्याग करते समय दर्द होना
मलद्वार से खून का स्राव होना
मलद्वार के आसपास जलन होना
मलद्वार के आसपास सूजन
मलद्वार के आसपास दर्द
भगन्दर रोग के कारण



पुरानी कव्ज।

वेक्टीरियल इन्फेक्शन के कारण।
अनोरेक्टल कैंसर से।

गुदामार्ग के पास फोड़े होना।
गुदामार्ग का अस्वच्छ रहना।
गुदा में खुजली होने या किसी और कारण से गुदा में घाव का हो जाना।
ज्यादा समय तक किसी सख्त या ठंडी जगह पर बैठना।
इसके अलावा यह रोग बूढ़े लोगो में गुदा में रक्तप्रवाह के घटने से हो सकता हैं।
जाँच और निदान 
फिस्चुला की जाँच के लिए और इसके लक्षणों का पता लगने के बाद रेक्टल एग्जामिनेशन की सलाह दी जाती हैं 
इसके अलावा डिजिटल गुदा परीक्षण,फिस्टुलोग्राम भी कराया जाता हैं।
फिस्टुला के मार्ग को देखने के लिए MRI की सलाह दी जाती हैं।
डायग्नोसिस को पक्का करने के लिए यह टेस्ट किये जाते हैंशारीरिक और रेक्टल परिक्षण ।
परोटोस्कोपी ।
अल्ट्रासाउंड ।
मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग मतलव (MRI )
टोमोग्राफी और सिटी स्कैन।
निम्नलिखित घरेलू उपचार वा नुस्खे भगन्दर रोगी के लिए हितकारी है।
मल मूत्र को न रोके
अपने मल मूत्र का सही समय पर त्याग करें। ज्यादा समय तक मल मूत्ररोक कर रखने से मल सख्त और सुखा हो जाता हे, जिससे भगन्दर रोगी को पीड़ा का अनुभव होता है। इसको ज्यादा देर तक को रोक कर न रखे।
व्यायाम और सुबह की सैर रोज़ करें



व्यायाम नियमित रूप से करना चाहिए। २० से ३० मिनट तक घूमना चाहिए या सुबह की सैर करनी चाहिए। इससे कब्ज़, उच्च रक्तचाप और मोटापा कम करने में मदद मिलती है।

हरी शाकाहारी सब्ज़ियों

ये अक्सर देखा गया है हम अपने खाने पीने में हरी सब्जियों का सेवन कम कर दिया है। हरी सब्जियां जैसे पालक, मूली, परवल, करेला, बथुआ, सरसों का साग, हरी सब्जियों का सलाद, गेहूं के आटे की रोटी चोकर के साथ का अवश्य खाना चाहिए। ये कब्ज़ की शिकायत नहीं होने देती।
गर्म पानी से सिकाई
नहाने के समय गरम पानी से मल की जगह की सिकाई १५ मिनट तक अवश्य करें। इससे रोगी को काफी राहत मिलती है। दिन में कम से कम २ से ३ बार अवश्य करें। अपने मल मूत्र और उसके आस पास की जगह को हमेशा साफ रखे।
बर्फ़ से सिकाई
बर्फ़ की सिकाई करने से रोगी को पीड़ा में राहत मिलती है। इसे दिन में कई बार किया जा सकता है। इससे मल त्याग करने में दर्द का कम अनुभव होता है। सूजन को कम करता है।
फलों का ख़ूब उपयोग करे
रोगी को फलों का सेवन ज़रूर करना चाहिये, इसमें कई तरह के पौष्टिक तत्व पाए जाते है, जो इस रोग में बहुत मदद कर सकते हैं। फल जैसे पपीता, केला, सेब, नाशपाती, तरबूज़, अमरुद और मौसमी फल बहुत आवश्यक हैं। इनका नियमित रूप से सेवन करना चाहिए।
ज़्यादा पानी पियें
इस रोग में रोगी को नियमित रूप से पानी का सेवन करना चाहिए। पानी की कमी से शरीर के अंदर से गंदगी नहीं निकल पाती। पानी में जैसे जूस, नारियल पानी, छाछ, निम्बू पानी, लस्सी आवश्यक रूप से लेना चाहिए।



भगन्दर में इन बातों का ध्यान रखें
सूती कपड़े का इस्तेमाल ज्यादा करें।
बैठने के लिए तकिये का इस्तेमाल करें , सख्त सतह पर न बेठे।
अपने रहन सहन की आदतों में परिवर्तन करें। समय पर उठना और समय पर अवश्य खाना खायें।
मल की जगह को साफ रखे।
तेल में तली भुनी चीजों का इस्तेमाल कम करें।
शराब से बचें।
पानी के कम से कम ८ – ९ गिलास अवश्य पियें।
काफ़ी और चाय का कम सेवन करें ।
एक जगह पर ज्यादा देर तक न बैठे।
दर्द निरोधक दवाओं का सेवन कम करें, इससे कब्ज़ की सम्भावना बढ़ती है।

शनिवार, 6 मई 2017

भीगे चने के फायदे बादाम से भी ज्यादा


भीगे बादाम के फायदे हर कोई जानता है लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि भीगे चने भीगे बादाम से भी ज्‍यादा फायदेमंद होते है।
बादाम से ज्‍यादा फायदेमंद है भीगे चने
भीगे बादाम हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं, यह बात तो हम सभी जानते हैं। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि भीगे चने भीगे बादाम से भी ज्‍यादा फायदेमंद होते है। शायद आपको यह सुनकर आश्‍चर्य हो रहा होगा, लेकिन यह सच है। भीगे चने में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नमी, फैट, फाइबर, कैल्शियम, आयरन व विटामिन्स पाए जाते हैं। जिससे यह सस्‍ती चीज बड़ी से बड़ी बीमारियों से लड़ने में मदद करता है। साथ ही इससे खून साफ होता है जिससे सुंदरता बढ़ती है और यह दिमाग भी तेज करता है। अगर आप मोटापा कम करने की कोशिश कर रहे है तो नाश्‍ते में रोजाना भीगे चने का सेवन करें।
इम्‍यूनिटी में मजबूती
शरीर को सबसे ज्‍यादा पोषण भीगे काले चने से मिलते हैं। चनों में बहुत सारे विटामिन्स और क्लोरोफिल के साथ फास्फोरस आदि मिनरल्स होते हैं जिन्हें खाने से शरीर को कोई बीमारी नहीं लगती है। रोजाना सुबह के समय भीगे चने खाने से आपको बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है। इसके लिए काले चनों को रातभर भिगोकर रख लें और हर दिन सुबह दो मुट्ठी खाएं। कुछ दिनों में आपको फर्क महसूस होने लगेगा।



डायबिटीज से बचाव

अगर आप डायबिटीज से परेशान है तो अपने आहार में भीगे चनों को शामिल करें। 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर सुबह खाली पेट सेवन करने से डायबिटीज दूर हो जाती है।
पेट की समस्‍याओं से राहत
चनों को रातभर पानी में भिगो दें। फिर सुबह चनों से पानी को अलग कर उसमें अदरक, जीरा और नमक को मिक्स करके खाये। चनों को इस तरह से खाने से कब्ज और पेट दर्द से राहत मिलती है।
एनर्जी से भरपूर
अगर आप पूरा दिन एनर्जी से भरपूर रहना चाहते हैं तो शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए भीगे चनों में नींबू, अदरक के टुकड़े, हल्का नमक और काली मिर्च डालकर सुबह नाश्ते में खाएं।
पुरुषों के लिए फायदेमंद
सुबह खाली पेट काले चने खाना पुरुषों के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है। चीनी के बर्तन में रात को चने भिगोकर रख दे। सुबह उठकर चनों को अच्‍छे से चबा-चबाकर खाएं। इसके लगातार सेवन करने से वीर्य में बढ़ोतरी होती है और वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है। यानी पुरुषों की कमजोरी से जुड़ी समस्याएं खत्म हो जाती हैं।

बुधवार, 3 मई 2017

जोड़ों और हड्डियों में दर्द के कारण, लक्षण और उपचार



मौसम के बदलाव, उम्र के बढ़ने, अनियंत्रित जीवनशैली व कई अन्य कारणों से लोगों को अक्सर शरीर में सूजन, जोड़ों का दर्द आदि की शिकायत होती रहती है। सूजन और जोड़ों का दर्द एक तरह का इन्फ्लेमेशन कहलाता है जो बहुत लंबे समय तक शरीर में बना रहे तो बेहद घातक भी हो सकता है। दरअसल शरीर में लंबे दौर तक चलने वाले इन्फ्लेमेशन से कैंसर होने के दावे तक आधुनिक विज्ञान ने किए हैं।
जोड़ों का दर्द शरीर के किसी भी हिसे में हो सकता है .काफी समय बैठे रहने से, सफर करने से या उम्र बढ़ने से हमारे घुटने अकड़ जाते है या दर्द करने लग जाते है. जिसे हम जोड़ो का दर्द या Joint Pain कहते है. जोड़ों का दर्द दो प्रकार का हो सकता है Osteo और Rheumatoid . कभी कभी घुटनों के दर्द की वजह से पूरा पैर दर्द करने लग जाता है. जोड़ों का दर्द हमे पैरों के घुटनों, गुहनियों, गदर्न, बाजुओं और कूल्‍हों में हो सकता है.
जोड़ों की कड़ी लचीली हड्डी में कुछ अज्ञात कारणों से ऊतकों के निष्क्रिय होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, जिसके कारण जोड़ों की साइनोवियल झिल्ली में सूजन आ जाती है। यह लगातार बढ़ती जाती है, जिस कारण जोड़ों की सामान्य संरचना छिन्न-भिन्न हो जाती है और एक्स-रे कराए जाने पर जोड़ों की संरचना में विषमता पाई जाती है।
यदि जोड़ों के भीतर पाये जाने वाले ‘साइनोवियल द्रव्य’ की सूक्ष्मदर्शी द्वारा जांच करवाई जाए, तो उसमें ‘मोनोसोडियम यूरेट’ नामक रसायन के कण पाए जाते हैं, जो जोड़ों पर जमा होने लगते हैं और सामान्य क्रियाओं में बाधक बनते हैं। इस अवस्था को गठिया कहते हैं। इसकी शुरुआत प्राय: हाथों एवं पैरों की उंगलियों के जोड़ों से होती है। दुनिया के लगभग सभी देशों में यह बीमारी पाई जाती है। लगभग 2.5% आबादी इस रोग से पीड़ित है। वैसे तो यह बचपन से नब्बे साल तक कभी भी प्रारम्भ हो सकता है, किन्तु40 से 60 वर्ष की उम्र में अधिक होता है। यह स्त्रियों में अधिक होता है
जोड़ों का दर्द के लक्षण
1. जोड़ों में दर्द एवं अकड़ाव रहता है।
2. जोड़ों में सूजन आ जाती है।
3. जोड़ों को चलाना-फिराना मुश्किल हो जाता है।
4. हाथों की पकड़ने की ताकत (ग्रिप) क्षीण हो जाती है।
5. जोड़ों के साथ ही मांसपेशियों में कमजोरी आने लगती है।
6. लेटने के बाद उठने पर जोड़ों में जकड़न महसूस होती है।
7. सुबह उठने पर लगभग आधे घटे तक जकड़न बनी रहती है।
8. इसकी शुरुआत कभी-कभी अचानक होती है। यह प्राय: धीरे-धीरे प्रारम्भ होता है।
जोड़ों के दर्द के कारण :–
* हड्डियों में मिनरल यानि की खनिज की कमी होना
* अर्थराइटिस
* बर्साइटिस
* कार्टिलेज का घिस जाना
* खून का कैंसर होना (Blood Cancer )
* उम्र बढ़ने के कारण
* हडियों में मिनरल की कमी



गठिया के लक्षण

1. यह आनुवंशिक रोग है (10% रोगियों में)।
2. 30-40 वर्ष की उम्र के बाद में यह रोग शुरू होता है।
3. इसकी शुरुआत अव्यवस्थित होती है और चोट लगने, बुखार, व्रत रखने, ऑपरेशन के बाद अथवा खान-पान की गड़बड़ियों के कारण कभी भी यह रोग प्रारम्भ हो सकता है और बहुत तेजी से विकसित होता है।
4. कलाई, कुहनी, घुटना एवं एंकिल (पैर को टांग से जोड़ने वाला जोड़) एवं हाथ-पैरों की उंगलियों के जोड़ों में इसकी शुरुआत होती है।
5. स्नायु एवं मांसपेशियां (संबंधित जोड़ों की) भी प्रभावित होने लगती हैं।
6. शुरुआत किसी एक जोड़ से (प्राय: पैर के अंगूठे अथवा एंकिल जोड़ से) होती है और शीघ्र ही अन्य जोड़ों में भी बीमारी के लक्षण परिलक्षित होने लगते हैं।
7. 101 से 103 डिग्री फारेनहाइट तक बुखार रहता है।
8. प्रभावित जोड़ में सूजन आ जाती है और दर्द रहने लगता है।
9. छूने मात्र से ही तीव्र-दर्द रहने लगता है। कभी-कभी तो मरीज प्रभावित जोड़ बिस्तर के कपड़ों तक से छू जाने पर दर्द महसूस करता है।
10. घुटने आदि जोड़ों में द्रव्य इकट्ठा होने लगता है।
11. पुरानी गठियाजनित जोड़ों में अकड़ाव, दर्द, सूजन, जोड़ों को घुमाना-फिराना मुश्किल हो जाता है।
12. साइनोवियल झिल्ली मोटी हो जाती है।
गठिया का रोकथाम एवं बचाव
(गठिया एवं जोड़ों की सूजन, दोनों ही स्थितियों में) –
1. रोग की अवस्था में (तीव्रता में) बिस्तर पर आराम आवश्यक है।
2. गठिया रोग होने पर प्यूरीनयुक्त भोजन,जैसे ग्रंथियुक्त विशेष प्रकार का मांस नहीं खाना चाहिए।
3. वजन कम नहीं होने देना चाहिए।
4. पानी अधिक से अधिक पीना चाहिए, ताकि गुर्दो में पथरी न बने।
5. अलग से सूक्ष्म मात्रा में सोडियम बाईकार्बोनेट लेना, गुर्दो में पथरी की सम्भावना को रोकता है, किन्तु अधिक मात्रा में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि अधिकता होने पर (सोडियम की) उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी विकार आदि उत्पन्न हो सकते हैं।
6. शारीरिक चोटों से जोड़ों को बचाना चाहिए, अन्यथा सूजन और बढ़ जाएगी।
7. जोड़ों के व्यायाम (फिजियो थेरेपी) मांसपेशियों, स्नायुओं एवं जोड़ों की ताकत बढ़ाने एवं इनके सही संचालन में अत्यंत मददगार होते हैं।




गठिया का रोकथाम एवं बचाव
(गठिया एवं जोड़ों की सूजन, दोनों ही स्थितियों में) –
1. रोग की अवस्था में (तीव्रता में) बिस्तर पर आराम आवश्यक है।
2. गठिया रोग होने पर प्यूरीनयुक्त भोजन,जैसे ग्रंथियुक्त विशेष प्रकार का मांस नहीं खाना चाहिए।
3. वजन कम नहीं होने देना चाहिए।
4. पानी अधिक से अधिक पीना चाहिए, ताकि गुर्दो में पथरी न बने।
5. अलग से सूक्ष्म मात्रा में सोडियम बाईकार्बोनेट लेना, गुर्दो में पथरी की सम्भावना को रोकता है, किन्तु अधिक मात्रा में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि अधिकता होने पर (सोडियम की) उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी विकार आदि उत्पन्न हो सकते हैं।
6. शारीरिक चोटों से जोड़ों को बचाना चाहिए, अन्यथा सूजन और बढ़ जाएगी।
7. जोड़ों के व्यायाम (फिजियो थेरेपी) मांसपेशियों, स्नायुओं एवं जोड़ों की ताकत बढ़ाने एवं इनके सही संचालन में अत्यंत मददगार होते हैं।
जोड़ों के दर्द के आयुर्वेदिक व औषधीय उपचार इस प्रकार है।
*कड़वे तेल में अजवायन और लहसुन जलाकर उस तेल की मालिश करने से बदन के जोड़ों के दर्द में आराम होता है।
*काले तिल और पुराने गुड़ को बराबर मात्रा में मिलाकर खाएं। ऊपर से बकरी का दूध पीएं 
बड़ी इलायची तेजपात, दालचीनी, शतावर, गंगेरन, पुनर्नवा, असगंध, पीपर, रास्ना, सोंठ, *गोखरू इन सबको गिलोय के रस में घोटकर गोली बनाकर, बकरी के दूध के साथ दो-दो गोली सुबह सबेरे खाने से गठिया रोग में आराम मिलता है।
*मजीठ हरड़, बहेड़ा, आंवला, कुटकी, बच, नीम की छाल, दारू हल्दी, गिलोय, का काढ़ा पीएं।
*लहसुन को दूध में उबालकर, खीर बनाकर खाने से गठिया रोग में आराम होता है।
शहद में अदरक का रस मिला कर पीने से जोड़ों के दर्द में आराम होता है।
*सौठ, अखरोट और काले तिल एक, दो, चार के अनुपात में पीस कर सुबह-शाम गरम पानी से दस से पंद्रह ग्राम की मात्रा में सेवन करने से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है।
जोड़ों के दर्द के रोगी को भोजन से पहले आलू का रस दो-तीन चम्मच पीने से लाभ होता है। इससे यूरिक एसिड की मात्रा कम होने लगती है।
*जोड़ों के दर्द के रोगी को चुकंदर और सेव का सेवन करते रहना चाहिए। इससे यूरिक अम्ल की मात्रा नियंत्रण में रहती है।
*सौंठ और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर रोगी को सुबह-शाम चाय की तरह सेवन करना चाहिए।
*अश्वगंधा चूर्ण तीन ग्राम एक गिलास दूध में उबालकर पियें। कुछ दिनों तक लगातार यह प्रयोग करने से लाभ होता है।
*लहसुन की 10 कलियों को 100 ग्राम पानी एवं 100 ग्राम दूध में मिलाकर पकायें। पानी जल जाने पर लहसुन खाकर दूध पीने से दर्द में लाभ होता है।
*250 मि.ली. दूध एवं उतने ही पानी में दो लहसुन की कलियाँ, 1-1 चम्मच सोंठ और हरड़ तथा 1-1 दालचीनी और छोटी इलायची डालकर पकायें। पानी जल जाने पर वही दूध पीयें।
*नागकेसर के तेल से मालिश करने से आराम होता है।
*प्याज को सरसों के तेल में पका लें। इस तेल से मालिश करने से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है।
*मेंहदी के पत्तो को पीसकर जोड़ों पर बांधने से आराम होता है।
*इस रोग का उपचार करने में तुलसी बड़ी कारगर भूमिका निभाती है क्योंकि तुलसी में वात विकार को मिटाने का प्राकृतिक गुण होता है। तुलसी का तेल बनाकर दर्द वाली जगह लगाने से तुरंत आराम मिलता है।
*ज्यादा तकलीफ होने पर नमक मिले गरम पानी का टकोर व हल्के गुनगुने सरसों के तेल की मालिश करें।
*मोटापे पर नियंत्रण रखें। नियमित सूक्ष्म व्यायाम व योगाभ्यास करें।
*भोजन में खट्टे फलों का प्रयोग न करें।
*बथुआ के ताजा पत्तों का रस पन्द्रह ग्राम प्रतिदिन पीने से गठिया दूर होता है। इस रस में नमक-चीनी आदि कुछ न मिलाएँ। नित्य प्रात: खाली पेट लें या फिर शाम चार बजे। इसके लेने के आगे पीछे दो – दो घंटे कुछ न लें। दो तीन माह तक लें।
*जोड़ों के दर्द के समय या बाद में गर्म पानी के टब में कसरत करें या गर्म पानी के शॉवर के नीचे बैठें। आपको निश्चित ही राहत मिलेगी।
*दर्द घटाने के बाम, क्रीम आदि बार-बार इस्तेमाल न करें। इनके द्वारा पैदा हुई गर्मी से राहत तो मिलती है, पर धीरे-धीरे ये नुकसान पहुंचाते हैं।
*जोड़ों के दर्द के लिए चमत्कारिक दवा, तेल या मालिश वगैरह के दावे बहुत किए जाते हैं। इनको इस्तेमाल करने से पहले एक बार परख लें।
*एरंडी के तेल को गर्म करो और उसमे लहसुन की कलियाँ जला दो । ये तेल लगाने से जोड़ों का दर्द दूर होता है
*2 ग्राम दालचीनी पावडर और एक चम्मच शहद, एक कप गुनगुने पानी में मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से तुरंत असर होता है|
विशिष्ट परामर्श-  
संधिवात,,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है|कोई साईड ईफेक्ट नहीँ |बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त सक्रियता हासिल करते हैं|औषधि के लिए वैध्य दामोदर् से 98267-95656पर संपर्क कर सकते हैं|


पैरों व टखनों की सूजन व दर्द कम करने के आसान घरेलू उपाय/ Easy home remedies for swelling of feet and ankles and pain reduction



  चलते हुए अक्‍सर आपका पैर अक्‍सर मुड़ जाता है। जरा सी चूक से कई बार पैरों में मोच आ जाती है। टखने में मोच सामान्‍य है और यह किसी को भी हो सकती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ खिलाडि़यो को ही पैर में मोच आती है। आम आदमी को भी ऐसी समस्‍या आ सकती है। अचानक पैर मुड़ने से टखने में मोच अथवा चोट लग सकती है। जब पैर मुड़ने से टखने के जोड़ को सहारा देने वाला उत्तक क्षतिग्रस्‍त हो जाता है, तो मोच की समस्‍या आती है। हालांकि इसे एक सामान्‍य समस्‍या समझा जाता है, लेकिन सही देखभाल के अभाव में यह समस्‍या काफी बड़ी भी हो सकती है।
पैर व टखनों में सूजन की समस्या
पैरों में मोच आना यूं तो एक सामान्‍य समस्‍या है, जिसके कारण आप कई बार हिल भी नहीं पाते। ऐसे हालात में किसी व्‍यक्ति के लिए चलना फिरना भी मुहाल हो जाता है। पैर व टखनों की सूजन एक दर्दभरी समस्या है। ये समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है। इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है। इसमें पैर, खासतौर पर टखनों और एड़ियों के आसपास सूजन, लालिमा और जलन हो जाती है। ये सूजन की समस्या किसी भी मौसम में हो सकती है लेकिन सर्दियों में ये समस्या और अधिक बढ़ जाती है। इसके अलावा, कई और कारणों से ये सूजन की समस्या होती हैं। लेकिन, ऐसे में आप कुछ घरेलू उपाय आजमा सकते हैं। जो कारगर तो हैं ही साथ ही सुरक्षित भी हैं



पैर या टखने की चोट

पैर या टखने की चोट के कारण भी उस स्थान पर सूजन की समस्या हो सकती है। सबसे आम है टखने की मोच। ये तब होती है जब टखना गलत तरह से मुड़ जाता है। मोच या पैर की अन्य चोटों के कारण आई सूजन की समस्या से निपटने के लिए आराम सबसे अधिक जरूरी है। बर्फ की सिकाई और टखने को कंप्रैशन बेंडेज से बांधने से इस समस्या में राहत मिल सकती है। अगर ऐसा करने से भी आराम न हो, और सूजन बढ़ जाए तो चिकित्सक के पास जरूर जाएं।
इन्फेक्शन
पैर व टखनों में सूजन इन्फेक्शन का एक लक्षण भी हो सकता है। जिन लोगों को डायबिटीज या पैर की अन्य नर्व संबंधी समस्या होती है, उन्हें पैर के इन्फेक्शन का जोखिम अधिक होता है। अगर आपको डायबिटीज है, तो आपको अपने पैरों में होने वाले फफोलों और दर्द पर ध्यान देने की जरूरत है।
दिल, लीवर या किडनी में खराबी
कई बार टखने व पैर की सूजन दिल, लीवर या किडनी की किसी बीमारी के लक्षण के रूप में प्रकट होता है। सूजा हुआ टखना दिल के दौरे का संकेत हो सकता है। अगर किडनी सही से काम न कर रही हों, तो भी पैर सूज सकते हैं। लीवर की बीमारी में अल्बमिन कहलाने वाले उस प्रोटीन के उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है जो खून को दूसरे टीशू में फैलने से रोकता है। इस प्रोटीन के कम निर्माण से फ्लूड लीकेज बढ़ जाती है जो गुरुत्वाकर्षण के नियम के कारण पैरों में अधिक पहुंचता है, और उससे सूजन हो जाती है। किसी गंभीर समस्या से बचने के लिए पैर की सूजन के साथ चेस्ट पेन होने पर डॉक्टर से संपर्क करें।
खून का थक्का
पैरों की नसों में होने वाले खून के थक्के पैरों तक आने वाले खून के बहाव को उल्टा दिल तक वापस भेज देते हैं। इस वजह से भी टखने व पैर सूज जाते हैं। ये खून के थक्के यानी ब्लड क्लॉट या तो सुपरफीशियल होते हैं जो त्वचा के नीचे ही नसों में होते हैं, या फिर गहरे हो सकते हैं। गहरे खून के थक्के पैरों की कुछ और मुख्य नसों को ब्लॉक कर सकते हैं। ये खून के थक्के जानलेवा भी हो सकते हैं अगर ये दिल या फेफड़ों तक पहुंच जाएं। अगर आपके एक पैर में सूजन है और साथ में दर्द भी, बुखार और पैर का रंग भी बदल रहा है तो फौरन चिकित्सक के पास जाएं।
सर्दी से सूजन
सर्दियों में पैरों, खासतौर पर पैर की उंगलियों पर लाल निशान बनने या खुजली के साथ सूजन आने की समस्या काफी आम है। चिलब्लेंस नामक यह बीमारी सर्दियों में नंगे पैर घूमने या तापमान में अचानक बदलाव से होती है। हालांकि सर्दियों में यह सामान्य बीमारी है, लेकिन ध्यान नहीं देने पर कष्टदायक हो सकती है। यह एक कनेक्टिव टिश्यूज डिजीज है। साधारण उपाय करके इससे बचा जा सकता है। सर्दी से बचाव रखें, दस्ताने व मोजे पहने। धूप में ही बाहर निकलें, सिंकाई करें।



दवाओं के साइड इफेक्ट्स

कई दवाओं के साइड इफेक्ट की वजह से भी पैर व टखनों में सूजन हो जाती है। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर, जो कि एक प्रकार की ब्लड प्रैशर की दवा है, उसका साइड इफेक्ट पैरों की सूजन ही होता है। इसके अलावा, एंटीडिप्रेसेंट्स खाने वाले लोगों को कई बार सूजन की इस समस्या का सामना करना पड़ता है। डायबिटीज की दवाएं भी पैर व टखने की सूजन का कारण हो सकती हैं। अगर आपको शक होता है कि आपकी सूजन का कारण आपके द्वारा खाए जाने वाली दवा ही है तो इस बारे में अपने डॉक्टर से बात करें।
गर्भावस्था की समस्या
गर्भावस्था में टखने और पैर की सूजन आम समस्या है। हालांकि अचानक सूजन आया, या अत्यधिक सूजन आना किसी गंभीर समस्या की वजह से हो सकती है। ब्लड प्रेशर के बढ़ जाने, या गर्भावस्था के 20 हफ्तों के बाद यूरीन में प्रोटीन बढ़ जाने से ये समस्या हो सकती है। अगर टखने और पैर की सूजन के साथ साथ, पेट में दर्द, सिरदर्द, बार-बार मूत्र त्यागने, उल्टी व मतली की समस्या भी हो तो तुंरत चिकित्सक की सलाह लें।
मोच के लिए घरेलू नुस्‍खे :
छोटी मोच को पूरी तरह ठीक होने में महीना भर या उससे कुछ ज्‍यादा वक्‍त लग जाता है। जल्‍द और बेहतर आराम पाने के लिए आप कुछ घरेलू उपाय भी आजमा सकते हैं-
आपकी जिस टखने में मोच आयी है, उसे पूरा आराम दें। आपको चाहिए कि आप उस पैर पर अधिक वजन न डालें। लेटते समय अपने पैर को तकियों के ऊपर रखें। काम करते समय ऐसी शारीरिक गतिविधियां न करें, जिनसे आपकी टखने पर अधिक जोर पड़ने की संभावना हो।
इसके बाद आप अपनी टखने के जोड़ पर आइस पैक लगायें। इससे सूजन और दर्द कम करने में मदद मिलेगी। इस आइस पैक को करीब 10 मिनट तक यूं ही छोड़ दें। इसके बाद आप उसे चोटिल हिस्‍से पर बांध सकते हैं। याद रखें ज्‍यादा टाइट न बांधें।
आप अपनी टखने पर गर्म पट्टी भी बांध सकते हैं। यह काफी मददगार होती है। इससे आपकी टखने स्थिर रहती है। इससे टखने को और नुकसान नहीं होता। इससे सूजन भी कम होती है और आपको आराम होता है।
हर्ब और मसाले, जैसे अदरक, हल्‍दी, काली मिर्च, तुलसी के पत्ते, अजमोद, मेंहदी, इलायची और लौंग आदि सूजन कम करने में काफी उपयोगी होते हैं। आप इन्‍हें मोच और सूजन पर लगा सकते हैं। इससे काफी आराम मिलेगा।
रोटी को एक ओर से पकाइये, अब उस पर सरसों का तेल और हल्‍दी लगाइये। इससे मोच की सिंकाई करें। इससे आपको काफी फायदा होगा।
गर्म दूध में थोड़ी सी हल्‍दी डालकर पीने से अंदरूनी चोट और सूजन में फायदा होता है।

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

सिर्फ आपरेशन से नहीं, हर्बल औषधि से प्रोस्टेट वृद्धि का कारगर इलाज


  50 वर्ष पार कर चुके पुरुषों में प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ना एक आम समस्या है. जिसके कारण बार-बार बाथरूम जाना पड़ता है और कई बार तो पेशाब रुक जाने की तकलीफ देह परिस्थिति से भी मरीज को गुजरना पड़ता है.
यह रोग पुरुषों में ही होता है क्योंकि पुरुष ग्रंथि स्त्रियों में नहीं होती है केवल पुरुषों में होती है। पुरुष में यह ग्रंथि मूत्राशय की ग्रीवा तथा मूत्रमार्ग के ऊपरी भाग को चारों तरफ से घेरकर रखती है। इस ग्रंथि के द्वारा सफेद, लिसलिसा तथा गाढ़ा स्राव निकलता है। जब पुरुष उत्तेजित होता है तो उस समय शुक्राणु प्रोस्टेट में पहुंच जाते हैं। यह लिसलिसा पदार्थ इन शुक्राणुओं को जीवित रखने और बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह ग्रंथि अधिक बढ़ जाती है तो मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है
लगभग तीस फीसदी पुरुष 40 की उम्र में और पचास फीसदी से भी ज्यादा पुरुष 60 की उम्र में प्रोस्टेट की समस्या से परेशान होते हैं। प्रोस्टेट ग्लैंड को पुरुषों का दूसरा दिल भी माना जाता है। पौरूष ग्रंथि शरीर में कुछ बेहद ही जरूरी क्रिया करती हैं। जैसे यूरीन के बहाव को कंट्रोल करना और प्रजनन के लिए सीमेन बनाना। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती हैं, यह ग्रंथि बढ़ने लगती हैं। इस ग्रंथि का अपने आप में बढ़ना ही हानिकारक होता हैं और इसे बीपीएच (बीनीग्न प्रोस्टेट हाइपरप्लेसिया) कहते हैं।
प्रोस्टेट ग्लैंड ज्यादा बढ़ जाने पर कई लक्षण सामने आने लगते हैं जैसे यूरीन रूक-रूक कर आना, पेशाब करते समय दर्द या जलन और यूरीन ट्रेक्ट इन्फेक्शन बार-बार होना। प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मरीज बार-बार पेशाब करने जाता हैं मगर वह यूरीन पास नहीं कर पाता। अगर बार-बार यह परेशानी होती है तो पौरूष ग्रंथि बढ़ने की संभावना हो सकती है। ऐसी अवस्था मरीज के लिए कष्टदायक होती है। उसे समझ नहीं आता कि क्या किया जाना चाहिए।



पुरुष ग्रंथि का अधिक बढ़ने का लक्षण:-

जब पुरुषों की पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है तो उस रोगी के पेशाब की धार पतली हो जाती है तथा पेशाब कम और रुक-रुक कर आता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में कई बार पेशाब करने के लिए उठना पड़ता है।
रोगी को एक बार में पेशाब पूरा नहीं आता इसलिए उसे पेशाब बार-बार करने जाना पड़ता है। रोगी व्यक्ति का पेशाब बूंद-बूंद करके आने लगता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी पेशाब तथा शौच को रोकने में असमर्थ होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को सिर में दर्द, घबराहट, थकान, चिड़चिड़ापन, लिंग का ढीला हो जाना तथा अधिक कमजोरी महसूस होना आदि परेशानियां होने लगती हैं।
*पेशाब करने में कठिनाई मेहसूस होना।
* थोड़ी थोड़ी देर में पेशाब की हाजत होना। रात को कई बार पेशाब के लिये उठना।
*पेशाब की धार चालू होने में विलंब होना।
*मूत्राषय पूरी तरह खाली नहीं होता है। मूत्र की कुछ मात्रा मूत्राषय में शेष रह जाती है। इस शेष रहे मूत्र में रोगाणु पनपते हैं।
*मालूम तो ये होता है कि पेशाब की जोरदार हाजत हो रही है लेकिन बाथरूम में जाने पर बूंद-बूंद या रुक-रुक कर पेशाब होता है।
*पेशाब में जलन मालूम पडती है।
* पेशाब कर चुकने के बाद भी मूत्र की बूंदे टपकती रहती हैं, याने मूत्र पर नियंत्रण नहीं रहता।
*अंडकोषों में दर्द उठता रहता है।
*संभोग में दर्द के साथ वीर्य छूटता है।
ऐसी अवस्था मरीज के लिए कष्टदायक होती है। उसे समझ नहीं आता कि क्या किया जाना चाहिए।
सीताफल के बीज
सीताफल के बीज में काफी मात्रा में पोषक तत्व मौजूद होते हैं। जैसे आयरन, फॉस्फोरस, टि्रप्टोफैन, कॉपर, मैग्नेशियम, मैग्नीज, विटामिन के, प्रोटीन, जरूरी फैटी एसिड और फाइटोस्टेरोल। ये बीज जिंक के बेहतरीन स्रोतों में से एक माने जाते हैं। हर दिन 60 मिलीग्राम जिंक का सेवन प्रोस्टेट से जूझ रहे मरीजों में बेहद फायदा पहुंचाता है और उनके स्वास्थ्य में भी सुधार करता है। इन बीजों में बीटा-स्टिोसटेरोल भी होता है जो टेस्टोस्टेरोन को डिहाइड्रोटेस्टेरोन में बदलने नहीं देता। जिससे इस ग्रंथि के बढ़ने की संभावना न के बराबर हो जाती है। कच्चा या भून कर या फिर दूसरे बीजों के साथ मिलाकर खा सकते हैं। इसे अपने हर दिन के खाने में शामिल किया जा सकता है। इसे सलाद में मिलाकर भी खाया जा सकता है। पोहा में मिलाकर या सूप में डालकर भी खा सकते है। सीताफल के बीज नट्स के साथ एक बेहतरीन नाश्ता हो सकते हैं। दस ग्राम तक यह बीज हर दिन लेने से प्रोस्टेट को काबू किया जा सकता है।
अलसी
20 ग्राम अलसी को पीस कर पानी से लेवे । लेकिन ये ध्यान रखे के अलसी को एक साथ पीस कर ना रखे क्युकी ऐसा करने से अलसी अपने गुण खो देती हैं। ३ या ४ दिन ज़्यादा से ज़्यादा, बेहतर होगा आप इसको ताज़ा ही पीसे। और ये गर्मियों में थोड़ी गर्म होती हैं इसलिए इसके सेवन से कुछ समस्या आ सकती हैं इसलिए पानी का सेवन पुरे दिन में ज़्यादा करे।
हरड़
एक फूल हरड़ (हरड़ की किस्म) को रात को पानी में भिगो दे और १२ घंटे बाद इसके बीज निकाल दे और इसको चबा चबा कर खा ले और यही पानी घूँट घूँट कर पी ले।
गोखरू
ये मूत्र सम्बंधित रोगो में बहुत लाभकारी हैं, इसको आप ५ ग्राम की मात्रा में अर्थात एक छोटा चम्मच गुनगुने पानी के साथ ले।
जब भी ये चीजे खाए तो इसके एक घंटे पहले और बाद में कुछ भी खाए पिए ना।
और कृपया जिन भाइयो को ये प्रॉब्लम हैं वह ये प्रयोग ज़रूर करे और हमको अपने रिजल्ट ज़रूर बताये। इस प्रयोग के रिजल्ट आपको १ से ४ महीने के भीतर मिलेंगे इसलिए धैर्य से करते रहे।
और ये प्रयोग करने वाले भाई सुबह खाली पेट लौकी का जूस ५-५ पत्ते तुलसी और पोदीना के डाल कर ज़रूर पिए। इस से आपको रिजल्ट बहुत जल्दी मिलेंगे।



पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए और इसके बाद इसका उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करना चाहिए।
पुरुष ग्रंथि के बढ़ने के रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को 2 दिन उपवास रखने के बाद लगभग 10 दिनों तक फलों तथा सब्जियों का हल्का भोजन लेना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को अधिक मात्रा में पानी तथा नींबू का पानी पीना चाहिए। धनिये के पानी तथा कच्चे नारियल के पानी को भी पीना लाभदायक है।
बन्दगोभी, तरबूज, खीरा, सफेद पेठा, गाजर, अनन्नास आदि का रस पीना भी बहुत लाभदायक होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को दूषित भोजन, उत्तेजक खाद्य पदार्थ, मिठाई, घी, तली हुई चीजें बिल्कुल भी सेवन नहीं करनी चाहिए।
यदि रोगी व्यक्ति को कब्ज बन रही हो तो सबसे पहले कब्ज को दूर करना चाहिए तथा इसके बाद इस रोग का उपचार करना चाहिए।
पालक और कुलथी को बराबर मात्रा में लेकर पानी में डालकर अच्छी तरह से उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को सुबह-शाम सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*अंजीर को प्रतिदिन पानी में भिगोकर रख दें। इनको सुबह तथा शाम को खाकर इस पानी पी लें। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*चर्बीयुक्त ,वसायुक्त पदार्थों का सेवन बंद कर दें। मांस खाने से भी परहेज करें।
*हर साल प्रोस्टेट की जांच कराते रहें ताकि प्रोस्टेट केंसर को प्रारंभिक हालत में ही पकडा जा सके।
*चाय और काफ़ी में केफ़िन तत्व पाया जात है। केफ़िन मूत्राषय की ग्रीवा को कठोर करता है और प्रोस्टेट रोगी की तकलीफ़ बढा देता है। इसलिये केफ़िन तत्व वाली चीजें इस्तेमाल न करें।
*सोयाबीन में फ़ायटोएस्टोजीन्स होते हैं जो शरीर मे टेस्टोस्टरोन का लेविल कम करते हैं। रोज ३० ग्राम सोयाबीन के बीज गलाकर खाना लाभदायक उपचार है।
*विटामिन सी का प्रयोग रक्त नलियों के अच्छे स्वास्थ्य के लिये जरूरी है। ५०० एम जी की 2 गोली प्रतिदिन लेना हितकर माना गया है।
*दों टमाटर प्रतिदिन या हफ्ते मे 3-4 बार खाने से प्रोस्टेट केन्सर का खतरा 50% तक कम हो जाता है| इसमे पाये जाने वाले लायकोपिन, अलसी और एंटीआक्सीडेंट्स केन्सर की रोक थाम कर सकते हैं|
*नियमित अंतराल पर सेक्स करने से प्रोस्टेट ग्रन्थि का स्वास्थ्य ठीक रहता है। अत:अधिक संयम गैर जरूरी माना गया है। सेक्स की अति और अधिक संयम दोनो ठीक नहीं ।शारीरिक क्षमता के मुताबिक महीने में 4 से 6 बार सेक्स करने की सलाह दी जाती है।
*जिन्क एवं विटामिन डी३ प्रोस्टेट बढने की बीमारी में उत्तम परिणाम प्रस्तुत करते हैं। ३० एम जी जिन्क प्रतिदिन लेने से अच्छे परिणाम आते हैं। विटामिन डी३ याने केल्सीफ़ेर्रोल ६०० एम जी प्रतिदिन लेना चाहिये।
*आधुनिक चिकित्सक इस रोग में बहुधा टेम्सुलोसीन और फ़ेनास्टरीड दवा का प्रयोग करते हैं। 




पथ्य और परहेज :–

* उचित समय पर पचने वाला हल्का भोजन करें| सब्जियों में लौकी, तरोई, टिण्डा, परवल, गाजर, टमाटर, पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई, कुलफा आदि का सेवन करें| दालों में मूंग व चने की दाल खाएं|
फलों में सेब, पपीता, केला, नारंगी, संतरा, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज, चीकू आदि का प्रयोग करें|
अरहर, मलका, मसूर, मोठ, लोबिया, काबुली चने आदि का सेवन न करें|
गुड़, लाल मिर्च, मिठाई, तेल, खटाई, अचार, मसाले, मैथुन तथा अधिक व्यायाम से परहेज करें|
विशिष्ट परामर्श-
   
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित हुई हैं| यहाँ तक कि लंबे समय से केथेटर नली लगी हुई मरीज को भी केथेटर मुक्त होकर स्वाभाविक तौर पर खुलकर पेशाब आने लगता है| प्रोस्टेट ग्रंथि के अन्य विकारों मे भी अत्यंत हितकारी है|आपरेशन की जरूरत नहीं होती. जड़ी -बूटियों से निर्मित औषधि हेतु वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बाल काला करने का आसान नुस्खा

  
 आजकल एक गंभीर समस्या जन्म ले रही है वो है बालों का सफ़ेद होना, जो अब एक नार्मल बात हो चुकी है, अगर आपके कुछ बाल सफ़ेद हो गए तो आप उनको काला करने के लिए केमिकल युक्त डाई का उपयोग करेंगे जो की बालो के लिए नुक़सान दायक होती है जिसके प्रभाव से बचे हुए काले बाल भी सफ़ेद हो जाते है और झड़ने लगते है। आपको अब हर बार डाई करने पर विवस होना पड़ेगा क्योंकि आपके सफ़ेद बाल आपकी सुंदरता पर सफ़ेद ग्रहण लगा देते है, ऐसे में आयर्वेद आपकी मदद कर सकता है, आपके काले व घने बालों के लिये आवँले का पाउडर और निम्बू सबसे अच्छा रहेगा। क्योंकि यह सफ़ेद बाल को सिर्फ काला करेंगे वरन् उनको मजबूत और बाकी बाल को सफ़ेद होने से बचाएंगे, अब बात आती है 5₹ में प्राकतिक घरेलु डाई कैसे? आइये बताते है आप पतंजलि स्टोर से 20₹ का आंवले के पावडर का डिब्बा लाइये जो आपको 5-6 महीने तक काम आएगा और 2-3 ₹ का एक निम्बू मिल जाता है अगर एक बार इस प्राकृतिक डाई का औसत खर्च देखे तो मात्र 5₹ का व्यय होगा। यह बालों के लिये किस तरह से प्रयोग करना है, वो आज हम आपको बताएंगे।
* पहले हम जानते है बाल सफेद होने का कारण :
बाल सफ़ेद होने के कई कारण है जैसे खूब ज्यादा तनाव लेना, सही पोषण ना मिलना, बहुत ज्यादा जंक फूड खाना, बहुत ज्यादा साबुन, शैंपू और तेल का प्रयोग करना। कुल मिलाकर हमारा मॉडर्न लाइफस्टाइल ही इसके लिए जिम्मेदार है.
आवश्यक सामग्रियां :
• सामग्री : नींबू, आँवला पाउडर, साफ पानी।
• विधि : नींबू के रस में, 2 चम्मच पानी और 4 चम्मच आँवला पाउडर मिला कर पेस्ट बनाइये। 1 घंटे के लिये रख दें और फिर प्रयोग करें।
• प्रयोग : इस पेस्ट को 20-25 मिनट के लिये बालों और जड़ों में लगाएं और फिर सिर धो लें, लेकिन उस दिन शैंपू का प्रयोग ना करें।
 कृपया ध्यान रखे :
बालों को धोते वक्त ध्यान रखें कि यह आपकी आंखों में ना जाए। इस पेस्ट को हफ्ते में हर चौथे दिन प्रयोग करें। ऐसा करने से आपके सारे सफेद बाल एक ही महीने में काले होने लगेगें। अगर हो सके तो, आयुर्वेदिक तेल, शैंपू और साबुन का ही प्रयोग करें। बालों के लिये असली आँवले का तेल प्रयोग करें।